- विदेश में निवेश और विकास की बात, देश में राष्ट्रवाद की राजनीति!
- ऑक्सफोर्ड की एक प्रोफेसर और झारखंड की सियासत में मचा बवाल
- मुलाकात एक, सवाल कई… ‘कूटनीति या विचारधारा?’
- क्या अंतरराष्ट्रीय संवाद भी अब सियासी कसौटी पर कसा जाएगा?
Hemant Soren Alpa Shah : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विदेश यात्रा ने राज्य की राजनीति में एक नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। दो देशों के दौरे पर निकले मुख्यमंत्री 23 जनवरी को ब्रिटेन में प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अल्पा शाह से मुलाकात करने वाले हैं। इस प्रस्तावित मुलाकात की सूचना सामने आते ही झारखंड में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। भाजपा ने इस मुलाकात को “विचारधारात्मक खतरा” बताते हुए सवालों की झड़ी लगा दी है, जबकि कांग्रेस इसे झारखंड को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की कोशिश करार दे रही है।
कौन हैं प्रोफेसर अल्पा शाह?
प्रोफेसर अल्पा शाह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में मानवविज्ञान (Anthropology) की प्रोफेसर हैं। उन्होंने भारत में आदिवासी समाज, वामपंथी आंदोलनों और विकास बनाम विस्थापन जैसे विषयों पर व्यापक शोध किया है। उनकी चर्चित किताब “Nightmarch: Among India’s Revolutionary Guerrillas” को लेकर पहले भी विवाद होते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इस पुस्तक में नक्सली आंदोलन के प्रति सहानुभूति झलकती है, जबकि समर्थकों के अनुसार यह एक अकादमिक शोध है, जिसमें जमीनी हकीकत को समझने का प्रयास किया गया है।
भाजपा का तीखा हमला: ‘अर्बन नक्सल’ का आरोप
झारखंड के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस मुलाकात को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर सीधा हमला बोला। मरांडी ने सवाल किया कि “क्या मुख्यमंत्री को पता है कि वे किससे मिलने जा रहे हैं?” उन्होंने आरोप लगाया कि प्रोफेसर अल्पा शाह को उनके लेखन और विचारों के कारण “अर्बन नक्सल” और वामपंथी एजेंडे का समर्थक माना जाता है।
मरांडी ने कहा कि मुख्यमंत्री के विदेश दौरे का एजेंडा ‘Sustainable Development’ बताया जा रहा है, लेकिन क्या उनके सलाहकारों ने इस ‘विशिष्ट अतिथि’ की पृष्ठभूमि पर विचार किया है? उन्होंने दावा किया कि अल्पा शाह की किताबें नक्सलियों को ‘क्रांतिकारी’ के रूप में पेश करती हैं और यह वही विचारधारा है जो भारत की एकता और सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है।
मरांडी ने यहां तक कहा कि “एक संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री का ऐसी शख्सियत से मिलना क्या शहीदों के बलिदान का अपमान नहीं है?” उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की कि वे विदेशी धरती पर किस विचारधारा को मंच दे रहे हैं, इस पर आत्ममंथन करें।
कांग्रेस का पलटवार: ‘शोध को राजनीति में घसीटना बंद करे भाजपा’
भाजपा के आरोपों पर कांग्रेस ने तीखा जवाब दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता ऋषीकेश सिंह ने बाबूलाल मरांडी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण और भ्रम फैलाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झारखंड के विकास, निवेश, आदिवासी हितों और सतत विकास जैसे गंभीर विषयों पर संवाद करने जाते हैं, न कि किसी के निजी वैचारिक विचारों का समर्थन करने।
ऋषीकेश सिंह ने आरोप लगाया कि भाजपा जानबूझकर शिक्षा और शोध संस्थानों को भी राजनीति का अखाड़ा बना रही है। उन्होंने कहा कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे विश्वस्तरीय संस्थान में होने वाले अकादमिक संवाद को ‘देशद्रोह’ या ‘नक्सल समर्थन’ से जोड़ना भाजपा की संकीर्ण सोच को दर्शाता है।
‘भाजपा का दोहरा मापदंड’ – कांग्रेस का बड़ा हमला
कांग्रेस प्रवक्ता ने भाजपा पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कई उदाहरण गिनाए। उन्होंने पूछा कि जब लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर श्रद्धांजलि देते हैं, तब भाजपा का राष्ट्रवाद कहां चला जाता है? कारगिल युद्ध के बाद अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शुरू की गई लाहौर बस यात्रा क्या आतंकवाद का समर्थन थी या शांति की पहल?
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान दौरे और बांग्लादेश के संदर्भ में भी सवाल उठाए। ऋषीकेश सिंह ने कहा कि “जब खुद करते हैं तो उसे कूटनीति कहते हैं और जब कोई और करे तो उसे देशद्रोह बता देते हैं। यही भाजपा का अवसरवादी चरित्र है।”
विकास बनाम राजनीति
कांग्रेस का कहना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का उद्देश्य झारखंड को वैश्विक निवेश मानचित्र पर लाना, आदिवासी हितों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में शामिल करना और सतत विकास के मॉडल पर चर्चा करना है। ऐसे में एक अकादमिक मुलाकात को विवाद में बदलना न केवल मुख्यमंत्री का, बल्कि झारखंड की जनता की आकांक्षाओं का भी अपमान है।
वहीं भाजपा का तर्क है कि मुख्यमंत्री को हर कदम पर यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी मुलाकातें और मंच देश की सुरक्षा और एकता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर गलत संदेश न दें।
सियासत के केंद्र में ऑक्सफोर्ड
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अंतरराष्ट्रीय अकादमिक संवाद भी अब घरेलू राजनीति की कसौटी पर कसा जाएगा? क्या किसी प्रोफेसर से मुलाकात को उसके कथित वैचारिक झुकाव से जोड़कर देखा जाना चाहिए, या इसे राज्य के विकास के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए?
फिलहाल, ऑक्सफोर्ड में होने वाली यह मुलाकात झारखंड की राजनीति में एक बड़े सियासी प्रतीक में बदल चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहता है या राज्य की राजनीति में कोई नया मोड़ लाता है।
