Assam Election : चाय के बगान, चुनाव और सियासत की नई पटकथा

Madhukar Srivastava
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* ​असम के चाय बागान: सियासत की नई प्याली में वादों की पुरानी कड़वाहट

Assam Election : असम की लाल मिट्टी और हरी पत्तियों के बीच इन दिनों चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है। हाल ही में एक ही क्षेत्र से दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक तस्वीर में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व नजर आता है, तो दूसरी तस्वीर में झारखंड की लोकप्रिय नेता कल्पना सोरेन की सहज आत्मीयता। तस्वीरें भले ही अलग-अलग विचारधाराओं की हों, लेकिन उनके केंद्र में एक ही वर्ग है— ‘टी ट्राइब’ (Tea Tribe)।

​तस्वीरें अलग, पर निशाना एक

असम के चुनावी रण में चाय के बागान सिर्फ भूगोल का हिस्सा नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी हैं। प्रधानमंत्री का इन बागानों में पहुंचना उनकी रणनीतिक गंभीरता को दर्शाता है, वहीं कल्पना सोरेन की मौजूदगी ने ‘आदिवासी अस्मिता’ के मुद्दे को नया आयाम दिया है। झारखंड से असम तक फैले इस समुदाय के सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों को टटोलते हुए कल्पना सोरेन का यहां पहुंचना विपक्षी खेमे की एक सोची-समझी बिसात मानी जा रही है।

​अस्तित्व की लड़ाई और चुनावी बिसात

असम के चाय बागानों की असली रौनक वहां के ‘टी ट्राइब’ हैं, जो सदियों से अपनी मेहनत से देश की अर्थव्यवस्था को महका रहे हैं। लेकिन इस महक के पीछे पसीने की कड़वाहट भी छिपी है। ये समुदाय दशकों से तीन बुनियादी मुद्दों पर संघर्ष कर रहा है….

1.​ अस्तित्व और पहचान: अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे की पुरानी मांग।

2.​ सम्मान: उचित दिहाड़ी और बेहतर जीवन स्तर।

3.​ अधिकार: भूमि का मालिकाना हक और बुनियादी सुविधाएं।

​”चुनाव आते ही चाय की पत्तियां राजनीति का रंग ले लेती हैं, लेकिन जब वोट डल जाते हैं, तो मजदूरी के चंद रुपये और धूल भरी बस्तियां ही हमारे हिस्से आती हैं।” — बागान में कार्यरत एक स्थानीय श्रमिक का दर्द।

​पुरानी प्याली, नया उबाल

इतिहास गवाह है कि असम की सत्ता का रास्ता चाय के बागानों से होकर गुजरता है। पिछली सरकारों ने भी लोकलुभावन वादे किए, लेकिन वे वादे फाइलों के अंबार में दबकर रह गए। आज भी चुनावी रैलियों में वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भी मतदाताओं के सामने “वही पुराने वादे, नई प्याली में गर्म करके परोसे जा रहे हैं।”
सत्तारूढ़ दल जहां अपने पिछले कामों का रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहा है, वहीं विपक्ष उन घावों को कुरेद रहा है जो अब तक भरे नहीं गए हैं।

क्या बदलेगी बागानों की तकदीर?

​प्रधानमंत्री मोदी का ‘विकासवाद’ और कल्पना सोरेन की ‘सांस्कृतिक कनेक्ट’ के बीच चाय बागान का श्रमिक आज भी इस उम्मीद में है कि शायद इस बार वादे सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि उसकी जिंदगी में उतरेंगे।
​असम की हरियाली के बीच यह चुनाव सिर्फ विधायक या सांसद चुनने का नहीं है, बल्कि उस ‘सम्मान’ को चुनने का है जिसका इंतजार टी ट्राइब पीढ़ियों से कर रहा है। देखना यह होगा कि चुनावी नतीजों के बाद इन बागानों की चाय में विकास की मिठास घुलेगी या फिर वही पुरानी उपेक्षा की कड़वाहट बरकरार रहेगी।

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