BJP : बड़े बदलाव, नई रणनीति… क्या नितिन नबीन के साथ ‘न्यू एज बीजेपी’ की शुरुआत?

Madhukar Srivastava
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BJP : भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी हमेशा से अपने साहसिक और अप्रत्याशित फैसलों के लिए जानी जाती रही है। जब भी देश की राजनीति में बदलाव की लहर आती है या “मूड ऑफ द नेशन” बदलता है, बीजेपी अपने संगठनात्मक ढांचे में बड़े परिवर्तन करने से पीछे नहीं हटती। ऐसे में अपेक्षाकृत युवा नेता नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना भी एक ऐसा फैसला माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में पार्टी की दिशा तय कर सकता है। यह सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं बल्कि 2029 के चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया रणनीतिक प्रयोग भी हो सकता है।

बीजेपी का इतिहास बताता है कि पार्टी ने समय-समय पर अपने चेहरे और विचारधारा की प्रस्तुति को बदलते हुए राजनीति में नई जमीन तैयार की है। 90 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, तब पार्टी ने लाल कृष्ण आडवाणी को बड़ा चेहरा बनाया, लेकिन चुनावी राजनीति के समीकरणों को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाकर उदारवादी छवि पेश की। यह बीजेपी की पहली बड़ी रणनीतिक शिफ्ट थी, जिसने उसे गठबंधन की राजनीति में स्वीकार्यता दिलाई।

2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना भी ऐसा ही बड़ा निर्णय था, जिसने पार्टी को पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई। इसके बाद अमित शाह को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देना और वहां लगातार जीत हासिल करना बीजेपी की रणनीतिक सोच का उदाहरण बना। अब जब 45 वर्षीय नितिन नबीन को संगठन की कमान सौंपी गई है, तो राजनीतिक विश्लेषक इसे “यंग लीडरशिप एक्सपेरिमेंट” के रूप में देख रहे हैं। यह फैसला संकेत देता है कि पार्टी भविष्य की राजनीति में युवा चेहरे को आगे लाने की तैयारी कर रही है।

हालांकि, इस बदलाव के पीछे कई सवाल भी उठ रहे हैं। क्या यह वास्तविक नेतृत्व परिवर्तन है या सिर्फ प्रतीकात्मक फैसला? बीजेपी में अध्यक्ष का पद हमेशा महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन यह भी सच है कि केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका सबसे निर्णायक रहती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि नितिन नबीन संगठनात्मक फैसलों में कितना स्वतंत्र प्रभाव दिखा पाते हैं।

बीजेपी की पुरानी पीढ़ी — अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह और भैरोसिंह शेखावत — ने जिस दौर की राजनीति देखी, वह आज की राजनीति से काफी अलग थी। उस समय वैचारिक मर्यादा और संतुलन पर ज्यादा जोर था। लेकिन 2014 के बाद पार्टी की राजनीतिक शैली में आक्रामकता और चुनावी जीत को प्राथमिकता देने का ट्रेंड मजबूत हुआ। यह बदलाव नई पीढ़ी की सोच को दर्शाता है, जिसमें विचारधारा के साथ-साथ चुनावी रणनीति सबसे बड़ा लक्ष्य बन गई है।

नितिन नबीन की नियुक्ति को लेकर एक बड़ा तर्क यह भी दिया जा रहा है कि पीएम मोदी के “एक लाख युवाओं को राजनीति में लाने” के विजन को आगे बढ़ाने की कोशिश हो सकती है। अगर ऐसा है, तो बीजेपी का यह कदम संगठन में नई ऊर्जा और डिजिटल दौर के मुताबिक नई रणनीति लाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। लेकिन आलोचक यह भी कहते हैं कि पार्टी में जो युवा चेहरे उभर रहे हैं, वे ज्यादातर राजनीतिक परिवारों से आते हैं या अन्य दलों से शामिल हुए नेता हैं, जिससे “ग्रासरूट कैडर” की भूमिका कमजोर हो सकती है।

एक और चर्चा का विषय यह है कि बीजेपी में अब आरएसएस से जुड़े पारंपरिक कार्यकर्ताओं की तुलना में अन्य दलों से आए नेताओं का प्रभाव बढ़ रहा है। इससे पार्टी की मूल वैचारिक पहचान पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव बीजेपी के “कांग्रेसीकरण” की दिशा में संकेत देता है, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह विस्तार और व्यापकता की राजनीति है।

नई पीढ़ी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नेतृत्व जनाधार तैयार कर पाएगा या सिर्फ संगठनात्मक प्रयोग बनकर रह जाएगा। आज भारतीय राजनीति में लोकप्रिय युवा नेताओं की कमी को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में बीजेपी का यह कदम जोखिम भरा भी हो सकता है और अवसर भी। अगर नितिन नबीन अपनी अलग पहचान बनाते हैं और संगठन को नई दिशा देते हैं, तो यह बीजेपी के लिए एक नई शुरुआत हो सकती है।

आने वाले दो वर्षों में कई बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं, जो इस प्रयोग की असली परीक्षा होंगे। अगर पार्टी इन चुनावों में सफलता हासिल करती है, तो यह माना जाएगा कि युवा नेतृत्व पर दांव सही साबित हुआ। लेकिन अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, तो यह भी संभव है कि पार्टी फिर से अपनी पुरानी रणनीति की ओर लौटे।

कुल मिलाकर, बीजेपी का यह कदम सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि संगठनात्मक पुनर्संरचना की शुरुआत हो सकता है। यह तय करेगा कि पार्टी 2029 की लड़ाई किस रणनीति और किस पीढ़ी के भरोसे लड़ने जा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या यह सच में “नई बीजेपी” का जन्म है या सिर्फ समय के साथ किया गया एक और राजनीतिक प्रयोग?

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