- गूगल ने 2022 में 5.6 अरब गैलन पानी खर्च किया—मुख्यतः AI सिस्टम और डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए।
- माइक्रोसॉफ्ट की जल खपत सिर्फ एक साल में 34 प्रतिशत बढ़ गई, और यह उछाल किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेज़ विस्तार से जुड़ा है।
- अनुमान है कि GPT-3 जैसे एक बड़े AI मॉडल का केवल एक प्रशिक्षण रन उतना पानी निगल सकता है, जितना एक छोटा शहर पूरे दिन में उपयोग करता है।
अमरेंद्र किशोर (नई दिल्ली)
AI हमारी दुनिया बदल रहा है लेकिन हर प्रोसेसिंग के पीछे लाखों लीटर पानी और गीगावॉट बिजली खर्च हो रही है। ऐसे में समझिए, पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए किन तरीकों से बेहतर डिजिटल भविष्य बनाया जा सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आज समाधान की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो यह जल संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और संसाधनों की बर्बादी जैसी समस्याओं का अंतिम उत्तर हो। सरकारी रिपोर्टों, कॉर्पोरेट प्रस्तुतियों और तकनीकी सम्मेलनों में AI को भविष्य का रक्षक बताया जाता है। यह कहा जाता है कि वही तकनीक जो आज दुनिया को डेटा से जोड़ रही है, वही पानी बचाएगी, खेती को टिकाऊ बनाएगी और पर्यावरण को संतुलन में लौटाएगी।
इस दावे में सच्चाई के तत्व भी हैं, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। सच यह है कि AI स्वयं एक ऐसा तंत्र बन चुका है, जो अदृश्य रूप से पानी और ऊर्जा को निगल रहा है, और यह खपत इतनी तेज़ है कि यदि इसे आज नहीं समझा गया, तो कल इसके परिणाम किसी भी तकनीकी लाभ से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकते हैं।
यह मानने में कोई संदेह नहीं कि जल प्रबंधन के क्षेत्र में AI ने ठोस हस्तक्षेप किए हैं। कृषि, जो दुनिया के मीठे पानी की सबसे बड़ी उपभोक्ता है, लंबे समय तक अनुमान, अनुभव और मौसम की अनिश्चितता के भरोसे चलती रही। खेतों में जरूरत से ज्यादा पानी देना सामान्य बात रही है, क्योंकि किसान के पास यह जानने का कोई सटीक साधन नहीं था कि मिट्टी में नमी कितनी है और फसल को वास्तव में कितना पानी चाहिए।
AI आधारित सटीक सिंचाई प्रणालियों ने इस अंधेरे में रोशनी डाली है। सेंसर, मौसम पूर्वानुमान और फसल-विशिष्ट डेटा का विश्लेषण कर AI यह तय कर रहा है कि पानी कब और कितनी मात्रा में देना है। कई क्षेत्रों में इससे पानी की खपत आधी तक घटाई गई है और उपज बढ़ी है। यह उपलब्धि वास्तविक है और इसे कम करके नहीं आँका जाना चाहिए।
इसी तरह, शहरी जल आपूर्ति में AI का उपयोग रिसाव की पहचान के लिए किया जा रहा है। दुनिया के कई शहरों में शुद्ध किया गया तीस से पचास प्रतिशत पानी पाइपलाइनों की लीकेज में बर्बाद हो जाता है। यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और संसाधनों की बर्बादी का प्रमाण है। मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म दबाव और ध्वनि के सूक्ष्म बदलावों को पढ़कर यह बता सकते हैं कि पाइपलाइन में कहाँ पानी चुपचाप बह रहा है। समय रहते मरम्मत होने पर लाखों गैलन पानी बच सकता है। यह भी एक निर्विवाद लाभ है।
जल गुणवत्ता निगरानी, बाढ़ और सूखा पूर्वानुमान, अपशिष्ट जल शोधन, पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी—इन सभी क्षेत्रों में AI ने गति, सटीकता और क्षमता बढ़ाई है। यह कहना गलत होगा कि AI केवल उपभोग की मशीन है। लेकिन समस्या यह है कि जिस मंच से यह सारी दक्षता संभव हो रही है, वही मंच खुद पानी और ऊर्जा का एक असंतुलित उपभोक्ता बन चुका है।
AI कोई हवा में तैरती अवधारणा नहीं है। यह विशाल डेटा सेंटरों में सांस लेता है, जिनमें हजारों सर्वर चौबीसों घंटे गर्म होते रहते हैं। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए पानी का उपयोग होता है, और वह पानी पुनः उपयोग में नहीं आता। वह भाप बनकर उड़ जाता है। यही AI का असली, लेकिन छिपा हुआ जल पदचिह्न है। यह किसी खेत या कारखाने में दिखाई नहीं देता, इसलिए इस पर बहस भी नहीं होती। लेकिन इसका पैमाना भयावह है।
अनुमान बताते हैं कि आने वाले कुछ वर्षों में AI से जुड़ी गतिविधियाँ अरबों घन मीटर पानी की निकासी करेंगी। एक किलोवाट-घंटा बिजली के बदले नौ लीटर तक मीठा पानी केवल सर्वरों को ठंडा रखने के लिए वाष्पित हो सकता है। बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में लाखों किलोवाट-घंटे ऊर्जा लगती है। इसका अर्थ है कि हर प्रशिक्षण सत्र के साथ पानी की एक अदृश्य नदी वातावरण में उड़ जाती है। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों की जल खपत में तेज़ वृद्धि कोई संयोग नहीं है। यह AI युग की कीमत है, जो सार्वजनिक बहस से दूर रखी गई है।
और यह कीमत केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। हर AI क्वेरी, हर बातचीत, हर “हल्का” अनुरोध भी इस प्रणाली को सक्रिय करता है। शोध यह संकेत देते हैं कि हजार AI प्रॉम्प्ट पर लगभग आधा लीटर पानी वाष्पित हो सकता है। यह आंकड़ा छोटा लगता है, जब तक इसे लाखों उपयोगकर्ताओं और अरबों प्रश्नों से गुणा न किया जाए। तब यह स्पष्ट होता है कि हमारी डिजिटल जिज्ञासा का एक भौतिक मूल्य है, और वह मूल्य पानी में चुकाया जा रहा है।
यहाँ से नैतिक सवाल पैदा होता है, और यह सवाल असुविधाजनक है। जब दुनिया के बड़े हिस्से सूखे, अनियमित मानसून और गिरते भूजल स्तर से जूझ रहे हैं, तब क्या यह स्वीकार्य है कि हमारी तकनीकी सुविधा के लिए अरबों लीटर पानी चुपचाप भाप बनकर उड़ जाए। केप टाउन जैसे शहर “डे ज़ीरो” के कगार तक पहुँच चुके हैं। भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई इलाके हर साल पानी की अनिश्चितता झेलते हैं। किसानों की फसलें सूख जाती हैं, शहरों में टैंकर संस्कृति फलती है। इसी दुनिया में डेटा सेंटर अपेक्षाकृत निर्जन, कभी-कभी अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खड़े किए जाते हैं, क्योंकि वहाँ ज़मीन और नियम सस्ते होते हैं।
यह संकट केवल पानी की कमी का नहीं है, बल्कि जवाबदेही की कमी का भी है। AI कंपनियाँ अपने उत्पादों की बुद्धिमत्ता पर गर्व करती हैं, लेकिन उनके पर्यावरणीय प्रभाव पर पारदर्शिता न्यूनतम है। उपयोगकर्ता अपने सवालों की लागत नहीं जानते। नीति निर्माता इस नई खपत को पुराने औद्योगिक ढाँचों से नापने की भूल कर रहे हैं। परिणाम यह है कि पानी दोनों तरफ से बह रहा है—खेतों और पाइपों में अक्षमता से, और डेटा सेंटरों में अदृश्य वाष्पीकरण से।
इस विरोधाभास का समाधान AI को त्यागना नहीं है, बल्कि उसे नियंत्रित करना है। बंद-लूप कूलिंग, पुनर्चक्रित पानी, नवीकरणीय ऊर्जा और स्पष्ट जल लेखांकन जैसी तकनीकी संभावनाएँ मौजूद हैं। लेकिन जब तक इन्हें बाध्यता नहीं बनाया जाएगा, वे केवल अच्छे इरादों तक सीमित रहेंगी। AI का विकास यदि जल सुरक्षा और पर्यावरणीय न्याय के साथ नहीं जुड़ा, तो यह तकनीक उन समस्याओं को और गहरा कर देगी, जिन्हें सुलझाने का दावा किया जा रहा है।
AI हमारे समय की सबसे ताकतवर तकनीक है, लेकिन ताकत बिना जिम्मेदारी के विनाशकारी होती है। यह तय करना अब समाज, सरकार और उद्योग की साझा जिम्मेदारी है कि AI को जल संरक्षण का औज़ार बनाया जाए या उसे एक और संसाधन-खपत करने वाला दैत्य बनने दिया जाए। यह फैसला भविष्य की पीढ़ियों को तय नहीं करना चाहिए; यह फैसला हमें, अभी, पूरी स्पष्टता और साहस के साथ करना होगा।
