JMM : असम विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन दिनों पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ असम में डेरा डाले हुए हैं। मार्च के अंतिम सप्ताह से ही उन्होंने चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली है और लगातार जनसभाओं, बैठकों और संगठनात्मक रणनीति पर काम कर रहे हैं।
आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय पहचान देने की कोशिश
हेमंत सोरेन असम में चुनाव प्रचार को केवल सीट जीतने की लड़ाई नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति के राष्ट्रीय विस्तार के अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनके अभियान का केंद्र असम के चाय बागानों में काम कर रहे झारखंड मूल के आदिवासी समुदाय हैं। झामुमो इन क्षेत्रों में आदिवासियों के हक, पहचान और क्षेत्रीय अधिकारों को मुख्य चुनावी मुद्दा बना रही है।
हिमंता बिस्वा सरमा के गढ़ में सीधी चुनौती
राजनीतिक रूप से यह अभियान प्रतीकात्मक भी माना जा रहा है। 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा झारखंड बीजेपी के चुनाव प्रभारी रहे थे और उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार पर तीखे हमले किए थे। उसी समय सोरेन ने असम जाकर राजनीतिक जवाब देने की बात कही थी। अब असम में सक्रिय चुनाव प्रचार को उसी राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस से दूरी या नई राजनीतिक दिशा?
असम चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया और लगभग 21 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया। नामांकन रद्द होने के बाद पार्टी के 18 उम्मीदवार मैदान में हैं। यह फैसला राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार हेमंत सोरेन की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की ओर इशारा करता है।
चाय जनजाति वोट बैंक पर विशेष फोकस
असम के ऊपरी इलाकों में बड़ी संख्या में चाय जनजाति के लोग रहते हैं, जिनकी ऐतिहासिक जड़ें झारखंड से जुड़ी हैं। झामुमो इसी सामाजिक आधार को राजनीतिक समर्थन में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। हेमंत सोरेन लगातार इन क्षेत्रों में सभाएं कर आदिवासी अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं, साथ ही खुद को वंचित वर्गों और अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
‘किंग’ नहीं तो ‘किंगमेकर’ बनने की तैयारी
झामुमो भले ही असम में सत्ता की सीधी दावेदार न हो, लेकिन पार्टी नेतृत्व का लक्ष्य निर्णायक भूमिका हासिल करना है। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि झामुमो 5 से 10 सीटें भी जीतने में सफल रहती है, तो सरकार गठन की राजनीति में वह ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकती है।
असम चुनाव से आगे की राजनीति
असम में हेमंत सोरेन की सक्रियता सिर्फ चुनावी प्रयोग नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति भी मानी जा रही है। अब देखना होगा कि यह अभियान झामुमो को पूर्वोत्तर में नई पहचान दिलाता है या केवल राजनीतिक संदेश तक सीमित रह जाता है।
