Bihar Politics : बिहार की सत्ता के केंद्र में पिछले दो दशकों से अडिग रहे नीतीश कुमार अब अपनी भूमिका बदलने जा रहे हैं। पटना के ‘अणे मार्ग’ से दिल्ली के ‘संसद भवन’ तक का यह सफर बिहार की राजनीति में एक ऐसे शून्य को पैदा करेगा, जिसे भरना एनडीए के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
1. एक युग का अंत: 2005 से 2026 तक का सफर
24 नवंबर 2005 को जब नीतीश कुमार ने पहली बार सत्ता संभाली थी, तब बिहार अराजकता और प्रशासनिक सुस्ती के दौर से गुजर रहा था। उन्होंने ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा दिया और सड़कों, बिजली और कानून-व्यवस्था में जो सुधार किए, उसने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की छवि दी। गठबंधन बदले, साथी बदले, लेकिन बिहार की राजनीति का ‘पाइवट’ हमेशा नीतीश ही रहे। आज उनका राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करना इस बात का संकेत है कि बिहार अब ‘पोस्ट-नीतीश’ युग में प्रवेश कर चुका है।
2. राज्यसभा नामांकन: सोची-समझी रणनीति या मजबूरी?
गुरुवार को होने वाला नामांकन महज एक चुनावी प्रक्रिया नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी यह स्पष्ट करती है कि यह निर्णय उच्च स्तरीय राजनीतिक रजामंदी का परिणाम है।
* रणनीतिक बदलाव: इसे एक ‘योजनाबद्ध राजनीतिक संक्रमण’ के रूप में देखा जा रहा है।
* भूमिका का विस्तार: नीतीश का दिल्ली जाना उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में एक नई भूमिका दे सकता है, जबकि बिहार में भाजपा को अपना विस्तार करने का बड़ा मैदान मिलेगा।
3. उत्तराधिकार की जंग: कौन संभालेगा विरासत?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नीतीश के बाद कौन? वर्तमान में विमर्श दो दिशाओं में चल रहा है:
* निशांत कुमार का उदय: नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का नाम जदयू के भीतर नेतृत्व के लिए सबसे प्रबल माना जा रहा है। राजनीति से दूर रहने वाले निशांत का सक्रिय राजनीति में प्रवेश परिवारवाद से इतर जदयू के अस्तित्व को बचाने की एक कवायद हो सकती है।
* भाजपा की दावेदारी: चूंकि भाजपा गठबंधन का बड़ा हिस्सा है, इसलिए वह भी मुख्यमंत्री पद या महत्वपूर्ण सत्ता संरचना पर अपना दावा मजबूत करेगी। एनडीए विधायकों की बैठक इस दिशा में निर्णायक साबित होगी।
4. सियासी समीकरण और राज्यसभा की जंग
बिहार में राज्यसभा की 5 सीटों के लिए हो रहा यह चुनाव सत्ता के पुनर्संतुलन की प्रक्रिया है:
एनडीए का पलड़ा भारी:
* भाजपा की ओर से नितिन नवीन और शिवेश कुमार, जबकि जदयू से नीतीश कुमार और रामनाथ ठाकुर मैदान में हैं।
* उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका: राष्ट्रीय लोकमोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की दावेदारी ने समीकरणों को रोचक बना दिया है।
* विपक्ष की चुनौती: महागठबंधन पांचवीं सीट पर अपनी ताकत आजमाने की फिराक में है, जो एनडीए के एकजुटता की परीक्षा लेगा।
बदलाव की दहलीज पर बिहार
नीतीश कुमार का दिल्ली प्रस्थान बिहार की राजनीति में एक ‘पावर वैक्यूम’ (शक्ति का शून्य) पैदा करेगा। तकनीकी रूप से वे 9 अप्रैल तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं, लेकिन नैतिक और राजनीतिक दबाव उन्हें जल्द ही उत्तराधिकारी की घोषणा करने पर मजबूर करेगा। यह बदलाव केवल चेहरे का नहीं, बल्कि बिहार की कार्यशैली और भविष्य की दिशा का भी होगा।
”नीतीश कुमार की उपलब्धियां अब इतिहास का हिस्सा बनने की ओर हैं, और बिहार एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ा है।”
