डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
antarman : साधो ! विकट परिस्थिति में निर्णय के क्षण अंतर्मन की सभी सुनते हैं . इससे अगले तो पता चल जाता है कि अमुक के पास अंतर्मन भी है . अंतर्मन रखना विकट काल में मदद करता है , लेकिन किसी साधक में साधना बल हो जाए तो वह अपने लक्ष्य , लाभ और सफलता के लिए अपने अंतर्मन का क्षणिक त्याग कर देता है . त्याग में बल है . यह बल साधक की साधना को और बलवती कर डालता है . इसके अभ्यास से साधक बलवान बन जाता है और उस बल से एक से एक मेधावी , बुद्धिमान और सफल व्यक्ति को हिला कर उखाड़ फेंकता है .
साधो ! अंतर्मन का त्याग वह साधना है , जिसमें व्यक्ति को केंद्रित होकर नीति , लोग क्या कहेंगे आदि के भाव से परे होना पड़ता है . मान – अपमान , नैतिक – अनैतिक , उचित – अनुचित में समभाव रखने का निरंतर अभ्यास करते रहना होता है . क्योंकि पता नहीं कब अंतर्मन की ठूँठ फुज पड़े . अंतर्मन को फुजने से बचाने के लिए सतत लगे रहना पड़ता है . संवेदना , भावावेश को शून्य स्तर पर खींचना पड़ता है . इसके साथ पूरे का पूरा ध्यान सिर्फ स्वयं की सफलता , सम्पन्नता और स्वयं के लाभ पर केंद्रित करना पड़ता है . जैसे अंतर्मन का त्याग किया गया , उसी प्रकार साधक आत्मसम्मान का भी शनैः – शनैः त्याग करता जाता है . इस सिद्धांत में समभाव का जाप बड़े काम आता है और साधना की आँच को बढ़ाता है . साधक प्रारम्भिक छोटी – मोटी असफलता पर ध्यान न देकर उसे प्रयोग समझने लगता है . फिर उचित समय तीव्रतम गति से झपट्टा मार कर अपने लक्ष्य को बटोर लेता है . साधक दबे पाँव चलता है , चपलता से लपक कर कब कहाँ पँहुच जाए , साधारण मनुष्य इसकी कल्पना तक नहीं कर पाता . उधर साधक पलक झपकते लक्ष्य को ले उड़ता है .
अच्छे साधक की यही असली पहचान है कि वह साधारण सी परिस्थिति में अगले को अंतिम समय में निर्णय से अनिर्णय , निश्चितता से अनिश्चितता की ओर चतुराई से धकेल दे ताकि अगले को अपने अंतर्मन की पोथी कंधे पर रखे झोले से निकालने का अवसर ही न मिले . तब साधक दामिनी की गति से उस परिस्थिति में अपने लाभ , अपनी सफलता के हीरे को चुनकर लापता हो जाता है .
साधो ! यह साधना गुरु की छाँव में विधिवत और पारम्परिक रूप से प्याज के छिलकों , कमल दल की भांति एक के बाद ज्ञान के परतों को हटाने पर सिद्ध होती है . धैर्य की बड़ी मात्रा खर्च होती है . लेकिन एक के बाद एक सफलता को प्राप्त करते हुए साधक धैर्य को भी त्याग देता है . साधना की इस अवस्था में उसे चीते की भांति फुर्तीला होना पड़ता है . एक बार फुर्ती आ गयी तो शेर क्या बब्बर शेरों के मुख से उसका निवाला तक छीन सकने में समर्थ हो जाता है .
साधो ! एक मुखिया जी थे . पांचवीं बार मुखिया पद का चुनाव लड़ रहे थे . इस बार परिस्थिति विकट थी . उनकी पोलपट्टी खुल चुकी थी . घपले – घोटालों के कई वादों में कठिनाई से जमानत मिली थी . लेकिन यह सब उनके मनोबल को तोड़ नहीं सका .इस बार उन्होंने चुनाव जीतने के लिए गाँव के ही अपने वकील साहब की सलाह पर उनके दामाद को विशेष प्रबंधक रखा . दामाद जी ने पच्चीस लाख रुपए लिए . पहले से ही सारा प्रबंधन दामाद जी कराने लगे . किस बस्ती के किस दबंग से बूथ लुटवाने हैं , कहां बम फुड़वाने हैं , कहाँ मारपीट कर रंग में भंग डालना है , किस बस्ती में पैसे , किसमें दारु और किसमें चावल बंटवाने हैं . सारी व्यवस्था मुखिया जी ने करवा दी . चुनाव के नामांकन के अंतिम समय वकील साहब ने अपने नौकर से नामांकन करा दिया . अगले दिन मुखिया जी से कहा – एक डमी उम्मीदवार है , आपके प्रतिद्वंदी का वोट काटेगा . मुखिया जी निश्चिन्त हो गए . चुनाव के पहले वाली रात दामाद सारे जगह घूमकर नौकर को वोट देने की धमकी दे गए और बोले कि खबरदार मुखिया जी को वोट दिया . दारु , चावल और नोट सब नौकर की ओर से दिए गए हैं . मुखिया जी चुनाव हार गए और वकील साहब का नौकर चुनाव जीत गया . अब सारी मुखियागिरी वकील साहब करने लगे , दामाद जी का गाँव में आना बंद हो गया . मुखिया जी बड़बड़ाते रहते हैं – वकील साहब ने अपने अंतर्मन की बात नहीं सुनी . साधक निकले !
साधो ! अब लग भी जाओ , साधना का अभिजीत मुहूर्त निकला जा रहा है . पर जरा ध्यान रखना कि साधना खंडित न होने पावे !
अस्तु !
