Aravalli Hills: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा में सबकुछ साफ, फिर क्यों मचा है हंगामा

Bindash Bol

Aravalli Hills: आज जब हम तेजी से बढ़ती गर्मी, पानी की किल्लत, जहरीली हवा और बेतरतीब विकास को देखते हैं, तो अक्सर मन में सवाल आता है कि आखिर इन सबके पीछे वजह क्या है? दिल्ली-NCR और इसके आसपास के राज्यों जैसे हरियाणा और राजस्थान के कई इलाकों में हालात हर साल बिगड़ते जा रहे हैं. गर्मियों में तापमान असहनीय हो रहा है, बारिश कम हो रही है और जमीन के नीचे का पानी लगातार कम होता जा रहा है. इन सभी समस्याओं के पीछे एक बड़ा कारण है, अरावली पहाड़ियों का कमजोर होना.

अरावली कोई नई या साधारण पहाड़ियां नहीं हैं. ये दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक हैं, जो हजारों सालों से उत्तर भारत की रक्षा करती आ रही हैं. यह पहाड़ियां थार रेगिस्तान को दिल्ली और हरियाणा की ओर बढ़ने से रोकती हैं. यही पहाड़ियां बारिश के पानी को जमीन में रोककर कुओं, बावड़ियों और ट्यूबवेल को पानी देती हैं. यही जंगल और पहाड़ दिल्ली-एनसीआर की हवा को कुछ हद तक साफ रखते है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में अवैध खनन, जंगलों की कटाई और तेज निर्माण ने अरावली को गहरी चोट पहुंचाई है.

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय को खुद दखल देना पड़ा है. अदालत ने साफ कहा कि अगर अरावली को ऐसे ही नुकसान पहुंचता रहा, तो इसका असर सिर्फ एक राज्य या एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ेगा. इसी सोच के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को बचाने के लिए सख्त और साफ नियम तय किए हैं.

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, जीवन का सहारा है

अक्सर लोग अरावली को सिर्फ पत्थरों और पहाड़ियों का इलाका समझते हैं, लेकिन हकीकत इससे बहुत अलग है. अरावली एक पूरा प्राकृतिक सिस्टम है. जब बारिश होती है, तो पहाड़ियों की ढलानों से पानी धीरे-धीरे नीचे आता है और जमीन में समा जाता है. इससे भूजल रिचार्ज होता है. अगर ये पहाड़ियां न हों, तो बारिश का पानी बहकर निकल जाएगा और जमीन सूखी रह जाएगी.
अरावली की वजह से मिट्टी अपनी जगह बनी रहती है. जब पहाड़ कटते हैं, तो मिट्टी बह जाती है और खेत बंजर हो जाते हैं. यही कारण है कि कई इलाकों में आज धूल भरी आंधियां बढ़ गई हैं. इसके अलावा अरावली जंगलों, जानवरों और पक्षियों का घर है. पहाड़ियों के बीच की घाटियां और छोटे टीले जानवरों के आने-जाने का रास्ता बनाते हैं. अगर ये रास्ते टूट गए तो जंगल और जीव-जंतु दोनों खतरे में पड़ जाएंगे.

सुप्रीम कोर्ट को बीच में क्यों आना पड़ा?

अरावली में लंबे समय से खनन हो रहा था. कई जगह यह खनन नियमों के खिलाफ था. समस्या यह थी कि अलग-अलग राज्यों में अरावली की अलग-अलग परिभाषा थी. कहीं कहा जाता था कि सिर्फ ऊंची पहाड़ियां अरावली हैं, तो कहीं ढलानों और बीच के इलाकों को अरावली से बाहर मान लिया जाता था. इसी भ्रम का फायदा उठाकर खनन माफिया लगातार पहाड़ों को काटते रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब तक अरावली की एक साफ और समान परिभाषा नहीं होगी, तब तक इसका संरक्षण संभव नहीं है. इसलिए अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया कि एक विशेषज्ञ कमेटी बनाई जाए, जो वैज्ञानिक तरीके से तय करे कि अरावली आखिर है क्या और कहां तक फैली है?

कमेटी ने पुराने दस्तावेजों का किया अध्ययन
इस कमेटी में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन विभागों के अधिकारी, वैज्ञानिक और भू-विशेषज्ञ शामिल थे. कमेटी ने सभी राज्यों से बातचीत की और पुराने दस्तावेजों का अध्ययन किया. चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि राजस्थान पहले से एक नियम मानता आ रहा है. राजस्थान में तय किया गया था कि जो जमीन अपने आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची है, उसे पहाड़ी माना जाएगा और उस पर खनन नहीं होगा.

बाकी राज्यों ने भी माना कि यह नियम सही है, लेकिन इसे और ज्यादा साफ और मजबूत बनाने की जरूरत है. आखिरकार सभी राज्य इस बात पर सहमत हुए कि यही मानदंड पूरे अरावली क्षेत्र में लागू किया जाए, ताकि कोई भ्रम न रहे.

अरावली पहाड़ी की नई परिभाषा क्या है?

नई परिभाषा को बहुत सरल शब्दों में समझा जा सकता है. अगर कोई जमीन अपने आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची है, तो वह अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. इसमें सिर्फ ऊपर की चोटी ही नहीं, बल्कि उस पहाड़ी की ढलान, तलहटी और उससे जुड़े आसपास के इलाके भी शामिल होंगे. इसका मतलब यह हुआ कि अब कोई यह नहीं कह सकता कि ‘ऊपर की पहाड़ी तो अरावली है, लेकिन नीचे की जमीन पर खनन कर सकते हैं.’ पूरी पहाड़ी और उसका आसपास का क्षेत्र एक साथ सुरक्षित रहेगा.

नई परिभाषा में अरावली श्रेणी का भी मतलब हुआ साफ

नई परिभाषा में अरावली श्रेणी को भी साफ किया गया है. अगर दो या उससे ज्यादा अरावली पहाड़ियां एक-दूसरे से पांच सौ मीटर के अंदर हैं, तो उन्हें अलग-अलग नहीं माना जाएगा. उन्हें मिलाकर एक अरावली श्रेणी माना जाएगा. इन पहाड़ियों के बीच की जमीन, छोटे टीले और घाटियां भी उसी श्रेणी का हिस्सा होंगी. इससे यह सुनिश्चित होगा कि पहाड़ियों के बीच की जगह पर भी खनन या निर्माण न हो सके और पूरा इलाका एक साथ सुरक्षित रहे.

अरावली को लेकर नया नियम इतना जरूरी क्यों?

पहले खनन करने वाले लोग पहाड़ी के एक हिस्से को बचाकर दूसरे हिस्से को काट देते थे. इससे पूरी पहाड़ी कमजोर हो जाती थी. नई परिभाषा इस चालाकी को पूरी तरह खत्म कर देती है. अब पहाड़ी, उसकी ढलान और आसपास का इलाका सब एक साथ सुरक्षित रहेगा. इससे मिट्टी का कटाव रुकेगा, पानी जमीन में जाएगा, जंगल बचे रहेंगे और जानवरों का घर सुरक्षित रहेगा. इसका सीधा फायदा इंसानों को भी मिलेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की सिफारिशों को दी मंजूरी

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की सिफारिशों को मंजूरी दे दी. अदालत ने कहा कि अरावली की यह नई परिभाषा पूरे क्षेत्र में लागू होगी. संवेदनशील और सुरक्षित इलाकों में खनन पूरी तरह बंद रहेगा. जब तक पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक विस्तृत और वैज्ञानिक खनन योजना नहीं बन जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा. जो खदानें पहले से चल रही हैं, उन्हें भी अब सख्त नियमों का पालन करना होगा. नियम तोड़ने पर खदान बंद की जा सकती है.

इस फैसले का असर सीधा आम आदमी की जिंदगी पर पड़ेगा. अगर अरावली सुरक्षित रहेगी, तो हवा ज्यादा साफ होगी, पानी की कमी कम होगी और गर्मी का असर थोड़ा कम होगा. दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों के लिए यह फैसला किसी वरदान से कम नहीं है.

केंद्र की सफाई- अरावली मामले में फैलाया जा रहा झूठ

केंद्र सरकार ने उन सभी खबरों को गलत बताया है, जिनमें दावा किया जा रहा है कि अरावली पर्वतमाला की परिभाषा में बदलाव इसलिए किया गया है ताकि बड़े पैमाने पर खनन की अनुमति दी जा सके. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी फैसला न तो लिया गया है और न ही इसका कोई इरादा है. इसके उलट, अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर नियम पहले से ज्यादा सख्त किए गए हैं.

सरकार ने याद दिलाया कि अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है. कोर्ट द्वारा मंजूर किया गया जो नया ढांचा है, वह अरावली पर्वतमाला को मजबूत सुरक्षा देता है. इस व्यवस्था के तहत तब तक किसी भी नए खनन पट्टे की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक व्यापक और वैज्ञानिक प्रबंधन योजना को अंतिम रूप नहीं दे दिया जाता. मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत नई परिभाषा के लागू होने से अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा संरक्षित दायरे में आ जाएगा. उन्होंने कहा कि यह बदलाव खनन को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि अरावली की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए किया गया है.

‘सेव अरावली आंदोलन’ से जुड़ रहे विपक्ष के नेता

अरावली पर्वतमाला को बचाने को लेकर चल रहे ‘सेव अरावलीआंदोलन’ को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का भी समर्थन मिला है. इसी कड़ी में निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी भी अरावली संरक्षण की आवाज़ के साथ खड़े हो गए हैं. उन्होंने मौजूदा फैसले और उसकी व्याख्या पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

रविंद्र सिंह भाटी का कहना है कि जिस आदेश के तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर माना जा रहा है, उससे हालात बेहद चिंताजनक हो सकते हैं. उनके मुताबिक, इस मानक के लागू होने से अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर चला जाएगा. उन्होंने आशंका जताई कि इसका सीधा फायदा खनन करने वालों को मिलेगा और यह फैसला खनन माफियाओं के लिए रास्ता खोलने जैसा साबित हो सकता है.

भाटी ने इस पूरे मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी चिंता जाहिर की है. पत्र में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की हालिया व्याख्या के आधार पर अपनाई जा रही 100 मीटर ऊंचाई से जुड़ी प्रशासनिक नीति पर दोबारा गंभीरता से विचार करने की मांग की है. उनका कहना है कि अगर इस नीति पर समय रहते पुनर्विचार नहीं किया गया, तो अरावली जैसी महत्वपूर्ण पर्वतमाला को भारी नुकसान हो सकता है, जिसका असर पर्यावरण और आम लोगों की जिंदगी पर लंबे समय तक देखने को मिलेगा.

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