JMM : असम में झामुमो का बड़ा दांव: झारखंड वाला फॉर्मूला अब पूर्वोत्तर में!

Madhukar Srivastava

* बीजेपी को चुनौती देने मैदान में उतरे हेमंत सोरेन

JMM : झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अब अपनी राजनीतिक जमीन झारखंड से बाहर फैलाने की रणनीति पर खुलकर काम शुरू कर दिया है। असम विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी ने बड़ा दांव खेलते हुए वही सामाजिक समीकरण लागू करने की तैयारी की है, जिसने झारखंड में बीजेपी की सत्ता को चुनौती दी थी।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम के कोकराझार जिले के गोसाईगांव विधानसभा क्षेत्र से चुनावी अभियान का आगाज कर साफ संकेत दिया कि झामुमो अब पूर्वोत्तर की राजनीति में स्थायी जगह बनाने के मिशन पर है।

कहां से झामुमो ने ठोकी ताल?

126 सीटों वाली असम विधानसभा में झामुमो सीमित लेकिन रणनीतिक लड़ाई लड़ रही है। पार्टी कुल 18 सीटों पर चुनाव मैदान में है।
चार सदस्यीय रणनीतिक समिति ने लंबी समीक्षा के बाद उन सीटों का चयन किया, जहां सामाजिक समीकरण झामुमो के पक्ष में बन सकता है। शुरुआत में 21 उम्मीदवारों की घोषणा हुई थी, लेकिन तीन प्रत्याशियों का नामांकन रद्द होने के बाद अब 18 सीटों पर ही मुकाबला तय हुआ है।
झामुमो का फोकस उन इलाकों पर है जहां झारखंड मूल के आदिवासी, चाय बागान मजदूर, कुड़मी समाज और अल्पसंख्यक समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

जेएमएम के उम्मीदवार

विधानसभा  उम्मीदवार का नाम
सीट
मजबत  – प्रीति रेखा बारला,
विश्वनाथ – तेहरू गौर
खुमतई – अमित नाग
चाबुआ –  भूपेन मुरारी
गोसाईगांव –  फेडक्रिसन हांसदा
सोनारी –  बलदेव तेली
दुलाजान  – पीटर मिंज
रोगोंनादी –  पबन सौताल
डिगबोई   –  भरत नायक
भेरगांव –  प्रभात दास पनिका
तिंगखौंग –  महावीर बास्के
बरचलिया –  अब्दुल मजान
रांगापाड़ा –  मैथ्यू टोपनो
मरगहटिया – जमाल मिंज
नहरकटिया  – संजय बाघ
सेमाकुम –  मुन्ना कर्मकार
दुमदुमा –  रत्नाकर तांती
सारू पाथर – साहिल मुंडा
टीटाबोर  – सोनिया
बोकाजन –  प्रतापचिंग रंगपहाड़
खोवांग –  प्रभाकर दास

झामुमो का ‘जिताऊ फॉर्मूला’ क्या है?

असम में झामुमो जिस राजनीतिक समीकरण पर दांव लगा रही है, उसे पार्टी के अंदर M-KU-AA मॉडल कहा जा रहा है —

* मुस्लिम

* कुड़मी

* आदिवासी

* साथ में ईसाई समुदाय का समर्थन

पार्टी का मानना है कि अगर यह सामाजिक गठजोड़ एकजुट हुआ तो असम की राजनीति में नई शक्ति संतुलन बन सकता है।

मुस्लिम वोट बैंक पर नजर

असम की राजनीति में मुस्लिम मतदाता हमेशा निर्णायक रहे हैं। राज्य की बड़ी आबादी मुस्लिम समुदाय से आती है और कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव परिणाम तय करने की क्षमता रखती है। झामुमो इसी सामाजिक प्रभाव को अपने पक्ष में जोड़ने की कोशिश कर रही है।

चाय बागानों के झारखंडी आदिवासी बने केंद्र

झामुमो की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा हैं असम के टी ट्राइब्स यानी चाय बागानों में काम करने वाले झारखंड मूल के आदिवासी।
करीब एक सदी पहले अंग्रेजों द्वारा झारखंड से असम लाए गए ये समुदाय आज भी सामाजिक पहचान और अधिकारों की मांग को लेकर सक्रिय हैं। हेमंत सोरेन सीधे इन्हीं भावनात्मक और ऐतिहासिक जुड़ाव पर राजनीति खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं।

कुड़मी समाज पर भी बड़ा दांव

असम में करीब 25 लाख कुड़मी समुदाय की मौजूदगी झामुमो के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर मानी जा रही है। कई विधानसभा क्षेत्रों में यह समाज जीत-हार तय करता है। पार्टी इन समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान का भरोसा दे रही है।

एक साल से चल रही थी ग्राउंड तैयारी

सूत्रों के अनुसार, झामुमो की टीम पिछले एक वर्ष से असम में संगठन विस्तार और सामाजिक संपर्क अभियान चला रही थी। कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर आदिवासी और पिछड़े समुदायों से संवाद स्थापित किया, उनकी समस्याएं सुनीं और अधिकारों की लड़ाई लड़ने का वादा किया।
पार्टी का बड़ा वादा यह भी है कि उपेक्षित समुदायों को मजबूत पहचान और राजनीतिक आवाज दिलाई जाएगी।

क्या सफल होगा झामुमो का पूर्वोत्तर मिशन?

अगर झामुमो का सामाजिक समीकरण जमीन पर सफल हुआ, तो यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।
असम में झामुमो की एंट्री को अब राजनीतिक विश्लेषक हेमंत सोरेन के ‘पूर्वोत्तर प्रयोग’ के रूप में देख रहे हैं — जहां झारखंड मॉडल को नए भूगोल में आजमाया जा रहा है।

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