Being Free : होना स्वतंत्र

Bindash Bol

डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची

Being Free : रामलाल जी पहले कहते थे – भैया , विवाह के चक्कर में कौन पड़े , हम अच्छे से स्वतंत्र हैं . फिर अचानक वे प्रेम रोग से ग्रसित हो गए . कोई पूछता तो कहते – क्या करना स्वतन्त्रता का . मालिनी बेचारी भी तो परतंत्र है . उसके माता – पिता उसे मुझसे मिलने नहीं देते . हमलोग कैसे , किस -किस बहाने से आपस में मिल पाते हैं , मत पूछिए . मैंने स्वयं को उसे सौंप दिया है . फिर हल्ला हुआ कि रामलाल ने भागकर मालिनी से कोर्ट में विवाह कर लिया . तब रामलाल कहने लगे – स्वतन्त्रता बड़ी चीज है . हमदोनों अब स्वतंत्र हैं . वैवाहिक जीवन में रमते ही रामलाल का नाता दोस्तों से पूरा कट गया . तब वे सिर्फ काम से घर से बाहर जाते , जबतक काम रहता उतनी ही देर घर से बाहर रहते . काम समाप्त होते ही सीधे घर जाते . रास्ते में परिचित , मित्र मिलते , वे दूर से ही देखकर सड़क की दूसरी ओर खिसक लेते . कभी विवशता में दो मिनट ही रुकना पड़ जाता , घर में फोन से बता कर अपने अन्तःपुर से अनुमति लेना न भूलते . कहते रहते – इस परतंत्रता में ही आनंद है . कालांतर में बच्चों के बड़े होते ही हर छोटी – छोटी बातों में घर में आपसी चीख – चीख मचने लगी . अब रामलाल कहते फिरते हैं – अरे भाई ! स्वतन्त्रता भी तो होनी चाहिए . फिर अचानक कुछ दिनों के लिए पुराने , युवावस्था के मित्र मंडली में लौट आए . खुलकर हँसी – मजाक , खाना – पीना चला . लोग भूल भी गए कि रामलाल कब उनसे कट गए थे . लेकिन हुआ हुई जो होना था . चार दिनों की चाँदनी , फिर वही अँधेरी रात . उनका मित्रमंडली में अचानक से आना , मित्रमंडली के सदस्यों का फोन उठाना बंद ! मित्र मंडली ने प्रस्ताव पारित किया – अब रामलाल की धर्मपत्नी अपने मायके से लौट आयी हैं . ऐसे में रामलाल स्वतंत्र हों भी तो कैसे . रामलाल अब नींद में बड़बड़ाते रहते हैं – कैसा होता है होना स्वतंत्र !
एक दूसरा प्रसंग . उस सरकारी कार्यालय में पूरी स्वतन्त्रता थी , बस एक बात को छोड़कर . वह यह कि हर कार्य दिवस में कार्यालय तो आना पड़ता था . लेकिन कार्यालय कब आएं , कब जाएँ इस पर कोई प्रतिबंध नहीं था . उपस्थिति देना मात्र ही अनिवार्य , सरकारी जो था . कर्मचारी और अधिकारियों को वेतन इसी पर मिलता था . किसी का कोई काम करना ही पड़े तो उसके लिए ऊपरी आमदनी थी . इस स्वतन्त्रता से ऊपर से नीचे तक और जनता सभी प्रसन्न थे . अचानक एक बड़े साहब आए . कार्यालय में समय पर
और जाना कड़ाई से लागू हुआ . सभी को काम करना पड़ता . सभी कराह उठे और पुरानी स्वतन्त्रता को स्मरण कर दुःखी होते . तीन माह की परतंत्रता के बाद कार्यालय के सभी लोग अब अधिक प्रसन्न रहने लगे और कहते – स्वतन्त्रता से लाभ ही क्या ? अब नौकरी है तो नौकर बनना ही है . स्वतन्त्रता भी कैसी , इसकी ऐसी की तैसी . हमारी स्वतन्त्रता छीनी रहे , वही अच्छा . सरकार भी बहुत खुश हुई और उस कार्यालय की भूरी – भूरी प्रशंसा सभी प्रकार से की जाने लगी . बड़े साहब का डंका बजने लगा . उधर जनता त्राहिमाम कर उठी . जनता कहने लगी – यह कार्यालय पहले स्वतंत्र था , वही अच्छा था . दो पैसे खर्च करो , तुरंत काम होता था . न होने वाले असम्भव कार्य भी पाँच पैसे में हो तो जाते थे . अब दर दस गुनी हो गयी . सही कामों में उसके बाद भी देर लगती है , होगा भी कि नहीं संशय बना रहता है . सही काम पैसे देने के बाद भी काम हो उसकी गारंटी नहीं . लेकिन इतना अवश्य है कि असम्भव , नहीं होने वाले नियम विरुद्ध काम अपेक्षाकृत शीघ्र होते हैं . इतनी स्वतन्त्रता भी कम है क्या ?

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