SIR : बारह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कराए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के पहले चरण में ही छह करोड़ मतदाता मृत या स्थानांतरित होकर दो जगहों में पंजीकृत अथवा अनुपस्थित पाए गए। जिन राज्यों में अब तक एसआईआर कराए जा चुके हैं, उनकी पहले मतदाता संख्या 51 करोड़ थी। चुनाव आयोग के अनुसार जिन राज्यों में मतदाता सूची जारी हो गई है, उन सभी राज्यों में दिसंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर 14 फरवरी तक आपत्तियों पर सुनवाई और सत्यापन किया जाएगा। शेष 23 राज्यों में भी एसआईआर की तैयारी शुरू कर दी गई है। विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत वर्ष 2025 में बिहार से हुई थी। जहां एसआईआर विवादों में घिरा रहा, फिर नई मतदाता सूची के अनुसार चुनाव कराए गए, परिणामस्वरूप एनडीए को भारी बहुमत से जीत मिली और नीतीश कुमार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। इस जीत पर देश के बड़े—बड़े विश्लेषकों की बड़ी प्रतिक्रिया रही और एनडीए सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर हेराफेरी के आरोप लगाए गए, लेकिन जिसे चुनाव आयोग तथा सत्ताधारी एनडीए ने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया और कहा कि विपक्ष अपनी हार का ठीकरा अपनी खीझ मिटाने के लिए कर रहा है। अब इस नए वर्ष में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, अतः लाखों मतदाताओं को सूची से अलग कर दिया जाना विपक्ष के लिए फिर से मुद्दा बनता जा रहा है।
इस नए वर्ष में देश के चार राज्यों— असम, प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल के साथ केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी है। इन राज्यों और विशेषकर प. बंगाल में राजनीतिक पारा गर्म हो चुका है । एक तरफ एनडीए वर्षों से वहां सत्ता से दूर है तथा तृणमूल कांग्रेस की सरकार की बागडोर ममता बनर्जी के हाथों में है। 294 सीटों पर होने जा रहे इस चुनाव का लक्ष्य टीएमसी सरकार को किनारे लगाना ही माना जा रहा है। वैसे, वर्ष 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में राज्य में अपने को स्थापित कर लिया था, लेकिन बढ़त तृणमूल कांग्रेस को ही मिली थी, जिसके कारण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही बनी रही। 2011 में हुए विधानसभा चुनाव में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने बहुमत हासिल किया था और प. बंगाल में 34 वर्षों से वाममोर्चा के शासन को उखाड़ फेंका था। वर्ष 2026 में होने जा रहे चुनाव का क्या परिणाम होगा, यह तो परिणाम के बाद ही पता चलेगा, जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस और एनडीए के बीच घमासान मचा है, उस पर अभी से कुछ भी कहना निरर्थक ही होगा।
126 विधायकों के असम विधानसभा में बहुमत के साथ एनडीए सरकार है और प्रखर मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा है। असम के विधायक एकल सीट निर्वाचन से चुने जाते हैं। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा छात्रकाल से ही कांग्रेस में थे। परन्तु, कांग्रेस से कुछ अनबन होने के कारण उन्होंने अपना दल बदल लिया और भाजपा में शामिल हो गए। सूचना की मानें, तो वहां भाजपा मजबूती से केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ी है। अब यदि दक्षिण भारत के दो महत्वपूर्ण राज्य— तमिलनाडु और केरल तथा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की बात करें, तो तमिलनाडु व केरल में भाजपा की सरकार नहीं है, लेकिन केंद्र शासित होने के कारण पुडुचेरी पर केंद्र की भाजपा सरकार पर ही इस राज्य की जिम्मेदारी है।
235 सीटों (एक मनोनीत सदस्य सहित) तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 सदस्यों की संख्या होनी चाहिए। वहां अभी द्रविड़ मुनेत्र कषगम की सरकार है और वर्तमान सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में एमके स्टालिन है।, जबकि कांग्रेस का भारी समर्थन डीएमके को हासिल है। अब रही केरल की बात, तो अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही वहां कांग्रेस समर्थित वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार है और एलडीएफ पिछले वर्ष 2021 के चुनाव में इस राज्य का चुनाव वर्तमान मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन के नेतृत्व में लड़ा गया था और उन्हीं के नेतृत्व में सरकार का गठन भी किया गया था। रही केंद्र शासित राज्य पुडुचेरी की, तो 33 विधानसभा वाले सदस्यों की बात तो वहां 30 निर्वाचित और तीन मनोनीत सदस्य होते हैं जिसका संचालन उपराज्यपाल द्वारा होता है। अभी उपराज्यपाल के पद की जिम्मेदारी कुनियाल कैलाशनाथन के जिम्मे है।
अब आखिर मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए विपक्ष सड़क पर और सदन में इतना हंगामा क्यों कर रहा है? यह एक जटिल प्रश्न देश के समक्ष खड़ा हो गया है कि आखिर चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण के मामले में विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग पर पक्षपात के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उसकी सच्चाई क्या है? विपक्ष द्वारा उस मामले पर जब सदन में चर्चा की मांग की गई, तो संसदीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस पर बहस की स्वीकृति भी दे दी, लेकिन विपक्ष हंगामे के बीच अध्यक्ष द्वारा बार—बार सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी जाती रही। इसी मुद्दे पर अब तक बारह राज्यों की जो रिपोर्ट आई है, उसमें छह करोड़ मतदाताओं को उसकी मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के इशारे पर कार्य करके तथाकथित विपक्षी मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर रहा है।
जिन राज्यों में 2026 के अंत तक विधान चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें असम तथा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी को छोड़कर किसी भी राज्य में एनडीए की सरकार नहीं है। अभी जो राज्य केंद्र सरकार के लिए विशेष फोकस में है, वह प. बंगाल है, जहां वर्तमान में 58.20 लाख मतदाताओं को सूची से ही अलग कर दिया गया है। यही हाल तमिलनाडु और केरल में भाजपा या भाजपा गठबंधन वहां नहीं है। अतः मतदान सूची से ऐसे मतदाताओं को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है कि उन राज्यों में भाजपा या भाजपा गठबंधन की सरकार बन सके। वैसे, विश्व का नियम यही है कि शक्तिशाली किसी न किसी रूप में वह सत्ता हासिल कर ले, बाकी तो सब कुछ अपना ही है। पता नहीं हमारे देश के नेता इस तरह से क्यों अपने को सत्ता हासिल करने के लिए झूठ—सच के खेल में शामिल कर लेते हैं। अब देखना यह है कि जिन 23 राज्यों के मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण अभी शेष हैं, उसमें क्या स्थिति होने वाली है। जो भी हो, सरकार ताकतवर तो होती ही है, इसलिए वह जो चाहे कर सकने में समर्थ है। आखिर चुनाव आयोग के भविष्य का निर्धारण तो तख्त पर बैठे राजनेताओं द्वारा ही तो होता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
