- जो काम हथियार, प्रतिबंध और धमकी नहीं कर सके— वो भारत की कूटनीति ने कर दिखाया
- यूरोप को अब ‘सुपरपावर’ नहीं, ‘स्टेबल पावर’ चाहिए— और वो भारत है
Mother Of All Deals : तेज़ी से बदलते वैश्विक शक्ति समीकरणों के बीच भारत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह न तो किसी गुट का मोहरा है, न किसी साम्राज्य का पिछलग्गू— बल्कि एक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और संतुलनकारी महाशक्ति है।
भारत–यूरोपीय संघ के बीच हुआ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, जिसे खुद यूरोपीय नेतृत्व ने “Mother of All Deals” कहा, सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं है— यह 21वीं सदी की भू-राजनीति में भारत की निर्णायक एंट्री का ऐलान है।
यह डील उस समय हुई है जब दुनिया तीन बड़े तनावों से जूझ रही है.. …
- रूस-यूक्रेन युद्ध
- अमेरिका की घटती विश्वसनीयता
- चीन पर बढ़ता अविश्वास
ऐसे समय में यूरोप को एक ऐसे साझेदार की तलाश थी जो
रूस से बात भी कर सके, अमेरिका से दबाव में न आए,
चीन की तरह अपारदर्शी न हो, और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करता हो, और इस कसौटी पर केवल भारत खरा उतरा।
भारत: सॉफ्ट पावर से स्ट्रैटेजिक पावर तक
भारत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसने कभी भी जबरदस्ती नेतृत्व नहीं थोपा, बल्कि विश्वास अर्जित किया।
जहां अमेरिका दशकों से “सुरक्षा” के नाम पर यूरोप को
सैन्य निर्भरता में फंसाता रहा। नाटो के ज़रिए ब्लैकमेल करता रहा और अपनी शर्तों पर चलने को मजबूर करता रहा, वहीं भारत ने संवाद चुना, संतुलन रखा और Vasudhaiva Kutumbakam की भावना के साथ आगे बढ़ा।
यूरोप अब समझ चुका है कि रूस को पूरी तरह अलग-थलग करना अव्यावहारिक है।
रूस से संवाद बनाए रखने की एकमात्र विश्वसनीय खिड़की भारत है। और यही बात भारत को इस पूरी वैश्विक शतरंज में किंगमेकर बनाती है।
रूस फैक्टर और भारत की अद्भुत बैलेंसिंग
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने जो किया, वह इतिहास में पढ़ाया जाएगा….
- रूस से तेल भी लिया
- हथियार भी लिए
- लेकिन युद्ध का समर्थन नहीं किया
- शांति की अपील भी की
EU ने भारत पर दबाव डाला, लेकिन भारत झुका नहीं।
क्योंकि भारत जानता है स्थिरता प्रतिबंधों से नहीं, संतुलन से आती है। यूरोप को अब एहसास हो गया है कि “रूस को काबू करना है तो भारत को साथ लेना ही पड़ेगा।”
Mother of All Deals: आंकड़े नहीं, संकेत हैं
इस ऐतिहासिक FTA के तहत…
- दुनिया के 25% GDP को कवर करने वाला ट्रेड ब्लॉक बनेगा
- 2 अरब लोगों का फ्री ट्रेड ज़ोन
- 96.6% टैरिफ खत्म या बेहद कम
- EU को सालाना €4 बिलियन की बचत
- भारतीय टेक्सटाइल, ज्वेलरी, लेदर, टेक, डिफेंस को यूरोप में सीधी एंट्री
लेकिन असली बात ये नहीं है।
असली बात ये है कि यूरोप ने रणनीतिक रूप से भारत को चुन लिया है।
अमेरिका आउट, भारत इन?
अमेरिका आज भी ताकतवर है— लेकिन भरोसेमंद नहीं।
ट्रंप टैरिफ्स, अचानक प्रतिबंध, दोहरी नीतियां और सहयोगियों को इस्तेमाल करने की आदत ने यूरोप को थका दिया है।
चीन?
आर्थिक ताकत है, लेकिन
- पारदर्शिता नहीं
- लोकतांत्रिक मूल्य नहीं
- और भरोसा तो बिल्कुल नहीं
ऐसे में भारत
- लोकतंत्र है
- कानून का सम्मान करता है
- संस्कृति के साथ शक्ति जोड़ता है
और यही कारण है कि भारत आज “Soft Balancer” + “Cultural Superpower” बन चुका है।
वसुधैव कुटुम्बकम: दर्शन नहीं, डिप्लोमेसी
भारत की कूटनीति की जड़ में सिर्फ हित नहीं, संस्कृति है।
“वसुधैव कुटुम्बकम” कोई स्लोगन नहीं— यह भारत की रणनीति है।
यूरोप को अब समझ में आ गया है कि नैतिक शक्ति + यथार्थवाद = दीर्घकालिक स्थिरता
और यही समीकरण भारत पेश कर रहा है।
क्या भारत विश्वगुरु बन रहा है?
जो लोग दशकों से भारत के “विश्वगुरु” बनने के विचार पर हंसते रहे, उनका आधा जीवन गुजर गया— लेकिन भारत आज भी खड़ा है, और मज़बूती से आगे बढ़ रहा है। ये डील सिर्फ आज की नहीं, अगली 50 साल की वैश्विक राजनीति की नींव है।
भारत अब पूछ नहीं रहा—
दुनिया खुद पूछ रही है: “अगला कदम भारत क्या चाहता है?”
