Dog Bite : कुत्ता काटने की कहानी…

Bindash Bol

Dog Bite : फेसबुक के इस मंच पर बहुत सारे लोग मेरे बेटे पार्थ कबीर से परिचित हैं। मैं अक्सर ही इस मंच पर उसके साथ फोटो साझा करता रहता हूं। बीते फरवरी महीने में उसे कुत्ते ने काट लिया था। अचानक हुई यह घटना बेहद हैरान करने वाली और पीड़ादायक रही। उससे जुड़ी हुई कुछ बातें यहां लिख रहा हूं।
फरवरी का यह अंतिम सप्ताह था। शाम के कोई आठ बजे का वक्त रहा होगा। मैं और पार्थ दोनों ही अपने घर से कुछ ही दूरी पर खड़े हुए थे। इसी बीच किसी का फोन आ गया और हम फोन पर बात करने लगे। एक कुत्ता जो वहां आसपास ही सोया हुआ था। वो हम लोगों की तरफ आकर्षित हुआ। अपनी हरकतों से वो काफी खुशदिल लग रहा था। पूंछ भी हिला रहा था। वो अपने दोनों अगले पंजे उठाकर मेरे सीने तक चढ़ गया। पार्थ के साथ भी वो कुछ ऐसे ही खेल रहा था। कुत्तों से जुड़े हुए मेरे मन के भाव मिले-जुले हैं। उसके कारण मैं आगे जाहिर करूंगा। लेकिन, मिलाकर मैं उन्हें पसंद करता हूं। इंसान का सबसे अच्छा दोस्त मानता हूं। इंसानों के प्यार और सराहना की उन्हें भूख होती है।
एक पिल्ला अपनी मां को भी छोड़कर कैसे एक इंसान को अपना सर्वस्व चुन लेता है। इसे देखना सचमुच ही भावुक कर देने वाला होता है। यह कभी नहीं छूटने वाली दोस्ती होती है। वो सिर्फ अपने चुने हुए इंसान की सुनता है। अब चाहे वो इंसान उसे मारे-फटकारे या पुचकारे। वो हर समय उसी की प्यार और सराहना का भूखा होता है। कुत्ता अपने मरघिल्ले से मालिक के लिए किसी पहलवान के ऊपर भौंक भी सकता है और हमला भी कर सकता है। जो गली के कुत्ते होते हैं, उनके लिए यह थोड़ा दूसरी तरह से काम करता है। अपनी पूरी गली की ही जिम्मेदारी वे ले लेते हैं और उसमें रहने वाले सभी लोगों को अपना मालिक समझते हैं।
यहां पर कुत्ते और इंसान की कहानियां नहीं लिखूंगा। नहीं तो विषय परिवर्तन हो जाएगा। क्योंकि, इंसान और कुत्ते की भावनाओं, दोस्ती और प्यार को दर्शाने वाले तमाम गाथाएं हर किसी के मन में ताजा है।
बात उस खास दिन की करें। वो कुत्ता लगभग पांच-सात मिनट तक दोस्ताना व्यवहार करता रहा। ऐसा लगा कि जैसे किसी ने बहुत दिन से उसके सिर पर हाथ नहीं फेरा है, कई दिनों से किसी ने उसकी गर्दन नहीं थपथपाई है। उस प्यार और सराहना की मांग वो हम लोगों से कर रहा है। इसी बीच अचानक पता नहीं क्या हुआ कि वो वायलेंट हो गया। उसने पार्थ के ऊपर हमला कर दिया। पार्थ ने बचाव के लिए जब हाथ आगे किया तो उसने उसके हाथ पर बुरी तरह से काट लिया। फिर उसके पेट में भी काटा। वो अपने दोनों पेजे पार्थ के सीने पर रखकर उसके ऊपर चढ़ गया। उसके हमले से पार्थ भी हैरान था और डर भी गया। पार्थ लगभग छह फुट से ज्यादा की ऊंचाई और अच्छे वजन का किशोर है। इसके बावजूद वो कुत्ता उसके ऊपर पूरी तरह से हावी हो चुका था। यह सबकुछ बस कुछ ही पलों में हो गया। मैं उस समय किसी से फोन पर बात कर रहा था। पार्थ के ऊपर कुत्ते का हमला देखते ही मैंने भी अपना होश खो दिया। मैं जोर से चिल्लाया और कुत्ते के ऊपर हमला करने के लिए बढ़ा। मुझे आते देखकर कुत्ता पार्थ को छोड़कर भाग गया।
फरवरी का महीना उतार पर था। लेकिन, उस समय हल्की ठंड पड़ रही थी। पार्थ ने मोटी स्वेट शर्ट पहन रखी थी। उसके नीचे इनर भी पहन रखा था। इसके बावजूद उसके पूरे हाथ पर कुत्ते के कैनाइन गड़ गए थे और वहां से खून की धार बहने लगी थी। उसके बाएं हाथ में कुत्ते के दांत के सात-आठ निशान थे। जिनसे खून बह रहा था। पेट पर भी कुत्ते के दांतों के निशान थे। कपड़े की इतनी परतों के बाद भी उसने पार्थ को बुरी तरह से काट लिया था। पार्थ की लंबाई और वजन इसलिए बताया कि अगर पार्थ की जगह पर कोई छोटा बच्चा होता तो शायद वह तुरंत ही जमीन पर गिर चुका होता और कुत्ते का हमला और भी भयावह हो जाता।
खैर, वो एक बहुत ही दुख और निराशा से भरी हुई शाम थी। तुरंत उसका प्राथमिक उपचार करने, वैक्सीनेशन कराने के लिए सरकारी अस्पताल जाने की कहानी भी बहुत ज्यादा परेशानी भरी रही।
आप लोगों के साथ यहां पर एक और निजी बात साझा कर रहा हूं। आज लगभग 32 साल पहले मेरे पिता जी को भी कुत्ते ने काट लिया था। रेबीज या हाइड्रोफोबिया से ही तड़प-तड़प कर उनकी मौत हुई थी। उस समय उनकी उम्र पचास साल भी पूरी नहीं थी। इसलिए कुत्ते को लेकर मेरे मन में दोनों ही तरह के भाव मौजूद हैं। मैं उन्हें प्यार भी करता हूं। वे मेरे साथ खेलते हैं और सहज भी रहते हैं। लेकिन, मन के किसी एक कोने में कुत्ते को लेकर मेरे मन में भय और संशय भी बना हुआ है। यह न जाने कब खतम होगा। मैं कह नहीं सकता।
ऐसे में जब मेरे बेटे को कुत्ते ने इस बुरी तरह से भंभोड़ दिया, तब मेरी मनोदशा क्या रही होगी, इसे हो सकता है कि आप लोग समझ सकें। मुझे खुद कुत्ते ने कई बार काटा है और मैंने कई बार पूरा वैक्सीनेशन कराया है। इसलिए मुझे वैक्सीनेशन का पूरा शिड्यूल पता है। सरकारी अस्पताल में लिखकर भी दिया जाता है। पार्थ को पहला टीका उसी दिन लग गया। इसके बाद उसे टीके के शिड्यूल पर मैं अस्पताल ले जाता रहा।
जिस रात पार्थ को कुत्ते ने काटा था, उस रात उसे डीडीयू अस्पताल ले गए थे। लेकिन, बाद में टीकाकरण के लिए द्वारका सेक्टर नौ स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल जाते रहे। यहां पर जब हम पहुंचते तो कुत्ते से काटने का टीका लगवाने वालों की एक लंबी लाइन लगी होती। हम दोनों भी चुपचाप इस लाइन में खड़े हो जाते।
लेकिन, धीरे-धीरे आदमी अपने दुख से उबरने लगता है। लाइन में लगे हुए लोगों से मैं पूछता कि उन्हें कब और कैसे कुत्ते ने काट लिया। सबके पास ही उस दिन की कहानी होती थी। मैंने कुछ बातें गौर की। बारह साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या काफी ज्यादा थी। स्कूल से घर लौटते, शाम को कोचिंग जाते, खेलते समय उन्हें कुत्ते ने दौड़ा कर काट लिया। उनमें घरों में सामान की डिलीवरी करने वाले जोमैटो, स्विगी, फ्लिपकार्ट और एमेजान के डिलवरी मैन भी काफी थे। उनमें घरों में काम करने वाली घरेलू सहायिकाएं थीं। उनमें रात को अपनी नौकरी से घर लौट रहे लोग थे।
मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने कुत्ते के ऊपर हमला किया हो और उसके बाद कुत्ते ने उसे काट लिया हो। ज्यादातर लोग कुत्ते से बचने के लिए भागने की ही कोशिश करते रहे, पर सफल नहीं हो सके और कुत्ते ने उन्हें काट लिया। मेरे खयाल से रेबीज का टीकाकरण लगाने के लिए लाइन में लगे हुए लोगों के अनुभवों को कलमबद्ध किया जाना चाहिए। इसके विश्लेषण से हम बहुत कुछ समझ सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर दिन हजारों लोगों को कुत्ता काटता है। रेबीज एक ऐसी बीमारी है जिसमें मौत की आशंका सौ फीसदी है। और यह मौत भी इतनी भयावह होती है कि जिन लोगों ने इसे देखा होता है वे जीवन भर इसे भूल नहीं पाते।
एक तरफ मरीज बिस्तर पर तड़पता रहता है, उसे बिस्तर से बांध दिया जाता है। घर वाले भी पास नहीं जा पाते। दूर से देख-देखकर उनके दिल का हाल भी बहुत बुरा हो जाता है। मैं अभी भी सोचता हूं कि आखिर उस दिन, उस कुत्ते ने पार्थ पर अचानक हमला क्यों किया। किस चीज से अचानक ही वो इतना हिंसक और आक्रामक हो गया।

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