- ‘अदालत राज्यपाल की भूमिका को टेकओवर नहीं कर सकती’, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
- क्या है Presidential Reference का मामला, कहां से शुरू हुआ विवाद? राष्ट्रपति ने पूछे थे ये 14 सवाल
Supreme court : सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर मंजूरी की समयसीमा तय करने पर अपना फैसला सुनाया। सीजेआई के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल पर कोई समय-सीमा नहीं लगा सकता। सिवाय इसके कि वह उन्हें एक उचित अवधि में निर्णय लेने के लिए कहे। सीजेआई ने कहा कि समय-सीमा लागू करना संविधान द्वारा इतनी सावधानी से संरक्षित इस लचीलेपन के बिल्कुल विपरीत होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्यपाल राज्य विधेयकों पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते, लेकिन उसने राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण के विरुद्ध होगा।
राष्ट्रपति ने कोर्ट से क्या जानना चाहा था?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत से यह जानना चाहा था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के इस्तेमाल के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समयसीमा निर्धारित की जा सकती है।
राष्ट्रपति संदर्भ का निर्णय तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों की मंजूरी को लेकर राज्यपाल की शक्तियों पर न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के बाद आया था। पांच पन्नों के संदर्भ में मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से 14 सवाल पूछे थे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर उसकी राय जानने की कोशिश की।
क्या है पूरा मामला?
31 अक्टूबर 2023 को तमिलनाडु सरकार ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत विभिन्न विधेयकों और अन्य प्रस्तावों को अनिश्चित काल तक लंबित रखने के राज्यपाल आरएन रवि के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार ने बताया कि चार श्रेणियों के मामले ऐसे हैं जिन्हें राज्यपाल ने बिना कोई जवाब दिए लंबित रखा है। 8 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने राज्यपाल की देरी को गलत माना। अनुच्छेद 142 के तहत विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए, पीठ ने लंबित विधेयकों को स्वीकृत मान लिया।
राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भेजे गए 14 सवालों वाले रिफरेन्स पर आज सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले को निम्न बिंदुओं से आप समझ सकते हैं।
1- राज्यपाल के पास कोई विधेयक प्रस्तुत होने पर उसके पास क्या विकल्प मौजूद हैं?
- विधेयक को स्वीकृत करना
- विधेयक की स्वीकृति रोक लेना और इस स्थिति में इसे पुनर्विचार के लिए विधानमंडल में वापस करना
- राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना
2- क्या राज्यपाल, मंत्री परिषद से सहायता और सलाह लेने को बाध्य है अथवा वह अपना विवेक प्रयोग में ला सकता है?
राज्यपाल, मंत्री परिषद से सलाह और सहायता लेने के लिए बाध्य नहीं है और वह अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है।
3- क्या राज्यपाल के “संवैधानिक विवेक” की न्यायालय में समीक्षा की जा सकती है?
नहीं। राज्यपाल के किसी निर्णय के मेरिट की समीक्षा नहीं हो सकती। आवश्यक परिस्थिति में सीमित आदेश जारी किया जा सकता है लेकिन बिना उसके गुण दोष पर टिप्पणी के।
4- क्या राज्यपाल के कार्यों के संबंध में किसी भी तरह की न्यायिक कार्यवाही पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है?
हाँ, एक व्यक्ति के रूप में राज्यपाल पर कोई कार्यवाई नहीं हो सकती, लेकिन राज्यपाल का पद न्यायिक दायरे में आता है।
5- संविधान में किसी विधेयक पर निर्णय करने की समय सीमा निर्धारित न होने पर क्या न्यायालय अपनी तरफ़ से ऐसी कोई सीमा तय कर सकता है?
नहीं। यह संवैधानिक लोच (elasticity) के ख़िलाफ़ है।
6- क्या राष्ट्रपति के संवैधानिक विवेक को गुण दोष के लिए किसी न्यायालय में सुना जा सकता है?
नहीं। अनुच्छेद 200 और 201 को जान-बूझकर इस तरह तैयार किया गया है कि इनमें लचीलापन (elasticity) बना रहे, ताकि राज्यपाल और राष्ट्रपति विभिन्न संदर्भों, परिस्थितियों और संघीय-लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाले संतुलन की जरूरतों को ध्यान में रखकर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
7- क्या राष्ट्रपति पर अपने विवेक के इस्तेमाल के लिए न्यायालय समयसीमा बाँध सकता है?
नहीं।
8- वैधानिक व्यवस्था के प्रकाश में क्या राष्ट्रपति को हर बार जब राज्यपाल कोई विधेयक उनकी स्वीकृति के लिए आरक्षित करता है, तो अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट की सलाह (राय) लेना अनिवार्य है?
उत्तर: नहीं।
राष्ट्रपति को हर बार जब राज्यपाल विधेयक को उनकी स्वीकृति के लिए आरक्षित करता है, तो अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय (advisory opinion) लेना अनिवार्य नहीं है। राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संतुष्टि बिल पास करने के लिए काफ़ी है। सुप्रीम कोर्ट से राय लेना राष्ट्रपति का विशेषाधिकार है, कर्तव्य नहीं।
9- यदि कोई विधेयक विवादास्पद प्रतीत होता है तो क्या उसकी न्यायिक समीक्षा राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा उसे क़ानूनी जामा पहनाने से पहले ही की जा सकती है?
नहीं। विधेयक को चुनौती उसके क़ानून का रूप लेने के बाद ही दी जा सकती है।
10- क्या संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति/राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और आदेशों को किसी भी प्रकार से हटाया जा सकता है?
नहीं। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति/राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और आदेशों को किसी भी प्रकार से छीना नहीं जा सकता। अदालत समय सीमा लगाकर तथाकथित “मान ली गई सहमति” का आदेश किसी भी कीमत पर नहीं दे सकती।
11- क्या राज्य विधानसभा द्वारा बनाया गया कानून संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की सहमति के बिना ही (मात्र कोर्ट के आदेश पर) “लागू कानून” माना जाएगा?
नहीं। राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए कानून के लिए अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की सहमति के बिना लागू होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की विधायी भूमिका को किसी अन्य संवैधानिक प्राधिकारी द्वारा किसी भी कीमत पर रद्द नहीं किया जा सकता।
5 राज्यों में 42 बिलों को मंजूरी का इंतजार
- तमिलनाडु में 10 बिल लटकने पर विवाद बढ़ा था। 2023 में राष्ट्रपति को भेजे गए। 1 मंजूर और 7 खारिज हुए। 2 पेंडिंग थे।
- प. बंगाल के स्पीकर बिमान बनर्जी के अनुसार 19 बिल राज्यपाल के पास पेंडिंग हैं।
- कर्नाटक के 10 बिल राष्ट्रपति के पास लंबित हैं। इनमें मुस्लिमों को 4% ठेका आरक्षण व मंदिरों पर लेवी से जुड़े संशोधन हैं। राज्यपाल के पास कोई बिल नहीं है।
- तेलंगाना के 3 बिल राष्ट्रपति के पास पेंडिंग हैं। तीनों पिछड़े वर्ग के कोटा से जुड़े हैं। मोहम्मद अजहरूद्दीन को राज्यपाल कोटे से विधान परिषद में नामित करने का प्रस्ताव अगस्त से लंबित है।
- केरल में करीब 8 बिल रुके हैं। इनमें यूनि. लॉ अमेंडमेंट, कोऑपरेटिव सोसाइटी, लोकायुक्त अमेंडमेंट आदि शामिल थे।
CJI की अगुआई में 5 जजों की बेंच ने सुनवाई की
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की जगह इस मामले में चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली संविधान पीठ ने सुनवाई की। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंद्रचूड़कर शामिल थे। सुनवाई 19 अगस्त से शुरू हुई थी।
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। वहीं, विपक्ष शासित राज्य तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने केंद्र का विरोध किया।