mahadev : इसका जवाब भगवान ही जाने !

Bindash Bol

रवि अग्रहरि

mahadev : भारत सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा और प्राचीन केंद्र है इसकी गवाई वेद, पुराण, इतिहास तो देते ही हैं। इसके अलावा यदि आप जीवंत प्रमाण चाहते हैं तो ऊर्जाओं को समझना और महसूस करना होगा। साधक ऊर्जाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं और सहज ही इन ऊर्जाओं से तारतम्य बैठा लेते हैं।

इसके अलावा यदि आप भाववादी न होकर बुद्धिवादी हैं और सब कुछ तर्क से समझना चाहें तो भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठाएँ, आप हैरान रह जाएँगे भारत सरकार की परमाणु ऊर्जा के बिना भी सभी ज्योतिर्लिंग स्थलों में सर्वाधिक विकिरण पाया जाता है।

कहा जाता है कि शिवलिंग भी परमाणु ऊर्जा जैसे ही हैं। दूसरे शब्दों में बिना किसी रूपक के कहा जाए तो सभी जीवंत शिवलिंग गहन ऊर्जा के संरक्षण का संगठित रूप है।

इसीलिए, उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वे शांत रहें। यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि महादेव के सभी पसंदीदा भोजन जैसे- बिल्वपत्र, धतूरा, गुड़ आदि सभी परमाणु ऊर्जा के प्रभाव को सोखने वाले हैं।क्योंकि, शिवलिंग पर पानी भी रिएक्टिव होता है इसलिए ड्रेनेज ट्यूब क्रॉस नहीं होती। यहाँ तक कि भाभा अणुभट्टी की संरचना भी शिवलिंग की तरह है।

कहते हैं कि गंगा, नर्मदा या किसी भी नदी के बहते जल के साथ ही शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल औषधि का रूप लेता है इसीलिए हमारे पूर्वज हमसे कहा करते थे कि महादेव शिवशंकर नाराज हो गए तो अनर्थ हो जाएगा। यहाँ देखें कि हमारी परंपराओं के पीछे विज्ञान कितना गहरा है। जिस संस्कृति से हम पैदा हुए वही सत्य है, सनातन है।

विज्ञान को परंपरा का आधार पहनाया गया है ताकि यह प्रवृत्ति बने और हम भारतीय हमेशा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें। आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में केदारनाथ से रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बने महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी कौन सी विज्ञान और तकनीक थी जो हम आज तक नहीं समझ पाए?

उत्तराखंड के केदारनाथ, तेलंगाना के कालेश्वरम, आंध्र प्रदेश के कालेश्वर, तमिलनाडु के एकम्बरेश्वर, चिदंबरम और अंत में रामेश्वरम मंदिर 79°E 41’54” रेखा की सीधी रेखा में बने हैं। ये सभी मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लैंगिक अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते हैं।

जिन्हें हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत का अर्थ है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अवकाश इन पाँच सिद्धांतों के आधार पर इन पाँच शिवलिंगों की स्थापना की गई है।

तिरुवनैकवाल मंदिर में पानी का प्रतिनिधित्व है, आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नामलाई में है, काल्हस्ती में पवन दिखाई जाती है। कांचीपुरम और अंत में पृथ्वी का प्रतिनिधित्व हुआ चिदंबरम मंदिर में आकाश का प्रतिनिधित्व!

वास्तुकला-विज्ञान-वेदों का अद्भुत समागम दर्शाते हैं ये पाँच शिव मंदिर भौगोलिक दृष्टि से भी खास हैं ये मंदिर। इन पाँच मंदिरों का निर्माण योग विज्ञान के अनुसार किया गया है। और एक दूसरे के साथ एक विशेष भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इसके पीछे एक ऐसा प्राकृतिक विज्ञान है जो मानव शरीर को आतंरिक रूप से प्रभावित करे।

आपको आश्चर्य हो सकता है कि इन मंदिरों का निर्माण लगभग पाँच हजार साल पहले हुआ था जब उन स्थानों के अक्षांश को मापने के लिए उपग्रह तकनीक उपलब्ध नहीं थी। तो फिर पाँच मंदिर इतने सटीक कैसे स्थापित हो गए?

इसका जवाब भगवान ही जाने। हमारे लिए तो अपने ऋषि-मुनियों, पूर्वजों की मेधा और साधना पर गर्व और आत्मसात करने की इससे बड़ी वजह नहीं हो सकती कि बिना किसी विशेष उपकरण के वह कौन सी साधना या तकनीक रही होगी जिसके बल पर इसे इतनी सटीकता से अंजाम दिया। ध्यान रहे केदारनाथ और रामेश्वरम की दूरी 2383 किमी है लेकिन ये सभी मंदिर लगभग एक समानान्तर रेखा में हैं।

आखिरकार यह आज भी एक रहस्य ही है कि किस तकनीक से इन मंदिरों का निर्माण हजारों साल पहले समानांतर रेखाओं में किया गया था।

श्री कालहस्ती मंदिर में छिपा दीपक बताता है कि इस हवा में कोई विशेष तत्विक गुण है। तिरुवनिक्का मंदिर के अंदर पठार पर पानी के स्प्रिंग संकेत देते हैं कि वे पानी के अवयव हैं।

अन्नामलाई पहाड़ी पर बड़े दीपक से पता चलता है कि यहाँ अग्नि तत्व की प्रधानता है। कांचीपुरम की रेती आत्म तत्व, पृथ्वी तत्व और चिदंबरम की असहाय अवस्था भगवान की असहायता अर्थात आकाश तत्व की ओर संकेत करती है।

अब यह कोई आश्चर्य नहीं है कि दुनिया के पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच लिंगों को सदियों पहले एक ही पंक्ति में स्थापित किया गया था। हमें अपने पूर्वजों के ज्ञान और बुद्धिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास एक विशेष विज्ञान और तकनीक थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं पहचान सका। लेकिन वामपंथी शिक्षा के प्रभाव में लोग स्वयं को हीन समझने लगे। और मूल बातों से भटक कर झूठ और फेक नैरेटिव का शिकार हो गए।

माना जाता है कि सिर्फ ये पाँच मंदिर ही नहीं बल्कि इस लाइन में कई और मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी लाइन में आते हैं। जिसका भौगोलिक परीक्षण होना चाहिए।

वैसे इस पंक्ति को ‘शिवशक्ति अक्षरेखा’ भी कहते हैं शायद ये सभी मंदिर 81.3119° ई में आने वाली कैलास को देखते हुए बने हैं! लौकिक स्वरूप अद्भुत है लेकिन क्या सही में इतनी योजना से यह सब निर्मित हुआ या संयोग है? इसका जवाब सिर्फ भगवान शिव ही जानते हैं।

चलिए एक और आश्चर्य आपका इंतजार कर रहा है जिसके बाद इसे महज संयोग कहकर टाल नहीं सकते। ‘महाकाल’ उज्जैन में शेष ज्योतिर्लिंग के बीच संबंध (दूरी) देखें, फिर आगे बात करता हूँ।

  1. उज्जैन से सोमनाथ – 777 किमी
  2. उज्जैन से ओंकारेश्वर – 111 किमी
  3. उज्जैन से भीमाशंकर – 666 किमी
  4. उज्जैन से काशी विश्वनाथ – 999 किमी
  5. उज्जैन से मल्लिकार्जुन – 999 किमी
  6. उज्जैन से केदारनाथ – 888 किमी
  7. उज्जैन से त्र्यंबकेश्वर – 555 किमी
  8. उज्जैन से बैजनाथ – 999 किमी
  9. उज्जैन से रामेश्वरम – 1999 किमी
  10. उज्जैन से घृष्णेश्वर – 555 किमी

कुछ साम्य या पैटर्न दिखा इन आंकड़ों में? सनातन संस्कृति में कुछ भी अकारण नहीं है। बस आप अपनी समझ खो चुके हैं। दरअसल, सनातन धर्म में उज्जैन को पृथ्वी का केंद्र माना जाता है। इसलिए उज्जैन में सूर्य और ज्योतिष की गणना के लिए लगभग 2050 वर्ष पूर्व मानव निर्मित उपकरण बनाए गए थे।

और जब एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने 100 साल पहले पृथ्वी पर एक काल्पनिक रेखा (कर्क) की परिकल्पना की तो उसका मध्य भाग उज्जैन से होकर गुजरा। तभी तो बहुत से अंग्रेज या विज्ञान परस्त लोग, जब इस सनातन ज्ञान परंपरा से परिचित हुए तो उज्जैन में सूर्य और अंतरिक्ष की मूल जानकारी लेने और उसे विज्ञान की कसौटी पर परखने आते रहे।

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