Bihar Election First Phase Voting: बंपर वोट, किसको चोट? रिकॉर्डतोड़ 64.66% वोटिंग के क्या मायने

Bindash Bol

Bihar Election First Phase Voting: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 18 जिलों की 121 विधानसभा क्षेत्रों में गुरुवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मतदान संपन्न हो गया। इस दौरान लगभग 3.75 करोड़ मतदाताओं में से करीब 65 फीसदी यानी 64.66% ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर बिहार में हुए अब तक के सभी चुनावों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी विनोद सिंह गुंजियाल ने मतदान समाप्ति के बाद मत प्रतिशत की जानकारी देते हुए कहा कि पहले चरण में 45,341 बूथों में से 41,943 बूथों से प्राप्त सूचना के अनुसार 64.64 फीसदी मतदान हुआ है। आयोग के मुताबक, अभी 41943 बूथ से ही रिपोर्ट आई है… ऐसे में कुल वोट परसेंट का आंकड़ा और ऊपर जा सकता है और वह 70 फीसदी को पार कर सकता है।

राजनीतिक गलियारों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब इस बंपर वोटिंग पर चर्चा हो रही है और इसके मायने निकाले जा रहे हैं। वैसे चुनावी प्रक्रिया और परंपराओं के विश्लेषण में एक आम धारणा रही है कि जब भी वोटिंग परसेंट पुराने पैटर्न को तोड़कर नया रिकॉर्ड बनाए तो इसे एंटी इनकमबेंसी फैक्टर माना जाता है। यानि सत्ता विरोधी लहर के तौर पर इसे देखा जाता है लेकिन पिछले कई चुनावों ने इस धारणा को अब कुंद कर दिया है। हालांकि, कुछ इलाकों में मौजूदा नीतीश सरकार के खिलाफ गुस्सा भी है लेकिन बहुत ज्यादा सत्ता विरोधी लहर नहीं देखने को मिली है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वोटिंग परसेंट बढ़ने के अन्य कारण भी हो सकते हैं।

वोटिंग परसेंट बढ़ने में महिलाओं की भूमिका अहम है क्योंकि बड़ी संख्या में महिलाओं को सुबह से ही लगभग सभी इलाकों में मतदान के लिए कतारों में खड़े देखा गया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को जो 10,000 रुपये मिले हैं, उससे उनमें अतिरिक्त जागरूकता आई और वो वोट देने उमड़ीं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को मतदान के लिए आगे बढ़ता देख परिवार के पुरुषों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में हुई SIR और राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने भी वोटिंग परसेंट बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इन दोनों प्रक्रियाओं से मतदाताओं में अपने वोट के महत्व को लेकर जागरूकता पैदा हुई है। इसके अलावा SIR में राज्य में करीब 65 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने भी कहा कि राहुल गांधी की यात्रा की वजह से मतदाताओं में जागरूकता आई है।

इस चुनाव में युवाओं ने बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी ली है। उन्होंने कहा कि NDA द्वारा दिखाए गए इस डर का कोई असर युवाओं पर नहीं पड़ा कि तेजस्वी की सरकार आने से जंगलराज की वापसी हो जाएगी। उन्होंने ये भी कहा कि नीतीश के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर भी नहीं देखने को मिली लेकिन उनके कोर वोटर में बिखराव हुआ है और वह मुखर होकर इस बार वोट करने निकला है।

मोकामा प्रकरण के बाद धानुक जाति के वोटर आक्रामक होकर मतदान करने निकले हैं। इनके अलावा उस क्षेत्र के युवाओं ने भी इसी तरह की तेजी दिखाई है। कुछ अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के मछली पकड़ने और मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम बनाने के ऐलान ने मल्लाह समुदाय को आगे बढ़कर वोट करने के लिए प्रेरित किया है। इसी तरह आईपी गुप्ता की वजह से तांती-ततवा जैसी ईबीसी जातियों के लोग भी पहले के मुकाबले अधिक वोट करने निकले हैं।

पहले चरण की मतदान पर नजर डालें तो जिन 121 सीटों पर वोटिंग हुई, उसमें कुल मतदाताओं की संख्या 3.75 करोड़ से ज्यादा है। तेजस्वी यादव, सम्राट चौधरी, तेज प्रताप यादव, मैथिली ठाकुर और अनंत सिंह जैसे दिग्गज नेताओं और मौजूदा सरकार के 16 मंत्रियों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई। इस चरण में कुल 1314 उम्मीदवार मैदान में थे।

इन 16 मंत्रियों की किस्मत EVM में कैद

नीतीश सरकार के जिन 16 मंत्रियों की किस्मत EVM में कैद हो गई है, उनमें बीजेपी कोटे से तारापुर से सम्राट चौधरी, लखीसराय से विजय कुमार सिन्हा, सीवान से मंगल पांडे, बांकीपुर से नितिन नवीन, जाले से जीवेश मिश्रा, दरभंगा शहरी से संजय सरावगी, कुढ़नी से केदार प्रसाद गुप्ता, साहेबगंज से राजू कुमार, अमनौर से कृष्ण कुमार मंटू, बिहारशरीफ से सुनील कुमार और बछवाड़ा से सुरेंद्र मेहता मैदान में थे।

वहीं, जेडीयू से पांच मंत्री थे। इनमें सरायरंजन से विजय कुमार चौधरी, नालंदा से श्रवण कुमार, बहादुरपुर से मदन सहनी, कल्याणपुर महेश्वर हजारी और सोनबरसा से रत्नेश सदा का नाम शामिल है। पहले चरण के लिए 45 हजार 341 पोलिंग बूथ बनाए गए थे। आइए अब जानते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में हुई ऐतिहासिक वोटिंग के बाद किस दल का क्या कहना है।

बिहार रिकॉर्डतोड़ वोटिंग के मायने

  • बिहार की राजनीति में अक्‍सर कांटे का मुकाबला देखने को मिलता है। यहां कुछ प्रतिशत मतदान का इजाफा भी नतीजों को पलट सकता है। पहले कहा जाता था क‍ि अगर मतदान प्रत‍िशत बढ़ा तो सरकार के ल‍िए मुश्क‍िल समझो। लेकिन बीते कुछ सालों में यह पैटर्न पूरी तरह बदल गया है। कई राज्‍यों में एंटीइनकंबेंसी से ज्‍यादा प्रोइनकंमबेंसी नजर आई है।
  • आंकड़ों को देखें तो, जिन 11 चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ा, उनमें से पांच बार सत्तारूढ़ दल की सरकार में वापसी हुई है, लेकिन जिन तीन बार मतदान घटा, उनमें से दो बार सत्ता पलट गई। यानी बिहार में वोट‍िंग इस बात कोई इशारा नहीं करता क‍ि लोग गुस्‍से में वोट कर रहे हैं या समर्थन में…।
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