Afghanistan : सभ्यता का टूटा दिल! जहाँ कभी शांति की गूँज थी, वहाँ अब साजिश की राख है, अब वक्त है भारत को उसके दर्द का मरहम बनने का

Bindash Bol

Afghanistan : कभी रेशम मार्ग का धड़कता केंद्र रहा अफगानिस्तान आज भी दुनिया के इतिहास का सबसे जटिल, किंतु सबसे हृदयस्पर्शी पात्र है। यह वो भूमि है जहाँ से भारत, चीन, ईरान और ग्रीस की सभ्यताएँ एक-दूसरे से मिलीं — जहाँ ज्ञान, धर्म और व्यापार की नदियाँ बहती थीं।

बल्ख, बामियान और हेरात जैसे शहर न सिर्फ व्यापार के केंद्र थे, बल्कि संस्कृति, कला और दर्शन के मंदिर भी थे। यूनानी-बैक्ट्रियन, कुषाण, फारसी और भारतीय प्रभावों ने इसे रंगों की ऐसी मिट्टी बनाया जहाँ से पूरी एशिया को पहचान मिली।

अफगानों और खासकर पठानों का भारत से रिश्ता केवल सीमाओं का नहीं, दिल का था। सिंधु घाटी से लेकर गांधार, कंधार और बामियान तक भारतीय प्रभाव सदियों तक धड़कता रहा। सम्राट अशोक के शिलालेख आज भी कंधार की मिट्टी में उत्कीर्ण हैं और उन बामियान बुद्ध प्रतिमाओं के खंडहर आज भी भारतीय आत्मा की शांति का प्रतीक हैं।

अफगानी सूफी संतों ने भारतीय सूफी परंपरा में सांसें फूंकीं, और खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आत्मा का बल बनकर समर्थन दिया।

लेकिन अफगानिस्तान की यह शांति 1970 के दशक में साजिशों का शिकार बनी। 1978 में जब वामपंथी तख्तापलट ने मोहम्मद दाऊद खान को उखाड़ फेंका और सोवियत समर्थित सरकार बनाई, तब बदलाव की आग ने पूरे देश को झुलसा दिया।

सुधारों के नाम पर हुए अत्याचारों ने मुसलमानों में असंतोष भड़काया, और यहीं से जन्म हुआ “मुजाहिदीन” आंदोलन का — जिसे जल्द ही बाहरी ताकतों ने अपना मोहरा बना लिया।
1979 में सोवियत सेना ने सरकार के “आमंत्रण” पर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। लेकिन उस कब्ज़े के पीछे मकसद सुरक्षा नहीं, विस्तार था।

दूसरी ओर, अमेरिका ने इस युद्ध को सोवियत-अमेरिकी शीतयुद्ध का नेतृत्व मंच बना दिया। CIA ने “ऑपरेशन साइक्लोन” चलाकर अरबों डॉलर, आधुनिक हथियार और स्टिंगर मिसाइलें भेजीं। पाकिस्तान की ISI ने उन्हें एक विचारधारा दी — “मजहबी जिहाद” — और सऊदी अरब ने उसे वहाबी रंग में रंजित किया।

इसी प्रयोगशाला से तालिबान की रचना हुई।1980 के दशक में अफगानिस्तान जिहाद की प्रयोगशाला बन गया। हजारों पाकिस्तानी मदरसों में बच्चों को बंदूक और नफरत की तालीम दी गई। वही “छात्र” आगे चलकर तालिबान बने — जिन्होंने 1996 में काबुल पर कब्जा किया और एक नई इस्लामी अमीरात बना दिया।

विज्ञान, कला, शिक्षा, और महिलाओं की स्वतंत्रता पर पहरा लगा दिया गया। बामियान के बुद्धों को विस्फोटक से उड़ाया गया, और सहिष्णुता की वह भूमि कट्टरता की छाया में डूब गई।अमेरिका, जिसने इस आग को लगाया, वही 1989 में सोवियत वापसी के बाद अफगानिस्तान को अराजकता में छोड़ चला गया।

पाकिस्तान ने इसमें अपने “रणनीतिक गहराई” के सपने देखे और तालिबान को पाल-पोस कर सिर्फ कट्टरता क्रूरता और जिहाद की सनक भरा।

इस बीच अफीम और हथियारों का व्यापार “डार्क मनी” बनकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की नसों में बहता रहा। अफगान जनता लहूलुहान थी — विस्थापन, भूख, और अस्मिता के मलबे में दबी हुई।

2001 में जब उसी राक्षसी मनोवृत्ति ने अमेरिका की धरती पर हमला किया,तो अमेरिका को उस वृक्ष के फल मिले जो उसने अपने ही स्वार्थ के लिये वर्षों पहले बोया था। अमेरिका ने उसे मिटाने के नाम पर फिर उसी देश को युद्धभूमि बना दिया। 20 साल बाद उसने वापसी की, लेकिन अफगानिस्तान फिर से उसी तालिबान के हाथों में था, जिसे उसने दो दशकों पहले “राक्षस” कहा था।

एक बार फिर वही कहानी, वही पात्र, वही पीड़ा।और इस पीड़ा के बीच — भारत अकेला देश है जिसने कभी अफगानिस्तान को रणनीतिक मोहरा नहीं माना, बल्कि एक सांस्कृतिक भाई, एक सभ्यतागत साझेदार के रूप में देखा। भारत ने वहाँ सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और संसद भवन का निर्माण किया — हथियारों से नहीं, मानवता और शिक्षा से।

अफगान लोगों का दिल अब भी भारत के लिए धड़कता है। वे जानते हैं कि जिस मिट्टी से उनकी सभ्यता की खुशबू आई थी, वही उनके पुनर्जन्म का आधार है। आज जब वे खुद अपनी बहुलवादी संस्कृति को फिर से ज़िंदा करने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, तब दुनिया और खासकर भारत का यह नैतिक कर्तव्य है कि उनके इस संघर्ष में साथ खड़ा हो।

2021 में तालिबान की पुनर्वापसी हुयी पर इसबार वो अपने मूल की तरफ लौटने के संकल्प के साथ आते दिखे…तालिबान फिर से अफगान बन चुके थे। वतन वापसी के बाद इन अफ़ग़ानों ने बामियान में बुद्ध की उस प्रतिमा को पुनर्स्थापित किया जिसे कभी तालिबानों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था।

अफगानिस्तान शांति की पुकार है — एक ऐसी पुकार जिसे सियासत ने दबा दिया, लेकिन सभ्यता नहीं भूल सकती। भारत को न केवल मदद करनी चाहिए, बल्कि दुनिया को यह याद दिलाना चाहिए कि अफगानिस्तान कोई “खूंखार सरहद” नहीं — बल्कि वह प्राचीन सभ्यता का वह पुल है, जिसने भारत को मध्य एशिया, और मानवता को आध्यात्मिकता से जोड़ा था।

अब वक्त है कि भारत फिर उस टूटे दिल की धड़कन बने,
वो दिल, जिसे सभ्यता ने बनाया।

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment