- स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की एक घटना जो आज भी समाज को आईना दिखाती है
Swami Vivekananda : सभ्यता क्या है? क्या सभ्यता का अर्थ अच्छे कपड़े पहनना, आधुनिक जीवनशैली अपनाना और बाहरी तौर-तरीकों में निखार लाना है? या फिर सभ्यता वह है जो मनुष्य के विचारों, उसके आचार-विचार, उसके संस्कार और उसके चरित्र से झलकती है? इस प्रश्न का उत्तर आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वामी विवेकानंद के समय में था। प्रस्तुत घटना न केवल भारत और पश्चिम की सोच के अंतर को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि सच्ची सभ्यता का आधार बाहरी आवरण नहीं, बल्कि आंतरिक मूल्य होते हैं।
स्वामी विवेकानंद: विचारों के विश्वदूत
स्वामी विवेकानंद केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि वे भारतीय दर्शन, संस्कृति और अध्यात्म के वैश्विक प्रतिनिधि थे। शिकागो धर्म संसद में दिए गए उनके भाषण ने पूरी दुनिया को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया। उनके विचारों में आत्मसम्मान, चरित्र-निर्माण और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। वे मानते थे कि मनुष्य की महानता उसके कपड़ों या बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्मों से आँकी जानी चाहिए।
घटना का संदर्भ
यह घटना उन दिनों की है जब स्वामी विवेकानंद की ख्याति अमेरिका सहित पूरे विश्व में फैल चुकी थी। उनके विचारों से प्रभावित होकर अनेक विदेशी उनके शिष्य बन चुके थे। ऐसे ही एक अमेरिकी शिष्य ने स्वामी विवेकानंद से इच्छा प्रकट की कि वह उनके गुरु को देखना चाहता है। वह जानना चाहता था कि आखिर वह कौन-सा महान व्यक्ति होगा, जिसने विवेकानंद जैसे विलक्षण शिष्य को तैयार किया।
रामकृष्ण परमहंस का परिचय
स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य को अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस का एक फोटोग्राफ दिखाया। रामकृष्ण परमहंस एक महान संत, साधक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। उनका जीवन अत्यंत सादा था। वे न तो बाहरी आडंबर में विश्वास रखते थे और न ही समाज की तथाकथित सभ्यता के मानकों में स्वयं को ढालते थे। उनका जीवन ईश्वर-भक्ति, करुणा और आत्मज्ञान से परिपूर्ण था।
पश्चिमी दृष्टिकोण और पूर्वाग्रह
जब अमेरिकी शिष्य ने रामकृष्ण परमहंस का फोटोग्राफ देखा, तो वह निराश हो गया। उसने कहा कि वह अपने मन में किसी अत्यंत विद्वान, आकर्षक और आधुनिक दिखने वाले गुरु की कल्पना कर रहा था। फोटोग्राफ देखकर उसे ऐसा नहीं लगा कि वे कोई विशेष रूप से “सभ्य” व्यक्ति हैं। यह प्रतिक्रिया पश्चिमी सोच का प्रतीक थी, जहाँ सभ्यता को अक्सर पहनावे, भाषा और बाहरी व्यक्तित्व से जोड़ा जाता है।
स्वामी विवेकानंद का ऐतिहासिक उत्तर
अपने शिष्य की बात सुनकर स्वामी विवेकानंद मुस्कराए और अत्यंत गहरे अर्थ वाला उत्तर दिया। उन्होंने कहा—
“तुम्हारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण एक दर्जी करता है, जबकि हमारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण आचार-विचार करते हैं।”
इसके बाद उन्होंने शिष्य से पूछा कि इन दोनों कसौटियों पर कसकर बताए—क्या सूट-बूट पहनने वाला व्यक्ति ही सभ्य है या वह संत, जिसका जीवन त्याग, प्रेम और आत्मज्ञान से भरा हुआ है?
सभ्यता का भारतीय दृष्टिकोण
भारतीय संस्कृति में सभ्यता का अर्थ केवल बाहरी शिष्टाचार नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन है। यहाँ ‘संस्कार’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। बचपन से ही सत्य, अहिंसा, करुणा, सम्मान और आत्मसंयम जैसे गुणों को जीवन में उतारने पर बल दिया जाता है। भारत में माना जाता है कि व्यक्ति का चरित्र ही उसका वास्तविक परिचय होता है।
पश्चिम बनाम पूर्व: दो दृष्टिकोण
पश्चिमी समाज में आधुनिकता और प्रगति को अक्सर भौतिक उपलब्धियों और बाहरी मानकों से मापा जाता है, जबकि पूर्वी दर्शन आत्मिक उन्नति और नैतिक विकास को अधिक महत्व देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पश्चिम में मूल्य नहीं हैं या पूर्व में आधुनिकता का अभाव है, बल्कि यह अंतर प्राथमिकताओं का है। विवेकानंद का कथन इसी अंतर को अत्यंत सरल शब्दों में उजागर करता है।
आज के संदर्भ में घटना की प्रासंगिकता
आज के समय में सोशल मीडिया, ब्रांडेड कपड़े और दिखावे की संस्कृति ने सभ्यता की परिभाषा को और भी सतही बना दिया है। हम अक्सर किसी व्यक्ति को उसके पहनावे, उसकी गाड़ी या उसके पद से आंकते हैं। ऐसे समय में यह घटना हमें याद दिलाती है कि सच्ची सभ्यता आज भी चरित्र, विचार और व्यवहार में ही निहित है।
स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की यह घटना केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि एक स्थायी संदेश है। यह हमें सिखाती है कि सभ्यता का निर्माण दर्जी नहीं, संस्कार करते हैं। सूट-बूट पहनना बुरा नहीं है, लेकिन यदि उसके भीतर करुणा, विनम्रता और नैतिकता न हो, तो वह केवल एक खोखला आवरण रह जाता है। सच्चा सभ्य वही है, जिसके विचार ऊँचे हों, आचरण पवित्र हो और जीवन मानवता के कल्याण के लिए समर्पित हो।
