Bihar Politics : बिहार की सियासत में नई चाल: अब क्या चाहते हैं नीतीश?

Madhukar Srivastava

* दिल्ली जाएंगे, पर बिहार की पकड़ नहीं छोड़ेंगे

* नीतीश का ‘मास्टरस्ट्रोक’: दिल्ली की मजबूरी या बिहार में नई घेराबंदी?

Bihar Politics : बिहार की राजनीति में शह और मात का खेल एक नए पड़ाव पर पहुँच गया है। नीतीश कुमार की अगली चाल और जेडीयू के भविष्य को लेकर जो सुगबुगाहट है। इस मसले पर मधुकर श्रीवास्तव की खास रिपोर्ट. ….!

​नीतीश कुमार राजनीति के वो खिलाड़ी हैं जो हारते हुए दांव को भी पलटना जानते हैं। वर्तमान सियासी गलियारों में चर्चा है कि नीतीश भले ही दिल्ली की राजनीति की ओर कदम बढ़ा रहे हों, लेकिन उनकी जड़ें और नजरें अभी भी पटना के ‘पावर सेंटर’ पर टिकी हैं। वे बिहार नहीं छोड़ेंगे और जब तक सियासी रसूख कायम है, जेडीयू को नई संजीवनी देने का प्रयास जारी रखेंगे।

​1. सीटों का गणित और ‘विकल्प’ की तलाश

​नीतीश कुमार इस हकीकत को बखूबी समझते हैं कि इस बार की चुनावी सफलता (85 सीटें) उनके लिए एक ‘सुनहरा पिंजरा’ बन गई है। अगर सीटें 45-50 के आसपास होतीं, तो उनके पास मोलभाव और पाला बदलने की गुंजाइश (Options) ज्यादा होती। जनता ने ‘जंगलराज’ के डर से एनडीए पर जो छप्पर फाड़ भरोसा जताया, उसने नीतीश के हाथ बांध दिए हैं। अब उनके पास दिल्ली की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचा, लेकिन वे बिना संघर्ष किए हथियार डालने वालों में से नहीं हैं।

​2. सम्राट का उभार और नीतीश की ‘मौन’ सहमति

​बीजेपी ने लव-कुश समीकरण में ‘कुशवाहा’ वोट बैंक को साधने के लिए सम्राट चौधरी को पूरी ताकत से आगे बढ़ाया है। नीतीश जानते हैं कि सम्राट इस समय मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे हैं और वे उनकी राह में रोड़ा नहीं बनेंगे। जहाँ तक उनके बेटे निशांत का सवाल है, नीतीश स्पष्ट हैं कि पार्टी में स्वीकार्यता और जनता के बीच पसीना बहाने में जमीन-आसमान का अंतर है।

​3. ‘दलित कार्ड’ और गृह मंत्रालय की नई शर्त

​जेडीयू को विलुप्त होने से बचाने के लिए नीतीश कुमार अब नई सोशल इंजीनियरिंग की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी नजर बिहार के 17 से 20 प्रतिशत दलित-महादलित वोटों पर है।

1​. दांव..

नीतीश ने बीजेपी के सामने शर्त रखी है कि जेडीयू को दो डिप्टी सीएम पद मिलें।

2.​ट्विस्ट..

वे चाहते हैं कि इनमें से एक डिप्टी सीएम दलित समाज से हो और उसके पास गृह मंत्रालय (Home Department) जैसा शक्तिशाली विभाग हो।

3.​पेच

नवंबर 2025 में बीजेपी ने खुद नीतीश से गृह विभाग छीना था, अब उसी विभाग को जेडीयू के दलित चेहरे को सौंपना बीजेपी के लिए ‘निगलते बने न उगलते’ वाली स्थिति है।

​4. रेस में आगे कौन? अशोक चौधरी बनाम सुनील कुमार

​नीतीश अपने इस ‘दलित गेमप्लान’ के लिए दो प्रमुख चेहरों पर भरोसा जता सकते हैं….

​अशोक चौधरी

वे ‘बहुजन’ के साथ-साथ ‘सर्वजन’ की राजनीति करते हैं। उनकी पकड़ सवर्णों और दलितों, दोनों पर है। वे नीतीश के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में से एक हैं।

​सुनील कुमार

पूर्व आईपीएस अधिकारी, बेदाग छवि और बेहद अनुशासित। वे प्रशासन को बखूबी समझते हैं और गृह मंत्रालय के लिए तकनीकी रूप से सबसे फिट बैठते हैं।

नीतीश कुमार का लक्ष्य साफ है—एक ताकतवर दलित चेहरा खड़ा करना जो भविष्य में मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बने। इससे न केवल दलित वोट बैंक जेडीयू की ओर शिफ्ट होगा, बल्कि बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व पर भी लगाम लगेगी। सवाल बस एक ही है: क्या बीजेपी अपना सबसे शक्तिशाली ‘हथियार’ यानी गृह विभाग नीतीश के सिपाही को सौंपेगी?

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