- FIR के बहाने ED दफ्तर में एंट्री
Ranchi ED office : झारखंड की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। इस बार विवाद की जड़ बना है 02 करोड़ रुपये रिश्वत के आरोपी द्वारा दर्ज कराई गई FIR, जिसके आधार पर झारखंड पुलिस सीधे प्रवर्तन निदेशालय (ED) के दफ्तर तक पहुंच गई। सवाल सिर्फ एक FIR का नहीं, बल्कि उस संवैधानिक मर्यादा का है, जिसमें राज्य पुलिस ने एक केंद्रीय जांच एजेंसी के परिसर को घेर लिया।
केंद्रीय एजेंसी पर दबाव या कानून का पालन?
ED का आरोप है कि झारखंड पुलिस की यह कार्रवाई जांच को प्रभावित करने और दबाव बनाने की कोशिश थी। बिना पूर्व समन्वय, बिना संवैधानिक प्रक्रिया के पालन के, सीधे ED दफ्तर में पुलिस बल की मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए।
क्या कोई राज्य पुलिस, एक आरोपी की FIR के आधार पर, केंद्रीय एजेंसी के दफ्तर को इस तरह घेर सकती है? या फिर यह पूरा मामला राजनीतिक संरक्षण में चल रही ताकत की परीक्षा है?
CISF बुलाने की नौबत क्यों आई?
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ED को अपने ही दफ्तर की सुरक्षा के लिए CISF को बुलाना पड़ा। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की तैनाती के बाद झारखंड पुलिस को पीछे हटना पड़ा।
यह दृश्य अपने आप में बताता है कि मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि संघीय ढांचे (Federal Structure) से जुड़ा हुआ है—जहां राज्य और केंद्र आमने-सामने खड़े दिखे।
ED हाईकोर्ट पहुंची, टकराव न्यायपालिका के दरवाजे पर
घटना के बाद ED ने सीधे हाईकोर्ट का रुख किया। ED का कहना है कि झारखंड पुलिस ने संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया और जांच एजेंसी की स्वतंत्रता पर आंच लाई।
अब यह मामला अदालत तय करेगी कि
क्या राज्य पुलिस की कार्रवाई वैध थी?
या फिर यह केंद्रीय एजेंसियों को डराने की कोशिश?
सियासत के बीच कानून की असली परीक्षा
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भ्रष्टाचार के आरोपी अब FIR की ढाल लेकर जांच एजेंसियों पर पलटवार करेंगे?
और क्या राज्य सरकारें, अपनी राजनीतिक मजबूरियों में, कानून से ऊपर खुद को समझने लगी हैं?
आज ED दफ्तर घिरा है, कल कोई और केंद्रीय संस्था हो सकती है। अगर इस पर स्पष्ट न्यायिक रेखा नहीं खींची गई, तो केंद्र–राज्य टकराव देश की जांच व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
यह सिर्फ ED और झारखंड पुलिस की भिड़ंत नहीं, बल्कि कानून बनाम सत्ता, संविधान बनाम सियासत की लड़ाई है। अब निगाहें हाईकोर्ट पर हैं—जहां तय होगा कि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता बचेगी या राजनीति के दबाव में दम तोड़ देगी।
