•• जॉर्ज फर्नांडिस से नीतीश कुमार तक—सत्ता की वही कहानी
Bihar Politics : यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति की बिसात पर बिछाई गई चालें अक्सर घूम-फिरकर अपने ही वजीर को मात देने लौट आती हैं। समय एक ऐसा न्यायाधीश है जिसकी अदालत में अपील नहीं होती, सीधा फैसला होता है।
यहाँ बिहार की राजनीति के संदर्भ में ‘कर्मों के फल’ और ‘राजनीतिक चक्र’ का एक प्रभावशाली विवरण की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है. ..!
1. जॉर्ज फर्नांडिस: नींव का पत्थर जिसे दीवार से हटा दिया गया
भारतीय राजनीति के ‘अग्निपुत्र’ कहे जाने वाले जॉर्ज फर्नांडिस केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक विचार थे। उन्होंने जिस समता पार्टी की नींव रखी, उसी के कोख से आज की जदयू (JDU) ने जन्म लिया। लेकिन राजनीति में कृतज्ञता की उम्र बहुत छोटी होती है।
- अपमान की पराकाष्ठा: 2009 का वह दौर कोई नहीं भूल सकता जब जॉर्ज साहब अस्वस्थ थे। उनकी पारंपरिक सीट मुजफ्फरपुर से उनका टिकट काट दिया गया।
- हाशिये का दर्द: जिस शख्स ने नीतीश कुमार को राजनीति की उंगली पकड़कर चलना सिखाया, अंत में उन्हें अपनी ही बनाई पार्टी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। यह सत्ता का वह अहंकार था जिसने मार्गदर्शक को ही बोझ समझ लिया।
2. नीतीश कुमार: सुशासन बाबू से समझौते के सुल्तान तक
नीतीश कुमार ने बिहार को ‘जंगलराज’ से बाहर निकालने का सपना दिखाया, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की उनकी ललक ने उन्हें बार-बार पाला बदलने पर मजबूर किया। आज जब उन्हें भाजपा के दबाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा या दिल्ली की राह देखने की चर्चा हो रही है, तो यह केवल एक पद का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक युग के अवसान का संकेत है।
3. इतिहास की पुनरावृत्ति: जो बोया, वही काटा
राजनीति में ‘दुनिया गोल है’ का मुहावरा आज बिहार के परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल सटीक बैठता है।
- कल जॉर्ज, आज नीतीश: कल नीतीश कुमार ने जॉर्ज साहब को किनारे कर पार्टी पर पूर्ण कब्जा किया था। आज भाजपा उसी आक्रामकता के साथ जदयू को समाहित करने या नीतीश को अप्रासंगिक करने की ओर बढ़ रही है।
- पार्टी का अस्तित्व: जिस तरह समता पार्टी का अस्तित्व जदयू में विलीन हुआ, आज कयास लगाए जा रहे हैं कि जदयू का भविष्य भी किसी बड़े दल (भाजपा) के विशाल तंत्र में विलीन हो जाएगा।
4. समय का न्याय: कोई भी अजेय नहीं
सत्ता के गलियारों में यह भ्रम पाल लेना कि ‘मैं ही अंतिम सत्य हूँ’, सबसे बड़ी भूल है। समय का पहिया जब घूमता है, तो सिंहासन और रसूख दोनों धूल धूसरित हो जाते हैं। नीतीश कुमार आज उसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ कभी उन्होंने अपनों को खड़ा किया था।
राजनीति के कड़वे सच
- सत्ता स्थायी नहीं है: कुर्सी आती-जाती रहती है, लेकिन आपके द्वारा किया गया व्यवहार ही आपकी विरासत तय करता है।
- कर्मों का प्रतिफल: राजनीति में दिया गया ‘धोखा’ या ‘उपेक्षा’ ब्याज समेत वापस लौटती है।
- नैतिकता बनाम अवसरवाद: जब अवसरवाद नैतिकता पर हावी होता है, तो अंत अक्सर अपमानजनक होता है। समय सबका हिसाब रखता है….
बिहार की राजनीति का यह अध्याय हमें सिखाता है कि जो बीज जॉर्ज फर्नांडिस की विदाई के समय बोया गया था, आज उसकी फसल काटने की बारी नीतीश कुमार की है। यह राजनीति का वह निर्दयी चक्र है जहाँ न कोई दोस्त है, न कोई दुश्मन—यहाँ केवल ‘परिणाम’ है। समय ने अपना पन्ना पलट दिया है, और इस नए पन्ने पर ‘अहंकार’ का नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व’ का संघर्ष लिखा है।
