India Oil Policy : तेल राजनीति नहीं, रणनीति से खरीदता है भारत: US डील, रूसी सप्लाई और वेनेजुएला विकल्प पर विदेश सचिव विक्रम मिसरी का बड़ा संदेश

Siddarth Saurabh

India Oil Policy : अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील को लेकर तेज़ होती चर्चाओं के बीच जब यह दावा सामने आया कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर सकता है, तब देशभर में ऊर्जा नीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई। इसी बीच विदेश सचिव विक्रम मिसरी का बयान सामने आया, जिस ने इस पूरे मुद्दे पर भारत का रुख बेहद साफ कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की तेल खरीद नीति किसी भी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, आर्थिक संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर तय होती है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में तेल खरीदते समय भारत के सामने कई चुनौतियां होती हैं—वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन की अनिश्चितता। मिसरी ने बताया कि भारत के लिए तीन प्रमुख फैक्टर सबसे अहम हैं: तेल की उपलब्धता, सही और प्रतिस्पर्धी कीमत, और सप्लाई की निरंतरता। यही कारण है कि भारत किसी एक देश पर निर्भर रहने की बजाय कई देशों से तेल खरीदने की रणनीति अपनाता है।

US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी जिसमें दावा किया गया कि भारत रूसी तेल खरीदने से पीछे हट सकता है। हालांकि विदेश सचिव ने साफ किया कि भारत ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुसार बाजार से तेल खरीदता रहेगा और रूस के साथ ऊर्जा संबंध अचानक खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। भारत का उद्देश्य किसी देश का पक्ष लेना नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करना है।

इसी संदर्भ में वेनेजुएला का नाम भी चर्चा में आया। भारत ने संकेत दिया है कि अगर वेनेजुएला से तेल आयात व्यावसायिक रूप से लाभकारी साबित होता है और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से सही रहता है, तो उस विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है। यह कदम भारत की उस दीर्घकालिक नीति का हिस्सा है जिसमें वह अपने तेल स्रोतों का विविधीकरण कर जोखिम कम करना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की रणनीति भारत को वैश्विक दबावों से बचाने में मदद करती है।

रूस की प्रतिक्रिया भी इस पूरे मामले में अहम रही। क्रेमलिन ने कहा कि भारत एक स्वतंत्र देश है और उसे अपने आर्थिक हितों के आधार पर फैसले लेने का पूरा अधिकार है। रूस ने यह भी माना कि भारत लंबे समय से बाजार की परिस्थितियों और अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तेल खरीदता रहा है, इसलिए मौजूदा स्थिति कोई नई बात नहीं है।

इस बीच अमेरिका द्वारा लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ ने भारतीय रिफाइनरी कंपनियों पर दबाव जरूर बढ़ाया है। हालांकि भारत की प्राथमिकता अब भी यही है कि आम उपभोक्ताओं को स्थिर कीमत पर ऊर्जा मिलती रहे। मिसरी ने कहा कि जब कोई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80–85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, तो उसे कीमत और सप्लाई दोनों का संतुलन बनाए रखना पड़ता है। यही वजह है कि भारत हर डील को केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से देखता है।

विदेश सचिव के मुताबिक, भारत सिर्फ एक बड़ा उपभोक्ता नहीं है बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कई देशों से तेल खरीदकर भारत कीमतों और सप्लाई में संतुलन बनाने में योगदान देता है। यह बयान भारत की उस स्वतंत्र विदेश नीति को भी दर्शाता है जिसमें वह वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए अपने हितों को प्राथमिकता देता है।

पूरे बयान का सार यही है कि भारत की तेल नीति का असली मंत्र है—राष्ट्रीय हित पहले। चाहे अमेरिका के साथ ट्रेड डील हो, रूस के साथ ऊर्जा साझेदारी या वेनेजुएला जैसे नए विकल्पों की तलाश, भारत हर फैसला अपनी आर्थिक मजबूती और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही करेगा। भारत तेल खरीदता है तो केवल कीमत या राजनीति नहीं देखता, बल्कि एक व्यापक रणनीति के तहत अपने नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करता है।

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