Dollar : डॉलर पर “Silent Strike” — जब BRICS ने बिना शोर किए वैश्विक सत्ता को चुनौती दी

Siddarth Saurabh
  • BRICS देशों ने US Treasuries बेचकर डॉलर-केन्द्रित व्यवस्था को शांत दी चुनौती
  • भारत इस रणनीतिक बदलाव में फ्रंट-लाइन प्लेयर बनकर उभरा
  • यह डि-डॉलराइज़ेशन नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय री-बैलेंसिंग है
  • अमेरिकी नीतियों से उपजा भरोसे का संकट इस बदलाव का बड़ा कारण
  • आने वाला दशक बैलेंस शीट्स से तय होगा, भाषणों से नहीं

Dollar : इतिहास शोर से नहीं, बैलेंस शीट से बदलता है।
इतिहास की किताबें अक्सर युद्धों, भाषणों और संधियों को याद रखती हैं। लेकिन 21वीं सदी की सबसे बड़ी सत्ता-लड़ाइयाँ अब गोलियों से नहीं, बैलेंस शीट से लड़ी जा रही हैं। डॉलर दशकों से जिस सिंहासन पर बैठा था—जहाँ से वह दुनिया की मुद्राओं, बाजारों और देशों की नीतियों को दिशा देता रहा—आज उसी सिंहासन के पाये चुपचाप ढीले किए जा रहे हैं। और इस बार वार किसी क्रांति के नारे से नहीं, बॉन्ड की बिक्री से हुआ है।

US Treasuries क्या हैं : डॉलर की रीढ़

US Treasuries—यानी अमेरिकी सरकार के बॉन्ड—वह साधन हैं जिन पर वैश्विक वित्त की नींव टिकी रही। देश अपनी विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा इन्हीं बॉन्ड में रखते हैं क्योंकि इन्हें सबसे सुरक्षित माना गया।

सरल भाषा में, यह अमेरिकी सरकार की “सरकारी FD” है—जहाँ दुनिया अपना पैसा पार्क करती है और बदले में स्थिरता व भरोसा पाती है। लेकिन जब भरोसा दरकता है, तो FD टूटती है।

अक्टूबर का संकेत, जब चुप्पी सबसे ज़ोर से बोली

अक्टूबर में BRICS देशों ने मिलकर लगभग 29 अरब डॉलर के US Treasuries बेच दिए।

भारत: ~12 अरब डॉलर
चीन: ~11.8 अरब डॉलर
ब्राज़ील: ~5 अरब डॉलर

यह कोई साधारण पोर्टफोलियो री-बैलेंसिंग नहीं थी। यह एक साफ़ संदेश था—बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस, बिना चेतावनी—कि अब हमारी बचत तुम्हारे काग़ज़ पर नहीं टिकेगी।

पिछले 12 महीने, धीमी लेकिन निर्णायक निकासी

अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच तस्वीर और स्पष्ट हुई…..।

  • चीन: ~71 अरब डॉलर की निकासी
  • ब्राज़ील: ~61 अरब डॉलर
  • भारत: ~50 अरब डॉलर से अधिक

ये आंकड़े सिर्फ़ नंबर नहीं हैं; ये उस विश्वास-घटाव का मापन हैं जो डॉलर-केन्द्रित व्यवस्था में पनप चुका है।

क्यों टूट रहा है भरोसा, सिर्फ़ राजनीति नहीं, सुरक्षा भी

अमेरिकी नीति-व्यवहार ने दुनिया को एक कड़ा सबक सिखाया है—मतभेद हुए, तो संपत्तियाँ फ्रीज़। रूस से लेकर ईरान तक, कई उदाहरणों ने देशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर कल मतभेद बढ़े, तो क्या हमारी जमा-पूंजी सुरक्षित रहेगी?
डॉलर अब सिर्फ़ मुद्रा नहीं, भूराजनीतिक हथियार भी बन चुका है—और हथियार पर भरोसा नहीं किया जाता, उससे दूरी बनाई जाती है।

भारत की भूमिका, शोर नहीं, रणनीति

भारत ने इस “Silent Attack” में नेतृत्व इसलिए नहीं किया कि वह टकराव चाहता है, बल्कि इसलिए कि वह रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है। रुपये में व्यापार के प्रयोग, विविध मुद्रा-रिज़र्व, गोल्ड होल्डिंग्स में वृद्धि, मल्टी-पोलर फाइनेंशियल आर्किटेक्चर की वकालत, यह सब मिलकर बताता है कि भारत किसी एक मुद्रा-सत्ता पर निर्भर नहीं रहना चाहता। भारत का संदेश साफ़ है—हम सिस्टम के भीतर रहकर सिस्टम को संतुलित करेंगे।

BRICS की चाल : डि-डॉलराइज़ेशन नहीं, री-बैलेंसिंग

यह कहना आसान है कि दुनिया डि-डॉलराइज़ेशन की ओर बढ़ रही है। सच्चाई थोड़ी सूक्ष्म है। BRICS डॉलर को गिराना नहीं चाहता, बल्कि डॉलर की एकाधिकार शक्ति को सीमित करना चाहता है।
यह एक री-बैलेंसिंग है—जहाँ डॉलर रहेगा, लेकिन अकेला नहीं।

वॉल स्ट्रीट बनाम हकीकत

वॉल स्ट्रीट इसे “Quiet Exit” कहता है। हकीकत यह है कि यह Quiet Preparation है—आने वाले दशक की पावर-गेम के लिए।
जब सेंट्रल बैंक बयान नहीं देते, लेकिन बैलेंस शीट पर 60–70 अरब डॉलर की बिक्री दिखती है, तो समझिए—मीटिंग रूम से निकलकर खेल मैदान में आ चुका है।

आगे क्या : दुनिया किस मोड़ पर खड़ी है

डॉलर की “महादशा” अभी खत्म नहीं हुई। वह अब भी सबसे बड़ा रिज़र्व, सबसे गहरी मार्केट और सबसे तरल मुद्रा है।
लेकिन अंतरदशा बदल चुकी है। BRICS का ग्रह प्रवेश हो चुका है। और जब ग्रह बदलते हैं, तो राजयोग भी बदलते देर नहीं लगती।

आज ये बदलाव Excel शीट की लाइनों में दिख रहे हैं।
कल यही लाइनें दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक नक्शे की सीमाएँ तय करेंगी। भारत इस “Geopolitical Short-Sell” का सिर्फ़ हिस्सा नहीं—एक दिशा-निर्देशक बन चुका है।

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