Kriti Sanon : रक्षाबंधन के एक ज्वेलरी विज्ञापन में कृति सेनन के इंडो-वेस्टर्न पहनावे (ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज और ड्रेप्ड स्कर्ट) ने सोशल मीडिया पर ‘संस्कृति बनाम आधुनिकता’ की एक नई बहस छेड़ दी है। मामला सिर्फ ट्रोल्स तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें बॉलीवुड से लेकर देश की शीर्ष सियासत तक सीधी एंट्री हो चुकी है।
किसने क्या रुख अपनाया?
* ट्रोल्स का तर्क: रक्षाबंधन जैसे आत्मीय और पारंपरिक त्योहार पर ऐसे आधुनिक कपड़े ‘पवित्रता’ और ‘मर्यादा’ के खिलाफ हैं।
* कृति सेनन का पलटवार: संस्कृति और सम्मान इंसान के दिल और सोच में होते हैं, कपड़ों की लंबाई में नहीं। त्योहार भावनाओं से मनाए जाते हैं, न कि दूसरों के तय किए गए ड्रेस कोड से।
* कंगना रनौत का सवाल: आज महिलाओं के पास पारंपरिक पहनावों के अनगिनत गरिमामय विकल्प हैं, तो फिर त्योहार के विज्ञापन में जानबूझकर ऐसी ‘अजीब स्टाइलिंग’ क्यों चुनी गई?
* राहुल गांधी का खुला समर्थन: नेता प्रतिपक्ष ने साफ शब्दों में कहा—‘एक महिला क्या पहनती है, क्या करती है और कहां जाती है, यह पूरी तरह उसकी अपनी पसंद है। अपनी आजादी का इस्तेमाल करने पर महिलाओं को ट्रोल करना बंद होना चाहिए।’

चर्चा का असली केंद्र
यह विवाद सिर्फ एक विज्ञापन के कपड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़ा सामाजिक सवाल खड़ा करता है….
क्या बदलते दौर में परंपराओं को व्यक्त करने का तरीका भी बदल सकता है, या फिर भारतीय त्योहारों के नाम पर महिलाओं की पसंद को आज भी बंदिशों में बांधा जाना तय है?
जब एक तरफ महिला सशक्तीकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ हर त्योहार पर ‘संस्कृति के रखवाले’ कपड़ों के जरिए महिलाओं को आंकने लगते हैं। क्या आधुनिक परिधान वाकई संस्कृति को कमजोर करते हैं, या यह समाज की संकीर्ण सोच का आईना है?
