Dakiya : बात डाकिए की

Bindash Bol

डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची

Dakiya : हमने बचपन में पढ़ा था – आंधी हो , तूफ़ान को , गर्मी , ठंढी या बरसात हो , डाकिया जरूर आता है . और जब बात डाकिए की हो तो पहला स्मरण पत्रों का हो आता है .पत्र लिखने की परम्परा अब नगण्य हो चली . इसमें पहला योगदान एकल परिवार होने का हुआ . संबंध ईमानदारी और मनुष्यता बन सिकुड़ने लगे . लेकिन महत्वपूर्ण योगदान तो प्रेम पत्रों के चलन बंद होने से हुआ . यह हुआ नहीं कि युवाओं ने साहित्य से मानो मुँह ही मोड़ लिया . प्रेम गीत विधवा हो गयी , कविताओं – शायरियों की पुस्तकें दीमकों के उपयोग में आने लगीं . साहित्य का सौंदर्य रस सूखे खेत हो चले . तकनीकी प्रगति में एक मुआं मोबाइल पल भर में दर्जनों प्रेमियों – प्रेमिकाओं में साहित्य सृजन की आत्मा को ही सद्गति प्रदान कर दी !
क्या वे दिन थे ! प्रेमी – प्रेमिका का दिल एक – दूसरे के लिए उतना नहीं धड़कता था , जितना डाकिए की आहट के लिए . पति परदेश गए तो प्रेम पत्रों के आदान – प्रदान का पूरा भार डाकिए के कंधों पर आ जाया करते थे . सयाने बताते हैं कि उसके पहले यह काम कबूतरों के हिस्से था . काम छीन जाने पर कबूतरों के कोई आंदोलन , घेराव , नारेबाजी , गुटबंदी नहीं की , इतिहास साक्षी है . सिद्ध हुआ कि अनशनों – आंदोलनों के पुरोधा कबूतर नहीं थे . ऐसे भी दृष्टांत हैं कि प्रेम पत्र अनपढ़ नारियों को बांचने के चक्कर में कई डाकिए ही उनके साथ प्रेम कर बैठे और साथ भाग तक गए . मोबाइलों के युग में माता – पिता इस बात से आस्वस्थ हो गए कि कम से कम उनकी कन्या डाकिए के साथ तो भागने से रही . सिद्ध हुआ कि भारतीय समाजिक कल्याण में डाकिए की उल्लेखनीय भूमिका रही .
डाकिए के कई पात्र हिंदी के साहित्य में समावेशित हुए . गीतकारों का भी ध्यान डाकिए ने खींचा – डाकिया डाक लाया ….. ! आदि . एक समय था , डाकिए तार भी लाया करते . मुझे दो बार डाकिए की कृपा से राष्ट्रपति जी की ओर से राष्ट्रपति पुलिस पदक के तार मिले . रामलाल बताते हैं कि टो – टा कर अंग्रेजी पढ़ने वाले एक हसन अली नामक व्यक्ति ने खाड़ी देश में काम करने के कई आवेदन दिए थे . एक दिन उनको डाकिए ने तार थमाया . वे डाकिए के सामने ही खोलकर तार पढ़े . लिखा था – कम परसनली . हसन अली ने तुरंत ही डाकिए को भेजने वाले के ही पते पर इस तार का उत्तर इस प्रकार भेजने को कहा – परसन अली इज नॉट अवेलेबल , हसन अली इज गोइंग . डाकिया हसन अली की अंग्रेजी से प्रभावित होकर मुस्कुरा दिया .
डाकिए से डर भी होने के दृष्टांत मिले हैं . सेठ मुनाफे लाल के गल्ले पर डाकिए का आना – जाना लगा रहता था . बात उन दिनों की है , जब रेल से माल ढुलाई में डाक से बिल्टी आया करती थी . सारे डाक सेठ जी के मुनीम लिया करते थे . एक दिन डाकिया अड़ गए कि इस डाक को सेठ जी को ही देना है . आनन – फानन में डाकिए को लेकर मुनीम जी सेठ जी के पास पँहुचे . डाक निबंधित और सेठ जी के नाम थी . सेठ जी ने डाक लेकर अपने हस्ताक्षर बनाए और डाक खोली . पढ़ते ही उनके तोते उड़ गए . आबकारी कर चोरी में उनपर पच्चीस हजार का जुर्माना लगा था और न देने पर सालभर की जेल . सेठ जी के हाथ – पाव फूल गए . मुनीम जी दूसरे दिन ही हर्जाना भर आए . तब से सेठ जी जब भी डाकिए को देखते तो डर के मारे थरथर काँपने लगते .
आज इतने संघर्षों के बाद भी आजतक डाकिए और डाकघर का अस्तित्व बचा हुआ है . अब पैसों के लेन – देन के बैंक स्वरूप की चादर उढ़ा जो दी गयी . पहले यह मनीऑर्डर तक सीमित थे और सयाने बताते हैं कि कई डाकिए मनीऑर्डर की राशि में अपना बट्टा तक काट लेते , जब पाने वाला व्यक्ति अपनी सहृदयता से उन्हें बक्शीश देने में किचकिच किया करते थे . मेरा एक सहपाठी माध्यमिक शिक्षा के बाद निर्धनता के कारण आगे नहीं पढ़ सका था और फिर डाकिया बन गया . वह दिन भर जुए खेलता . किसी ने पूछ लिया – अबे ! डाक कब बांटता है ? उसने जुए के अड्डे पर ही उसे फुसफुसाकर बताया था कि हर रविवार उसकी पत्नी सप्ताह भर की डाक जलाकर भोजन पकाती है . सरकारी आदेश , न्यायालय संबंधित पत्राचार ,
बैंकों के चेकबुक , क्रेडिट – डेबिट कार्ड , पासपोर्ट (पारपत्र ) डाक से ही आते हैं . डाकघरों में बड़े बदलाव केंद्रीय सरकार ने करने प्रारम्भ किए हैं . डाक पेटियों को दशकों से विकास ने साफ़ निगल लिया .इतना बदलाव होने के बाद भी छोटे से बड़े डाकघर जाते ही इसके सरकारी होने के सारे के सारे लक्षण अब भी पाए जाते हैं . लगता है , भारतवर्ष में समय थम सा गया है . सरकारी गति से खर्र खर्र करते प्रिंटर द्वितीय महायुद्ध के बाद की यूरोपीय औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भिक पाठ पढ़ाने का अनुभव दे जाते हैं . बचत खाते के लेनदेन महाजनी व्यवस्था का स्मरण दोनों ओर से कराते हैं . लोग कातर भाव से डाकघर के कर्मचारी को देखते हैं , अपना ही पैसा मिल जाने पर वैसे ही उपकृत भाव प्रकट करते हैं और कर्मचारी सरकारी होने की अकड़ दिखा देता है .कुरियर सेवा ने डाकघर की डाक सेवा पर अभियान सिंदूर सा चला दिया है . डाकघर पाकिस्तान सा अंदर ही अंदर डरा – सहमा और बाहर से शेखी बघारता सा लगता है .अब डाकिए अपने उन खाकी परिधान में दीखते नहीं . राष्ट्र के अनुशासन की भांति ही डाकियों का बना रहा . रवि बाबू देखते ही कहते हैं – जे मन , जे करे !परन्तु मैं इसी मामले में सही भाग्यशाली तो निकला . हमारे डाकिया साहब अपने विभाग को ठेंगा दिखाते हुए मृदुभाषी और मुस्कुराकर सहयोग करते हैं . तभी तो नींद में सोई पत्नी का हस्ताक्षर कर मैं उनके नाम के निबंधित डाक सुगमता से ले लेता हूँ .लेकिन सयाने अब भी उदास होकर कहते हैं – डाकिए प्रेम पत्र अब नहीं लाते ! उन्हें क्या पता , आज की पीढ़ी मोबाइल से गिने चुने शब्दों या इमोजी से यह सब अब सुलभता से निबटा रहे हैं !

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