मनोज कुमार
Bihar Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनावों के बीच एक बार फिर जुआरियों के अखाड़े में हलचल तेज है। जी हां, “सट्टा बाजार” की भविष्यवाणी ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा का पैंतरा बदल दिया है।
बिहार के सट्टा बाजार ने अनुमान लगाया है कि NDA 144 से 146 सीटें जीत सकता है, जबकि महागठबंधन (MGB) को 83 से 85 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है।
बिहार में “सट्टा बाजार” चुनाव के दौरान जुआरियों, बुकीज और स्थानीय बाजारों में लगाए गए सट्टे के आधार पर भविष्यवाणी करता है।
यह बाजार आमतौर पर पटना, गया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसे बड़े शहरों के चाय की दुकानों, बस स्टैंड्स और स्थानीय मंडलों में सक्रिय रहता है। यहां लोग न सिर्फ विधानसभा सीटों पर सट्टा लगाते हैं, बल्कि जीतने वाले उम्मीदवार के नाम, मतों के अंतर और गठबंधनों के भविष्य पर भी बाजी खेलते हैं।
आज की तारीख में, सट्टा बाजार यह संकेत दे रहा है कि नीतीश कुमार की छवि और भाजपा के जमीनी संगठन का मिश्रण NDA को फिर से सत्ता की ओर धकेल सकता है।
144 का आंकड़ा बिहार में सरकार बनाने के लिए जादुई संख्या है। अगर NDA इसे पार कर जाता है, तो यह नीतीश कुमार के लिए एक ऐतिहासिक वापसी का पल होगा — खासकर उनके बाद के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, जब उन्होंने महागठबंधन छोड़कर फिर से भाजपा का हाथ थाम लिया। यह चुनाव उनके लिए न केवल सत्ता का, बल्कि विश्वसनीयता का भी इम्तिहान है।
सट्टा बाजार में भाजपा के लिए बेहतर बुकिंग देखी जा रही है। अगर भाजपा 80+ सीटें जीतने में कामयाब होती है, तो यह उसके लिए बड़ी राजनीतिक जीत होगी।
नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ हो सकता है। उनकी पार्टी जेडी(यू) ने 2020 में 43 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार सट्टा बाजार में उनके लिए उम्मीद कमजोर है — फिर भी अगर वो 35+ सीटें जीत जाते हैं, तो वह फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यह भी हो सकता है कि उनके विशाल प्रशासनिक अनुभव का लाभ NDA केंद्र में उठाना चाहे और शायद यही नीतीश के लिये नयी पीढ़ी को रास्ता देने के लिये सम्मानजनक रास्ता हो।
आरजेडी के लिए यह चुनाव तेजस्वी यादव का अंतिम इम्तिहान साबित हो सकता है। 2020 में उन्होंने 75 सीटें जीती थीं, क्योंकि उस बार वो युवा वर्ग को अपने तरफ खींचने में काफी हद तक कामयाब रहे थे।
लेकिन इस बार उनके पीछे लालू राज का भूत पड़ गया लगता है , क्यूंकि कई सजायाफ्ता माफियाओं, हत्या आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों को थोक में टिकट दिया है। सट्टा बाजार में उनके लिए कमजोर बुकिंग है, जो यह दर्शाती है कि युवा वोटर अब उन पर कम भरोसा कर रहे हैं।
अगर वह 60 सीटों से नीचे आ जाते हैं, तो उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा होगा। क्यूंकि 5 साल बाद बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव आ चुके होंगे कई युवा नेता उभार पर होंगे।
मुझे लगता है कि आने वाले समय में लालू परिवार के किसी सदस्य का अगर भविष्य है तो वो “तेज प्रताप यादव” का होगा,जो अपनी सादगी, जनता से सहजता और संवेदनशील तरीके से जुड़ने के अंदाज से सभी का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
कांग्रेस के लिए तो यह चुनाव “जीवित रहने” की लड़ाई है। 2020 में महज 19 सीटें जीतने वाली पार्टी अब खतरे में है। सट्टा बाजार में उनके लिए बेहद कम समर्थन दिख रहा है। अगर वह 15 से कम सीटें जीतती हैं, तो बिहार में उसकी उपस्थिति तो खत्म हो ही जायेगी, इसका प्रभाव आने वाले अन्य कई राज्यों के चुनावों पर भी पड़ेगा।
लेफ्ट और हम जैसे छोटे दल अब राजनीतिक नक्शे से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। 2020 में लेफ्ट ने महज 12 सीटें जीती थीं, और हम ने 5, अब सट्टा बाजार उन्हें पूरी तरह खारिज करता दिख रहा है
