BMC Election : हार के बाद आसान नहीं ठाकरे परिवार की राह

Bindash Bol

अकु श्रीवास्तव

BMC Election : बृहन्मुम्बई महानगरपालिका (बीएमसी) का चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में हमेशा से बेहद अहम माना जाता रहा है। इस पर कब्जे के लिए राजनैतिक दल जो करें, कम ही माना जाता है। बीएमसी पर पिछले लगभग तीन से ज्यादा दशक से लगभग शिवसेना का प्रभुत्व रहा है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं कि यह देश का सबसे अमीर (75 हजार करोड़ का बजट) नगर निगम है। महाराष्ट्र के इतिहास में सर्वाधिक प्रभावशाली नेता बाल ठाकरे के निधन के बाद या उसके एक दशक पहले से ही सवाल उठने लगा था कि शिवसेना कब तक बीएमसी पर कब्जा रखेगी। यों तो महाराष्ट्र के इतिहास में सिर्फ आठ साल शिवसेना के मुख्यमंत्री (मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे) रहे लेकिन उसका प्रभाव पांच दशकों तक लगातार रहा। पहले विधानसभा की सत्ता से हटने और अब बीएमसी जाने के बाद तय है कि यह सबकुछ ठाकरे परिवार के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। वो भी तब जब दो दशकों से अलग चचेरे भाईयों ने हाथ मिला लिया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गठबंधन के बावजूद बीएमसी में महायुति (भाजपा और शिंदे नीत शिवसेना) आगे ही नहीं काफी आगे रही है। पहली बार भाजपा का मेयर बनने जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह ठाकरे परिवार के राजनैतिक पराभव की शुरुआत है?


दरअसल, बीएमसी पर करीब ढाई दशक तक लगातार अविभाजित शिवसेना का कब्जा रहा। इस पूरे दौर में शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की भूमिका सबसे अहम रही। बाला साहेब ने कभी मुख्यमंत्री बनने या सीधे सत्ता में बैठने की इच्छा नहीं जताई। उन्होंने हमेशा “रिमोट कंट्रोल” की राजनीति की। वे चुनाव नहीं लड़ते थे, सत्ता में नहीं बैठते थे, लेकिन सत्ता उनके इशारे पर चलती थी। यही उनकी सबसे बड़ी राजनैतिक समझ थी। बाहर रहकर दबाव बनाना, भीतर रहकर जवाबदेह होने से ज्यादा असरदार होता है, यह बात बाला साहेब ने बहुत पहले ही समझ ली थी। बीएमसी इस रणनीति की धुरी बन गई।
बीएमसी पर नियंत्रण का मतलब था- मुम्बई की सड़कों से लेकर ठेकों, निर्माण, पानी, सफाई और करोड़ों के बजट पर पकड़। शिवसेना ने बीएमसी को सत्ता का किला बना लिया। लेकिन यह सिर्फ बीएससी का मामला नहीं था। बीएमसी के बहाने शिवसेना हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार करती थी जो किरायेदारों, दुकानदारों और उद्योगपतियों पर पकड़ बनाते थे। समझने के लिए उदाहरण के तौर पर इतना ही काफी होगा कि मुम्बई में अगर आपको किराए का मकान लेना है तो ऐसे कार्यकर्ता या फिर दलाल हर ग्यारह महीने पर एक महीने का किराया वसूल लेते थे। (चाहे आप उसी मकान मेें रहें)। मुम्बई में ऐसे किराए के घरों की संख्या बीस लाख से ज्यादा है। अर्थशास्त्र आपको यहीं समझ में आ जाएगा। (यही हाल कोलकता का भी है।) इस तरह के मुम्बई में कई क्षेत्र हैं और हजारों करोड़ की वसूली होती है।
बाला साहेब राजनैतिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने शिवसेना की विचारधारा को मराठी अस्मिता तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद में आगे बढ़ाया। उनकी भाषा आक्रामक थी, तेवर चुनौती देने वाले थे। वे डर पैदा करते थे, लेकिन भरोसा भी। उनके बाद तस्वीर बदलने लगी। उद्धव ठाकरे राजनीति में आए, लेकिन बाला साहेब की तरह नहीं। उद्धव शांत हैं, साैम्य हैं, संतुलित हैं, संवाद में विश्वास रखते हैं लेकिन मुम्बई की राजनीति संवाद से ज्यादा दबाव और पकड़ की मांग करती है। उद्धव मुख्यमंत्री बने, यह बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन शिवसेना पहली बार सत्ता के केंद्र में आकर कमजोर भी हुई। बाहर रहकर जो पार्टी मजबूत थी, सत्ता में आकर वही पार्टी टूट गई।
राज ठाकरे ने बाला साहेब की आक्रामक शैली अपनाई, लेकिन समय बदल चुका था। उत्तर भारतीयों और बाद में दक्षिण भारतीयों पर तीखे बयान अब वही असर नहीं डालते, जो 60 या 70 के दशक में डालते थे। मुम्बई अब बहु-सांस्कृतिक यथार्थ को स्वीकार कर चुकी है।
बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज का गठबंधन इसी की उपज था। उम्मीद थी कि बिखरा मराठी वोट एक होगा, लेकिन मुम्बई की बर्बाद हालत से त्रस्त जनता के गुस्से को इस गणित ने नहीं समझा। बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज का साथ आना असुरक्षा का संकेत था। जनता ने इसे रणनीति नहीं, मजबूरी की तरह देखा। ऊपर से वर्षों से जमा आक्रोश- उगाही, भ्रष्टाचार, ठेकेदारी और पार्षद संस्कृति, सब एक साथ फूट पड़ा। सड़क, पानी, निर्माण अनुमति और ठेकों से जुड़ी कथित उगाही को लेकर लंबे समय से शिकायतें थीं। विभिन्न रिपोर्टों और राजनैतिक आरोपों में यह तक कहा गया कि अवैध उगाही का आंकड़ा तीन लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। आम मतदाता के बीच यह संदेश गया कि बीएमसी में लंबे समय तक सत्ता में रहने से भ्रष्टाचार बढ़ा है।
इस चुनाव में राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के साथ-साथ दक्षिण भारतीयों पर भी तीखे हमले किए। तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई को “रसमलाई” कहने जैसे बयान ने दक्षिण भारतीय समुदाय को भी नाराज कर दिया। इसका सीधा नुकसान गठबंधन को हुआ। वहीं, उद्धव ठाकरे को उम्मीद थी कि राज ठाकरे का साथ उन्हें बीएमसी पर कब्जा बनाए रखने में मदद करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसके विपरीत राज ठाकरे उद्धव के लिए नुकसानदायक साबित हुए।
अब बीएमसी चुनाव में हार के बाद ठाकरे परिवार के राजनैतिक पुनरुत्थान की राह और कठिन हो गई है। यह हार सिर्फ चुनावी नहीं है। यह संकेत है कि ठाकरे परिवार ने मुम्बई पर जो नैरेटिव कंट्रोल बनाया था, वह अब उनके हाथ से फिसल रहा है। भाजपा ने संगठन, संसाधन और नई शहरी आकांक्षाओं के जरिए उस खालीपन को भर दिया है। सवाल यही है कि क्या उद्धव और राज ठाकरे मिलकर उस विरासत को फिर से खड़ा कर पाएंगे, या यह हार ठाकरे परिवार के राजनैतिक पतन की शुरुआत साबित होगी।

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