Diwali 2025 : तमसो मा ज्योतिर्गमय

Bindash Bol

ध्रुव गुप्त
(आईपीएस)
पटना

Diwali 2025 : इस प्रश्न पर मतभिन्नता है कि हम दीवाली किस उपलक्ष्य में और क्यों मनाते हैं। ज्यादातर लोग इस दिन को लंका विजय कर चौदह वर्षों के बनवास के बाद राम की अयोध्या वापसी के उत्सव के रूप में देखते हैं। वहीं कुछ लोग इसे महाभारत युद्ध के बाद विजेता पांडवों के कृष्ण के साथ हस्तिनापुर लौटने की घटना का उत्सव मानते हैं। अगर इन दोनों में से एक बात भी सही है तो क्या आपको यह विचित्र नहीं लगता कि इस दिन राम या कृष्ण में से किसी की भी पूजा नहीं होती। पूजा होती है धन की देवी लक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणेश की। व्यवसायी इस दिन उनकी पूजा कर नए बही-खातों का श्रीगणेश करते हैं। दीवाली की एक पौराणिक कथा देवी लक्ष्मी से भी जोड़ी जाती है। समुंद्र-मंथन में लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद उन्हें पाने के लिए देवों और असुरों के बीच संघर्ष हो गया था। संघर्ष के उस तनावपूर्ण माहौल में आज की रात देवी लक्ष्मी ने पति के रूप में विष्णु का वरण कर लिया था। उसी रात की स्मृति में दीये जलाकर देवी लक्ष्मी की दिन पूजा होती है। बंगाल और उड़ीसा की शक्तिपूजक संस्कृति इस दिन को काली पूजा के तौर पर मनाती आई है।

खैर मिथक तो मिथक हैं। उनकी व्याख्या लोग अपनी अपनी आस्था के आधार पर करते आ रहे हैं। मुझे आज के प्रकाश पर्व की पृष्ठभूमि में जीवन में स्वच्छता, विचारों में पवित्रता को अपनाने के आग्रह के साथ वृहदकारण्य उपनिषद का अद्भुत श्लोक याद आ जाता है _
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
(हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो)

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