जयप्रकाश
Air India Plane Crash :
प्रिय भारत,
आज तेरे आसमान ने एक और बच्चा खो दिया। जिस अहमदाबाद की गलियों में लोग चाय के साथ ज़िंदगी की बातें किया करते थे, आज वहाँ ऐंबुलेंस की आवाज़ें चाय की केतली से भी ज़्यादा उबल रही हैं।
बोइंग 787 की एक उड़ान – जिसे आकाश की ऊँचाई चूमनी थी, वो ज़मीन पर चीखती हुई गिरी है।
कहते हैं प्लेन टेक-ऑफ़ के चंद मिनट बाद मेघानी नगर के एक हॉस्टल पर गिरा। किसी ने साइलेंट मोड पर डाला था फोन, वो अब कभी नहीं बजेगा।
किसी की मम्मी ने कह रखा था – “बेटा पहुँच कर कॉल कर देना” – वो कॉल अब सिर्फ कॉलर ट्यून में बजता रहेगा। किसी पिता ने पासपोर्ट बनवाया था बेटे का, “विदेश जाएगा, नाम रोशन करेगा।” अब पासपोर्ट राख में बदल गया है, और नाम अख़बारों में – मौत की लिस्ट में छप गया है।
प्रधानमंत्री कह रहे हैं – “यह ह्रदयविदारक है।” गृह मंत्री कहेंगे – “जांच होगी।” एविएशन मिनिस्ट्री कहेगी – “तकनीकी गड़बड़ी हो सकती है।”
हम पूछना चाहते हैं – क्या इस देश में अब उड़ना भी लक का खेल है?
क्या बोर्डिंग पास अब सिर्फ टिकट नहीं, मौत की लॉटरी बन चुकी है?
कहा जाता है ये बोइंग का सबसे सुरक्षित मॉडल था। तो क्या अब ‘सेफ्टी’ का मतलब बस यही है कि ब्रांडिंग अच्छी हो? या यह कि उसका क्रैश अब “इतिहास” में दर्ज होगा क्योंकि यह उसका पहला “फैटल एक्सिडेंट” था?
लेकिन उस माँ से पूछो जिसने बेटे को पहली बार एयरपोर्ट तक छोड़ा था।
वो Boeing नहीं जानती, वो बस बेटे की आँखों की चमक जानती थी।
242 लोग थे उस फ्लाइट में। अब 30 के शव मिले हैं, बाक़ी के लिए एनडीआरएफ मलबा खंगाल रही है – जैसे इस देश में न्याय मलबों से निकाला जाता है।
अब एयर इंडिया कहेगी – “हमें खेद है, हम मुआवज़ा देंगे।” सरकार कहेगी- “हम गंभीर हैं।” और टीवी चैनल कहेगा – “देखिए कैसे गिरा प्लेन, हमारे पास एक्सक्लूसिव फुटेज है।”
लेकिन सवाल ये है – क्या सिस्टम सिर्फ मुआवज़ा देकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो सकता है? क्या ये वही ‘विकसित भारत’ है जो चाँद पर पहुँचने की बात करता है,और ज़मीन से टेकऑफ़ भरते ही आग की लपटों में बदल जाता है।?
प्रिय देश, हम अब आँकड़ों से थक चुके हैं। हमें आँकड़ों में दर्ज मौतें नहीं,
मौत में दबे इंसान चाहिए।
आज ये हादसा अहमदाबाद में हुआ है – कल लखनऊ में हो सकता है, फिर कोलकाता, फिर दिल्ली, और एक दिन तुम कहोगे – “हम सब बस लकी थे अब तक।”
लेकिन सच्चाई यह है – अगर जाँचें सिर्फ कागज़ पर होती रहीं, अगर एविएशन लॉबी राजनेताओं की जेब में रही, अगर उड़ानें TRP और टिकट बेचने की होड़ बनती रहीं, तो ये आसमान हर हफ्ते एक शोकगीत गाएगा।
दुःखी हूं, इतना दुःखी की कानों में चीखने की आवाज़ गूंज रही है, और दिल कह रहा, ” अभी ना जाओ, छोड़ कर….”
