* सुस्त सिस्टम से लड़ते फुनसुख, और सोए हुए समाज का ‘पुकी लीडर’ प्रेम
* फेल होते बच्चों से ‘ऑपरेशन न्यू होप’ तक: वांगडू को कोसने से पहले लद्दाख का सच जान लीजिए!
* निस्वार्थ संघर्ष का मज़ाक: जब समाज ही अपने बच्चों के रक्षक के खिलाफ खड़ा हो जाए
* सवाल फुनसुख पर नहीं, हमारी क्रिटिकल थिंकिंग पर है!
रेहान
Sonam Wangchuk : एक जन ने कहा है कि फुनसुख वांगडू को क्या जरूरत थी सरकार के विरोध में हो रहे आंदोलन में जाने की? और सच कहू तो मुझे भी लगता है कि फुनसुख वांगडू को अनशन पर लेटे लेटे अब मर जाना चाहिए,शर्म और अफसोस से।
क्योंकि जो काम फुनसुख ने किया है,शिक्षा के लिए,उस काम को करने के बावजूद भी अगर उन्हें फिर से देश को याद दिलाना पड़े कि, मै पहले जवानी में भी ऐसी छिछोरी हरकते कर चुका हू,और आज बुढ़ापे में भी शायद यही करते करते मर जाऊंगा।
काकरोच पार्टी वालों के मुद्दे में फुनसुख वांगडू नहीं घुसे है दोस्त ,शिक्षा तो वो मुद्दा है जिसके लिए फुनसुख तब से लड़ रहे है, जब इस देश को विश्व पटल पर कोई जानता भी नहीं था।
बात है 1987 है 88 की, फुनसुख वांगडू कही से मेकैनिकल इन्जीनियरिंग करके जब लद्दाख लौटे तो वहां उन्हें अपने आस पास दो चीजे गलत होती दिखाई दी।वो आंख मूंद सकते थे, निगाह फेर सकते थे,पर वो चेक करने चले गए,और फिर इसी की लत लग गई।
उस वक्त लद्दाख का हाल ऐसा था,कि जिस वक्त (1981 कि जनगणना) पूरे देश में लिट्रेसी रेट 43.6% था तब लद्दाख में 15 के आसपास थी।पर ये वहा के लोगों की असल दिक्कत नहीं थी, असल दिक्कत तो ये थी कि जो बच्चे स्कूल जाते भी थे तो वो दसवीं की परीक्षा पास ही नहीं कर पाते थे।
1990 के दशक के बीच में,लेह के मैट्रिक के एग्जाम के रिजल्ट में सिर्फ 5% बच्चे पास हुए थे,यानी हर बीस बच्चों के ग्रुप में,19 बच्चे फेल हुए थे।
तब से ही लड़ाई शुरू हो गई भाई की,सबसे पहले वांगडू ने,ऐसे बच्चों को ढूंढा जो दसवीं में फेल हुए थे,और उन्हें पढ़ाना शुरू किया, उन्हें फिर से दसवीं का एग्जाम दिलवाया,धीरे धीरे ही सही कुछ बच्चे पास होने लगे।
सब खुश थे,फुनसुख यही रुक जाते तो भी लद्दाख के लोग उन्हें महान मानते ,पर वो शायद बहुत लालची प्रवृत्ति के थे।
फुनसुख ने नोटिस किया कि, कमी सिर्फ बच्चों में नहीं थी,कमी उस एजुकेशनल सिस्टम में थी,जो देश के बड़े हिस्सों से तो मैच करता था,पर लद्दाख जैसे छोटे इलाकों के इतिहास और रोजमर्रा की जिंदगी से मैच नहीं करता था।
इसे ऐसे समझिए कि,जब आपका बच्चा पढ़ने जाता है तो उसे,इंग्लिश से लेकर मैथ और साइंस तक सब जगह सेब का एग्जांपल देकर समझाया जाता है,सोच कर देखिए बचपन में अगर हमने ए फॉर avacado पढ़ा होता,
या फिर ये हिसाब लगाया होता कि किसने, किसको कितने, अवकादो दिए है,तो हमारी मैथ आज और भी ज्यादा बदतर होती। क्योंकि सेब के बारे में ज्यादातर लोग जानते है, अवकादों के बारे में नहीं।
सेम यही चीज लद्दाख के बच्चों के साथ हो रही थी, उन्हें जो चीज पढ़ाई जाती थी, उनमें जो सीनारियों जो एग्जाम्पल यूज़ होते थे,उससे वो कनेक्ट ही नहीं कर पाते थे।
अब इस समस्या को लेकर फुनसुख चीन नहीं गए, यूएन नहीं गए,किसी दूसरे देश से अपने देश की शिकायत नहीं की, उन्होंने इस चीज को स्टार्टअप नहीं बनाया,उस वक्त के बायजू नहीं बने।
उल्टा वो गए सरकार के पास, सरकार से बोले कि मालिक ध्यान दीजिए, बच्चों का फ्यूचर की बात है,और पता नहीं कैसी सरकार थी कि,देर से ही सही,पर फुनसुख की बात मान गई, और फिर दोनों ने मिलकर लद्दाख में एक प्रोग्राम चलाया।
ऑपरेशन न्यू होप,यानी कि नई उम्मीद,फुनसुख ने एक कमेटी बनवाई हर गांव में,विलेज एजुकेशन कमेटीज के नाम से, और इस कमेटी को ये अधिकार था कि वो अपने बच्चों के लिए बने एडुकेशन मॉडल पर अपना फीडबैक दे सके, मॉनिटर कर सके।
फिर धीरे धीरे,किताबें बदली गई,टीचर्स को ट्रेन किया गया, और सिलेबस को और ज्यादा प्रैक्टिकल बनाया गया,और धीरे धीरे,छोटी छोटी लड़ाइयाँ लड़कर,नतीजा ये निकला कि,जिस जगह से कभी बीस में से 1 बच्चा मैट्रिक पास होता था, वही हर दूसरा बच्चा मैट्रिक पास होने लगा।
तो फुनसुख भाई तो बेचारे भरी अपनी जवानी से ही ये मुद्दा लेकर ढो रहे है?और शर्म और अफसोस जैसा कुछ उनके भीतर होता तो ये पागलपन वो करते ही क्यू, वो भी बार बार। आप सवाल किस पर कर रहे है, किसको बचाने के लिए आप किस पर उंगली उठा रहे है, एक पल को सोचकर तो देखिए।
क्रिटिकल थिंकिंग का बेसिक सेंस तो यही कहता है न कि अगर कोई इंसान कोई काम,बिना किसी रिवॉर्ड के लिए करे, विपरीत परिस्थितियों में करे,और उस काम का सामाजिक ढांचे पर जरूरी असर पड़ रहा हो,तो आप उस आदमी का साथ देते है।
पर आप तो दोस्त मजाक बनाने लगे,ये भूलकर की उसकी लड़ाई आपसे नहीं आपके लिए है,आपको क्या लग रहा है कि फुनुस्ख के बेटों की कोई फैक्ट्री है किताबों की,जो शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से मुनाफे में आ जाएगी?
मतलब यही सब कारण आपको समझ आते है न? आप ऐसे कठोर लोगों को पूजने लगे है, कि आप को ये संभावना ही नहीं लगती कि एक इंसान दूसरे इंसान के लिए बिना गर्ज भी कुछ छोटी बड़ी चीज कर सकता है,ये जानते हुए भी इंसान के बस का नहीं है बड़े लोगों से लड़ना,पर फिर भी वो लड़ता है,उस रिवॉर्ड के लिए जिसकी मलाई आपके बच्चे खाएंगे।
आप तो उल्टा उसकी,या यू कहे कि अपने बच्चों के भविष्य की लड़ाई के बीच में खड़े है, क्योंकि आपको डर लगता है कि फुनसुख आपके pookie leader को बुलि न कर दे।
जबकि शिक्षा ऐसा मुद्दा है जो आप नहीं सुधारेंगे तो आप ही झेलेंगे,इस जुलाई नहीं तो अगली जुलाई, नहीं तो उसके अगली,आप को समझ आएगा कि अब कोई फुनसुख नहीं आएगा,क्योंकि फुनसुख सुस्त सिस्टम से तो लड़ सकता है, पर सुस्त सुप्त,समाज से नहीं।