Pakistan Crisis :$2 बिलियन का सऊदी भाईचारा फेल!अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में पाकिस्तान पर खाड़ी देशों का बड़ा वार

Siddarth Saurabh
  • जो देश “भाई-भाई” का नारा लगाए, वही आज कटघरे में खड़ा है!
  • कर्ज़ मांगने की आदत और वादे तोड़ने की कीमत अब अदालत में चुकानी होगी!
  • पाकिस्तान की निवेश साख पर सबसे बड़ा सवाल — अपने ही “भाइयों” से मुक़दमा!

Pakistan Crisis : पाकिस्तान की आर्थिक विश्वसनीयता को एक और बड़ा झटका लगा है। सऊदी अरब और कुवैत के निवेशकों ने पाकिस्तान के खिलाफ $2 बिलियन (लगभग 166 अरब पाकिस्तानी रुपये) का अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता वाद (arbitration case) दायर कर दिया है। यह मामला 16 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में दर्ज हुआ, जिसमें 32 सऊदी और 5 कुवैती कंपनियाँ शामिल हैं।
इन निवेशकों में सऊदी अरब के प्रभावशाली कारोबारी अल-जुमैह ग्रुप की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। विवाद की जड़ पाकिस्तान की सबसे बड़ी निजी बिजली वितरण कंपनी के-इलेक्ट्रिक (K-Electric) है, जो कराची की लगभग 2.5 करोड़ आबादी को बिजली आपूर्ति करती है।
असल विवाद अक्टूबर 2016 से जुड़ा है, जब खाड़ी देशों के इन निवेशकों ने के-इलेक्ट्रिक में अपनी 66.4% हिस्सेदारी लगभग $1.77 बिलियन में बेचने का समझौता किया था। शुरुआती स्तर पर पाकिस्तानी नियामक संस्थाओं से मंज़ूरी भी मिल गई थी, लेकिन इसके बाद पाकिस्तान सरकार और संबंधित बोर्डों ने इस सौदे को लगातार टालते हुए लगभग एक दशक तक लटका कर रखा।
इस देरी के कारण निवेशकों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। पूंजी फँसी रही, रिटर्न नहीं मिला और कानूनी अनिश्चितता बढ़ती गई। आखिरकार, निवेशकों ने पाकिस्तान के “आंतरिक सिस्टम” से उम्मीद छोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का दरवाज़ा खटखटाया।
विडंबना यह है कि अभी कुछ ही हफ्ते पहले पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच ट्राइलेटरल डिफेंस कोऑपरेशन का ढिंढोरा पीटा जा रहा था — “इस्लामी भाईचारा”, “रणनीतिक साझेदारी” और “आपसी भरोसा” जैसे शब्दों से माहौल सजाया गया। लेकिन अब वही “भाई” पाकिस्तान पर धोखेबाज़ी और अनुबंध उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं।
के-इलेक्ट्रिक पहले से ही नियामक विवादों, बिजली आपूर्ति संकट और सरकारी हस्तक्षेप से जूझती रही है। यह केस न केवल पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र की साख पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि वहाँ विदेशी निवेश कितना असुरक्षित हो सकता है।
जब खाड़ी देश जैसे करीबी सहयोगी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत में पाकिस्तान के खिलाफ खड़े हों, तो यह निवेशकों के भरोसे के ताबूत में आख़िरी कील साबित हो सकता है। IMF के सख़्त कार्यक्रम, डॉलर संकट, गिरती मुद्रा और बढ़ते कर्ज़ के बीच यह कानूनी टकराव पाकिस्तान की राजकोषीय स्थिरता को और कमजोर करेगा।
साफ है — अब पाकिस्तान को तय करना होगा कि वह
कर्ज़ मांगकर मुल्क चलाना चाहता है या वादे निभाकर भरोसा बचाना।

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