कौशल किशोर शुक्ला
BJP : भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन और उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी की नियुक्तियों को लेकर यह घनघोर चर्चा छिड़ गई है कि क्या भाजपा में आरएसएस की भूमिका कमजोर हो गई है। 14 दिसंबर को हुई इन नियुक्तियों ने राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
मैंने जितने भी तथ्य खंगाले, उससे यह सामने आया कि ये नियुक्तियां भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मजबूती को दर्शाती हैं और आरएसएस की भूमिका ‘कमजोर’ होने से ज्यादा ‘परिवर्तनशील’ लगती है।
यह 2024 के चुनावी झटके के बाद ‘स्ट्रैटेजिक शिफ्ट’ है, जहां जाति-युवा फोकस वैचारिक पृष्ठभूमि से ऊपर है। आरएसएस को अभी पूरी तरह ‘कमजोर’ नहीं कहा जा सकता, हो सकता है भविष्य में, अध्यक्ष चुनाव में टकराव बढ़े, क्योंकि भाजपा अब ‘बड़े भाई’ की तरह व्यवहार कर रही है।
पहले नियुक्तियों के बारे में थोड़ा और जान लें।
उत्तर प्रदेश अध्यक्ष चुने गए पंकज चौधरी केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं और महराजगंज से सात बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। यह नियुक्ति 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले ओबीसी (खासकर कुर्मी) समुदाय को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में नुकसान हुआ था। वह योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर क्षेत्र से हैं, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं। ऐसी खासी चर्चा रही है कि केंद्रीय नेतृत्व ने योगी जी को घेरने की किसी तैयारी में कभी कोई कोताही नहीं बरती।
भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष चुने गए 45 वर्षीय नितिन नबीन कायस्थ परिवार से आते हैं और बिहार के सड़क निर्माण मंत्री हैं। चुनावी हलफनामे के मुताबिक नितिन नबीन की शैक्षणिक योग्यता 12वीं पास (इंटरमीडिएट) है। वह पटना के बांकीपुर से चार बार विधायक रह चुके हैं।
हां, वह जेपी नड्डा के बाद पूर्ण अध्यक्ष बनने की राह पर हैं, जो जनवरी 2026 में संभावित है। दो मार्च 2017 को नबीन ने बिहार कांग्रेस नेता अब्दुल जलील मस्तान के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज कराया था और उनकी नागरिकता पर सवाल उठाए थे। मस्तान ने कथित तौर पर एक रैली में भीड़ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर को जूतों से मारने के लिए कहा था।
कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति ‘जनरेशनल शिफ्ट’ का संकेत भी देती है, जो युवा नेतृत्व को बढ़ावा देता है। पीएम मोदी ने उन्हें ‘कड़ी मेहनत वाले कार्यकर्ता’ की पहचान बताया है।
दोनों नियुक्तियां भाजपा के सांगठनिक पुनर्निर्माण (आर्गनाइजेशनल रीबिल्डिंग) का हिस्सा ज्यादा लगती हैं, जो 2024 के चुनावी नुकसान के बाद जातिगत संतुलन और युवा ऊर्जा पर फोकस करती हैं।
आरएएस की कमजोरी की आम धारणा का आधार यही है कि ये नियुक्तियां उसकी पारंपरिक पकड़ से अलग दिख रही हैं। हालांकि, तथ्य इसकी कुछ पुष्टि भी करते हैं।
पंकज चौधरी के राजनीतिक सफर में आरएसएस का सीधा उल्लेख नहीं मिलता। वह 1989 से भाजपा के स्थानीय स्तर (गोरखपुर नगर निगम) के कार्यकर्ता हैं, लेकिन प्रचारक (आरएसएस का पूर्णकालिक सदस्य) या शाखा-आधारित बैकग्राउंड का कोई प्रमाण नहीं मिलता। वह ‘लो-प्रोफाइल, अनुशासित संगठनकर्ता’ के रूप में वर्णित हैं। आरएसएस ने शायद सहमति दी हो, लेकिन यह नियुक्ति योगी वर्सेज केंद्रीय संतुलन और ओबीसी फोकस पर ज्यादा केंद्रित लगती है।
नितिन नबीन का भी आरएसएस कनेक्शन कमजोर है। स्रोत स्पष्ट कहते हैं कि उनका डायरेक्ट आरएसएस बैकग्राउंड नहीं है। उनके पिता जनसंघ से जुड़े थे और वह कालेज में अभाविप (आरएसएस की छात्र शाखा) से जुड़े, लेकिन पूर्ण प्रचारक नहीं रहे। राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘शाकिंग’ मानते हैं, क्योंकि भाजपा के शीर्ष पदों पर आमतौर पर आरएसएस के लोग आते हैं। ऐसा माना जाता है कि फिर भी आरएसएस ने इसे मंजूरी दी, क्योंकि वह युवा नेतृत्व चाहता था।
संक्षेप में, इतना कहा जा सकता है कि दोनों नेता आरएसएस के ‘कोर प्रचारक’ नहीं हैं, जो पारंपरिक पैटर्न से अलग है, यह भाजपा के ‘स्वतंत्र निर्णय’ का संकेत देता है।
एक सवाल यह भी उठता है कि ताजा भाजपा-आरएसएस संबंध को देखें तो इसे कमजोरी के रूप में चिह्नित करें या बदलाव के रूप में?
दरअसल, अभी हाल ही में जेपी नड्डा कह चुके हैं कि अब भाजपा को संघ की जरूरत नहीं। उधर, आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर इसकी ताकत पर चर्चा हुई और यह भाजपा का वैचारिक आधार बना रहा। इसका उल्लेख पीएम मोदी ने लाल किला से भी किया और संसद में भी उनकी गर्जना हुई।
लेकिन, स्रोत बताते हैं कि भाजपा अब आरएसएस पर निर्भरता कम कर रही है। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व (मोदी-शाह) संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जो आरएसएस की ‘सामूहिक’ परंपरा से टकराता है। राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता इसे ‘संस्थाओं पर कब्जा’ बता रहे हैं।
