Election : भारतीय चुनाव विवेचना

Bindash Bol

डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Election : भारतीय जनतंत्र में बड़ी बात है. चुनाव के पथ से हम वीर बाँकुड़ों को संसद से लेकर विधायिकी को टुकुर -टुकुर ताकते रहे . न पहले कुछ हमारे बस में था और न अब है . पहले हमें अपने मताधिकार के प्रयोग करने से पहले धमका दिया जाता था कि उधर झाँकना भी नहीं है . झाँके तो गए . झाँकने के चक्कर में कई चले गए और उनका पता नहीं चला . अब मताधिकार का प्रयोग सीना तान कर करते तो हैं , लेकिन मतदान के बाद चुनाव परिणाम के आने के बाद हारे विपक्षी के बाहुबली कलेजा मुँह को ले आते हैं . हम कहीं के नहीं रहे ! वैसे साधारण मतदाता की औकात ही क्या ?
मतदान प्रजातंत्र की वह कील है कि एक बार ठुक गयी तो नेता जी पाँच वर्षों तक छाती पर मूँग दलते हैं . वहाँ तक तो हम अभ्यस्त हो चुके थे . पर अब जब जनतंत्र पुराना होने लगा तो नेता जी के चमचे – बेलचे तक उधम मचाने आ धमके हैं . नेता बनने की फैक्ट्रियाँ खुल गयी हैं . इसमें वही अधिक काम करते हैं , जिन्हें पेशेवर अपराध का सफल प्रमाणपत्र मिल जाता है . इसे चलाते अधिकतर वे लोग हैं जो अपने काले हुए धन का निवेश कर सकें . काला हुआ धन कम समय में अधिकाधिक धन लौटा देता है और व्याज में शासनिक नियंत्रण देता रहता है . प्रगति के साथ अब कुछ स्वच्छ छवि के लोगों को उस निवेशक के ब्रांड अम्बेस्डर के रूप में दिखाने का चलन बढ़ने लगा है . कुछ सत्यनिष्ट , सच्चे ऐसे ब्रांड अम्बेस्डर हाथी के दाँत निकलते हैं . बिरले सच्चे रहते हैं . अपवाद प्रकृति का नियम जो है ! अब अपवादों की मात्रा बढ़ी है , लेकिन विपक्ष उनपर भी कालिख पोतने के प्रयत्न में रत मिलते हैं . भारतीय संगीत और वाद्यविधा की तरह नेता बनना भी स्वाभाविक प्रक्रिया न होकर दशकों से घरानों में रही . आज भी अनेक घराने ऐसी फैक्ट्रियाँ चलाकर चंदे वसूलने में लगी हैं . पर अब उनके घटिया उत्पाद के क्रेता जाति तक सीमट गए . मुलमान मत सदा से थोक में खरीदे जाते रहे , अब मूल्य बदल रहे हैं . आज बदले में बहुत कुछ अवांछित भी माँगे जा रहे हैं . पर राजनीति का पानी इतना खारा हो चला कि उनकी दाल नहीं गल रही . विदेशी प्रेशर कुकर तक निष्क्रिय सिद्ध होने लगे . सो बेचारे जून की राह तकते हैं कि दो तिथि आए और रोटी मिले .
भारतीय चुनाव अब रंग छोड़ने लगा है . दशकों तक तिरंगे रंग की आड़ में हरा – हरा दीखता था . अब श्वेत और हरा रंग दबने लगा है . केसरिया रंग में लोगों की रूचि बढ़ने लगी है . केसरिया रंग के बढ़ते हरा और यहां तक कि श्वेत रंग भी मिटने और सिसकने लगा है . फिर भी रंगों की प्रतिस्पर्धा चल रही है . एक से बढ़कर एक रंगसाज अपनी दुकान सजा कर बैठे हैं और रंग स्वीकार्यता के प्रयोग में लगे हैं . केसरिया वाले रंगसाज अब सुरंगों से बेधड़क निकलने लगे हैं . वे अंग्रेजों की पहले की मुफ्त चाय योजना की तरह अपने अतीत के साथ वर्तमान के शौर्य की पुड़िया भी निःशुल्क बाँट रहे हैं . भारतीय चुनावी विवेचना एक तरह नए पारदर्शी शीर्ष की ओर बढ़ने लगा तो श्वेत और हरे रंग के रंगसाज प्रक्रिया के प्रतिष्ठान पर उसी भांति थूकने में लगे हैं मानो प्रतिष्ठान न हुआ , चन्द्रमा हो . अब थूक उनके मुखमंडल को सुशोभित करने लगता है तो उसे हँसते हुए पोछ कर फिर से नए प्रयत्न करने लगते हैं . इस बीच उनका व्यक्तित्व गरीब बच्चों की नीकर बन खिसककर कुछ नीचे गिर जाता है . वे उसे ऊपर खींचकर अपनी निर्वस्त्रता छिपाने में लगे हैं . विदेशी फिर से उन्हें उत्साहित करते हैं . वे फिर से अभ्यास में लगते हैं .
भारतीय चुनाव विवेचना के दूरदर्शी दुष्यंत कुमार भी थे . दशकों पूर्व उन्होंने लिख दिया था –
बड़े हैरतअंगेज़ होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत , तू अभी इंसान है !
हमसे अपना मानवीयपन छूट नहीं रहा . तो क्या खा कर हम भारतीय चुनाव की विवेचना कर पाएंगे ? अपने लिए इस विषय पर तो कुलमिलाकर यही कहना पड़ता है –
हरि अनन्त – हरि कथा अनन्ता !

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