Bengal Elections 2026 : 1971 का व्यंग्य आज भी जिंदा!

Madhukar Srivastava

* 1971 के आरके लक्ष्मण कार्टून के संदर्भ में 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: एक रिपोर्ट

Bengal Elections 2026 : भारत के महान राजनीतिक कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण ने 1971 के पश्चिम बंगाल चुनावों पर जो चार कार्टून बनाए थे, वे केवल व्यंग्य नहीं थे — बल्कि उस दौर के राजनीतिक हिंसा, डर और लोकतांत्रिक संकट का दस्तावेज़ थे। आज भी ये कार्टून चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि कई विश्लेषक मानते हैं कि बंगाल की राजनीति में हालात बदले कम, दोहराए ज़्यादा गए हैं।

आरके लक्ष्मण के 1971 के चार प्रसिद्ध कार्टून…..
“All is Well”,
“The Dark Hole”,
“The Bengal Tiger” 

“Seeking Information”

पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल को व्यंग्यात्मक तरीके से चित्रित करते हैं। इनमें सेना-टैंक की तैनाती के बावजूद “कोई खतरा नहीं” का आश्वासन, बूथ पर हिंसा और हत्याओं का अंधेरा गड्ढा, “बंगाल टाइगर” का प्रतीकात्मक डर, तथा पुलिस द्वारा “सुरक्षा” के नाम पर जानकारी मांगते हुए वोटरों से पूछताछ – ये सब 55 साल पुरानी सच्चाई को उजागर करते हैं।
बिल्कुल सही बात है कि… “Things have only gotten much worse since then.” आज 7 अप्रैल 2026 को, जब 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रक्रिया चरम पर है (मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू, नामांकन चल रहा), तो हिंसा, वोटर लिस्ट विवाद और भारी सुरक्षा तैनाती के बीच यह देखना जरूरी है कि स्थिति कितनी बदली या बिगड़ी है।

वर्तमान चुनाव की स्थिति (अप्रैल 2026)

* चुनाव कार्यक्रम: चुनाव आयोग ने 15 मार्च 2026 को घोषणा की। मतदान दो चरणों में – 23 अप्रैल (152 सीटें) और 29 अप्रैल (142 सीटें)। वोटों की गिनती 4 मई 2026 को। कुल 294 विधानसभा सीटें।

* मुख्य दल: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता में तीसरी बार, भाजपा मुख्य विपक्ष, कांग्रेस-वामपंथी हाशिए पर।

* विशेष तथ्य: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद वोटर लिस्ट में 62 लाख नाम कटे, जिससे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। ममता बनर्जी ने इसे “रिवेंज वोट” का मुद्दा बनाया है।

कार्टूनों से समानताएं और वर्तमान स्थिति

1.”All is Well” (सेना-टैंक के बीच “कोई खतरा नहीं, चुनाव सुनिश्चित”)

1971 में सेना तैनात थी। 2026 में स्थिति और गंभीर हो गई है।  केंद्र ने 2400 कंपनियां CAPF (CRPF आदि) तैनात करने का फैसला किया। 2021 के 1071 कंपनियों से दोगुनी से ज्यादा। पहले चरण में मार्च से ही 780 कंपनियां पहुंच चुकी हैं।
आश्वासन: चुनाव आयोग “शून्य सहनशीलता” का दावा कर रहा है, लेकिन पूर्व-चुनाव हिंसा जारी है।

2.”The Dark Hole” (चुनावी हिंसा, चीख-पुकार, “वोट बिना डर के डालो” का आश्वासन)

1971 का “डार्क होल” आज और गहरा हो गया है। पश्चिम बंगाल पिछले दशक में भारत में चुनावी हिंसा में नंबर 1 राज्य है। मार्च 2026 में ही टीएमसी बूथ प्रेसिडेंट की हत्या, भाजपा कार्यकर्ता की हत्या, कांग्रेस कार्यालय में झड़प और मालदा-मुर्शिदाबाद में जुडिशल अधिकारियों का घेराव हो चुका है। टीएमसी नेता के “रोलर” थ्रेट का वीडियो वायरल। आयोग ने 6 मार्च से ही हिंसा के 6 मामले दर्ज किए।

3.”The Bengal Tiger” (वोटिंग बूथ पर बंगाल टाइगर – प्रतीकात्मक बूथ कैप्चरिंग)

आज “टाइगर” का रूप बदला है – वोटर लिस्ट से नाम कटने, घर-घर धमकी और बूथ पर संभावित कब्जे की आशंका। हजारों लोग वोटिंग अधिकार से वंचित होने की शिकायत कर रहे हैं। टीएमसी और भाजपा दोनों आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

4.“Seeking Information” (पुलिस “सुरक्षा” दे रही, लेकिन “मर्डर” रिपोर्ट के बीच पूछताछ)

केंद्रीय बलों की भारी तैनाती के बावजूद राजनीतिक हत्याएं और धमकियां जारी। ममता बनर्जी ने “रिवेंज वोट” का आह्वान किया, जबकि विपक्ष “जंगल राज” बता रहा है। चुनाव आयोग ने पिछले चुनावों की हिंसा रिपोर्ट मांगी है, लेकिन मैदान में वही पुराना माहौल।

क्या बदला और क्या बदतर हुआ?

* बदला: चुनाव अब दो चरणों में (पहले 8 चरण थे), CAPF की संख्या बढ़ी, और आयोग सक्रिय दिख रहा है।

* बदतर: 1971 की तुलना में हिंसा संस्थागत हो गई है। वोटर लिस्ट विवाद नया आयाम जोड़ा गया। पिछले 10 साल में पश्चिम बंगाल में चुनावी मौतों और झड़पों की संख्या सर्वाधिक। टीएमसी-भाजपा के बीच तीखा मुकाबला, लेकिन आम मतदाता डर और अविश्वास के बीच है।

बंगाल की राजनीति पर लंबे समय से एक आरोप रहा है..
पोस्ट-पोल हिंसा।

हालिया रिपोर्टों में भी चुनावी हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए चुनाव आयोग ने रिपोर्ट मांगी है, जिसमें 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव से जुड़े मामलों की समीक्षा शामिल है।
यानी 1971 में कार्टून जिस डर और संघर्ष को दिखा रहे थे, उसी तरह की बहस आज भी जारी है।
आरके लक्ष्मण के कार्टून आज भी प्रासंगिक हैं – शायद ज्यादा। 1971 में “All is Well” कहने वाले नेता आज भी वही आश्वासन दे रहे हैं, जबकि मैदान में “Dark Hole” और “Bengal Tiger” का माहौल गहराता जा रहा है। 23-29 अप्रैल को मतदान होगा। अगर केंद्र और राज्य सरकारें, चुनाव आयोग तथा सभी दल मिलकर हिंसा पर अंकुश लगाएं और वोटर लिस्ट विवाद सुलझाएं, तभी “निष्पक्ष चुनाव” का दावा सार्थक होगा। अन्यथा, 55 साल बाद भी बंगाल का चुनावी व्यंग्य वही रहेगा – बस स्केल बड़ा हो गया है।

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