डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Hindi Satire : हम भारतीय विशेष रूप से फेंकने की अद्भुत शक्ति रखते हैं l तनिक स्वतन्त्रता मिली , अनुशासन तनिक ढीला हुआ नहीं , कोई हमें न देखे – टोके – ठोके , हम अपने कचरे सामने निकट की सड़क , पड़ोसी के घर के सामने , बिना विलम्ब किए अपने आस – पास गंदगी फैलाने का परम सुख प्राप्त कर लेते हैं l कई साधक फेंकने में इतने सिद्धहस्त हो जाते हैं कि कहीं भी समाज में , किसी विषय पर जमावड़ा लगता है तो बिना मांगे , अनअपेक्षित , बलपूर्वक अपने सद्गुणों को फेंककर उटपटांग सलाह देने से नहीं चूकते l अच्छा हम फेंके भी क्यों नहीं ? हमारे सनातन दर्शन में त्याग को बड़ा धर्म माना गया जो है l हम आगे बढ़कर इस दर्शन को आगे बढ़ाने की प्रतिसर्धा में जुट कर अपने सद्गुणों को त्याग करने के उद्देश्य से फेंक देते हैं l जब कोई वस्तु , पद अथवा लाभ मिलने की अंश मात्र संभावना का हमें आभास भर होता है तो उस प्रतिसर्धा में हम अपने हैट वहाँ चुपके से फेंक देते हैं l फिर उस वस्तु , पद अथवा लाभ पर अपना दावा कर बैठते हैं और उसकी ऐन – केन – प्रकारेण प्राप्ति के लिए वस्त्रों तक का त्यागकर निर्वस्त्र होने में समय नहीं गँवाते l इन सभी आचरणों के नैपथ्य में बस फेंकने का सिद्धांत लगा देते हैं l स्वयं को पूर्णतः अयोग्य होते हुए भी हम अपना नाम उस भीड़ में फेंक देते हैं l ऐसे साधकों के चेले साधक के नाम को हवा में लपक साधक के पक्ष में हल्ला मचा देते हैं l फेंकना एक क्रिया नहीं , सिद्धांत , विज्ञान , कला और प्रबंधन है l साधकों का पुनीत कर्तव्य है कि वह फेंकने में निपुणता को प्राप्त हो l असफल लोग उस फेंके को लपेटने में स्वयं आगे आकर मदद के लिए उद्धृत रहेंगे ही !
फेंकने के दर्शन का दूसरा दृष्टिकोण यह है कि फेंकू साधक अपने वाणी में इसे साधता है l एक तथाकथित कवि को मैं जानता हूँ जो सरेआम , धड़ल्ले से दूसरों की रचना फेंकते हुए उस पर अपने स्वामित्व का दावा ठोंक देते हैं l इसके पूर्व कि कोई श्रोता उनकी पोल खोले , अपने साथ कुछ श्रोताओं के द्वारा करतल ध्वनि करवा कर वे झटके से बैठ जाते हैं l फेंकने का तीसरा दर्शन इस प्रसंग से स्पष्ट होगा l एक कविसम्मेलन में अमुक जी के अपनी बारी आते ही लपककर माइक को पकड़कर कहा – मैं इस जनपद , इस प्रान्त , इस अखिल भारतीय मंच , इस राष्ट्र को तो छोड़िए , पूरे ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ कवि हूँ l फिर अपनी कविताएं फेंक दी l श्रोताओं ने बड़े मनोयोग से इसे लपक लिया l इनके बाद एक फेंकू साधक को बुलाया गया l स्वागत हेतु कराए गए करतल ध्वनि के बाद गंभीरता की चादर ओढ़कर साधक ने कहना प्रारम्भ किया – आज दिन में ही पांच राष्ट्रों में आयोजित कविसम्मेलन से लौटा हूँ l तरह घंटों लम्बी वायुवान यात्रा में ठीक से सो भी नहीं पाया l तनिक आँख लगी ही थी कि समक्ष माता सरस्वती को साक्षात सामने पाया l माता सरस्वती ने मेरे हाथों में अपनी पुस्तक रख दी और कहा – भक्त मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ l आज से तुम मेरे वरद पुत्र हुए l तुम्हें पुस्तकों को छोड़ सारे ज्ञान का वर देती हूँ l समस्त संसार की सभी पुस्तकों का ज्ञान तो तुम्हारे हाथों में पुस्तक रखकर दे ही दिया है l अब तुम्हारे बल पर ही पूर्व का आर्यावर्त अब के भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा , यह मेरा वरदान है l मेरी तंद्रा तभी टूटी क्योंकि तभी वायुवान की रूपसी परिचायिका ने मुझे कंबल ओढ़ा दिया l श्रोताओं , मेरी पाँचों राष्ट्रों के कविससमेलनों के पश्च्यात उनके राष्ट्राध्यक्षों ने मेरे काव्य पाठों की रील मांगी और कहा कि जब भी समय होगा अपनी रचनाओं को सुन धन्य होता रहूँगा l हवाईअड्डे पर उतरते ही राष्ट्रपति जी के अंगरक्षक आकर राष्ट्रपति जी के लिए ब्लॉग पर पोस्ट मेरी रचनाओं का लिंक ले गए हैं l देखादेखी अभी इस कवि सम्मेलन में आने के ठीक पूर्व मुख्यमंत्री जी का विशेष दूत वही लिंक मांगकर ले गया है l थका हूँ इसलिए एक रचना सुनाजर अपना स्थान ग्रहण करूँगा l इसके बाद उन्होंने अपने पूर्ववक्ता ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ कवि बताए गए कवि की एक रचना अपनी बताकर बड़े आत्मविश्वास से पढ़ गए l इसके पूर्व अनुभवी श्रोता हल्ला करें कि यह चोरी की रचना है फेंकू , वे आयोजक से अपने पारिश्रमिक का मोटा लिफाफा लेकर रफूचक्कर हो गए l फेंकना उनको मोटा लिफाफा तक दे गया l फेंकना सुख देता है , फेंकू को भ्रम का चरम सुख भी l जिसने भी फेंकने में कोई कंजूसी नहीं की उसे लपेटने वाले स्वतः और स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाते हैं l फेंकनम किम दरिद्रता !!
