Budget : विभिन्न उपमाओं से परिभाषित हुआ केंद्रीय बजट

Bindash Bol

निशिकांत ठाकुर

Budget : केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने देश के लिए वर्ष 2026-27 का बजट संसद में पेश कर दिया। इस बजट का पूरा विवरण जब सामने आएगा, तो उस पर पक्ष-विपक्ष के बीच सार्थक चर्चा होगी और देशहित के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर देश को आगे बढ़ाने के लिए आगे आएंगे। वैसे, आर्थिक समीक्षकों की मानें तो यह बजट देश के लिए उपयुक्त और उच्च वर्ग, मध्यम तथा निम्न आय वर्ग वालों के लिए लाभकारी है। लेकिन, विपक्ष तो इसमें कमियां निकालेगा और बजट की भरपूर आलोचना करेगा। वैसे, यह एक नीतिगत बात होती है कि मूलरूप से सत्तापक्ष की बात को विपक्ष द्वारा स्वीकार कर लेने पर वह फिर शांत बैठ जाएगा, तो समाज को क्या और कैसे बताएगा कि जो हो रहा है ठीक हो रहा है। ऐसे में जनता उससे पूछ सकती है कि फिर समाज को आपकी क्या जरूरत है? वैसे, बजट में टैक्स से जुड़ी उम्मीदों के मुताबिक कोई ऐलान नहीं हुआ है। लोगों को उम्मीद थी स्टैंडर्ड डिडक्शन की लिमिट को 75,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये की जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में माध्यम वर्ग के हाथ खाली रहे, लेकिन कुछ ऐलानों से उन्हें फायदा होता भी नजर आ रहा है। इनमें जरूरी दवाओं पर ड्यूटी से छूट दिया जाना शामिल है। बजट में कैंसर और शुगर समेत 17 दवाओं पर सीमा शुल्क खत्म कर दिया है। इसके अतिरिक्त कई उत्पाद पर कस्टम ड्यूटी घटाने से जूते, चप्पल, स्मार्टफोन समेत कई माध्यम वर्ग के उपयोग की चीजें सस्ती हो जाएंगी।

सबसे पहले परिभाषा के रूप में यह समझने का प्रयास करते हैं कि बजट क्या है। तो, अर्थशास्त्रियों ने बजट को एक निश्चित भविष्य की अवधि विशेष रूप पर एक वर्ष के लिए सरकार, संस्था या व्यक्ति की अनुमानित आय और व्यय का विस्तृत वित्तीय ब्योरा है। यह संसाधनों के कुशल आवंटन, वित्तीय नियंत्रण और पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक योजना के रूप में कार्य करता है। भारतीय संविधान में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ कहा जाता है, जिसमें राजस्व प्राप्तियों और खर्चों का मदवार विवरण शामिल होता है। प्रायः हर व्यक्ति अपनी आय के अनुसार अपना मासिक बजट बनाता है। इसी को यदि विस्तृत स्वरूप में देखें, तो देश यह बजट अपनी हर वस्तु को व्यय और आय के अनुसार बनाता है। इसे प्रत्येक वर्ष देश की सर्वोच्च पंचायत (संसद) में रखा जाता है जहां एक-एक वस्तु पर विस्तृत चर्चा की जाती है, फिर वह पारित होकर महामहिम राष्ट्रपति की अंतिम स्वीकृति के बाद देश में लागू कर दिया जाता है। कुछ वर्ष पहले तक तो देश के सबसे बड़े उद्योग, यानी रेलवे के बजट को अलग से संसद में रखा जाता था, लेकिन अब यह जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय को ही दे दी गई है। अतः दोनों बजट संसद के पटल पर साथ ही रखे जाते हैं और इसकी जानकारी देश को दी जाती है।

वर्ष 2026-27 के लिए 53.47 लाख करोड़ रुपये का कुल बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं कि इस बजट में वैश्विक चुनौतियों का खास ध्यान रखा गया है। इसकी वजह यह है कि सात प्रतिशत की विकास गति को कायम रखने के लिए मैन्युफैक्चरिंग और पूंजीगत खर्च जी इन्फ्रास्ट्रक्चरिंग पर होने वाले खर्च के नाम से भी जानते हैं, पर खास जोर दिया गया है। मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने से घरेलू स्तर पर वस्तुओं का निर्माण बढ़ेगा, जिससे निवेश और रोजगार में बढ़ोतरी के साथ आयात में भी कमी आएगी और निर्यात बढ़ाने के अवसर पैदा होंगे। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि यह बजट 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षा को दर्शाता है, सुधारों की यात्रा को मजबूत करता है और विकसित भारत के लिए स्पष्ट रूपरेखा तैयार करता है। यह बजट भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करेगा। बजट में बड़ी शक्ति का प्रतिबिंब झलकता है। इस वर्ष बजट भारत की सुधार एक्सप्रेस को नई ऊर्जा और गति प्रदान करेगा।

देश का आमजन बजट का इंतजार इसलिए भी करता है कि किस प्रकार उसकी आय बढ़ेगी और किन वस्तुओं का मूल्य कम होगा और किन वस्तुओं का मूल्य आसमान छूने लगेगा। रोजगार कैसे मिलेगा और इस दिशा में सरकार द्वारा क्या किया जा रहा है। भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है जिसके कारण युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, जिन्हें रोजगार की जरूरत है। यहां अगर तुलनात्मक अध्ययन करें तो चीन की जो जनसंख्या विश्व की सबसे बड़ी थी, लिहाजा वहां रोजगार का भी बड़ा संकट था, लेकिन चीन ने अपने देश की जनसंख्या को भी नियंत्रित किया और बेरोजगारी को भी खत्म किया। लेकिन, हमारा देश इन दोनों मामले में अभी कमजोर है। अच्छी बातों को सीखने में कहीं कोई बुराई नहीं है, परंतु हम अपनी कमी की दूर करने के लिए किसी से सीखने में परहेज करते हैं। इस वित्त वर्ष में आयातित दवाएं, स्मार्टफोन तथा इलेक्ट्रॉनिक सामान, चमड़े की सामग्री, मसलन- जूते, बैग और जैकेट, मखाना और भुने हुए नट्स, माइक्रोवेव, क्रिकेट बैट्स सहित टेनिस रैकेट, विमान के इंजन कम्पोनेंट्स तथा पार्ट्स, सोलर ग्लास, परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आयातित सामान, महत्वपूर्ण खनिजों के लिए पूंजीगत सामान के भी मूल्यों में कमी की गई है। इसी तरह कुछ उपयोगी सामग्री को मंहगा भी किया गया है। विश्लेषक कहते हैं कि कुल मिलाकर यह बजट देश के विकास को गति प्रदान करेगा और समाज में जीने के लिए समान अवसर मिलेगा।

ऐसा नहीं है कि इस बजट की कोई कमी नहीं हो, लेकिन हां, 140 करोड़ के भारी-भरकम देश के प्रत्येक नागरिक का हित देखना आसान बात नहीं है। सरकार द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि सभी को समान अवसर दिए जाएं। लेकिन, विपक्ष की भी अपनी भूमिका होती है, जिसके कारण उसे अहम माना जाता है। सत्ता से अलग विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस बजट पर कहते हैं कि मोदी सरकार के पास अब सोच की कमी है, आइडिया खत्म हो गए हैं, इसीलिए भारत की कई आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों में से एक का भी समाधान यह बजट नहीं देता है। सरकार का कोई नीतिगत दृष्टिकोण नहीं है, साथ ही कोई इच्छाशक्ति भी नहीं है। इसी तरह कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश कहते हैं कि बजट को लेकर जो माहौल बनाया गया था, उसके मुकाबले कहीं कमतर है। भाषण भी पारदर्शी नहीं था, क्योंकि इसमें प्रमुख कार्यक्रमों और योजनाओं के लिए बजटीय आवंटन को लेकर कोई भी जानकारी नहीं दी गई है। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम इस बजट को असंतोषजनक और असफल करार देते हुए कहते हैं कि वित्तमंत्री का भाषण सुनकर अर्थशास्त्र का हर छात्र तथा बजट पर टिप्पणी करने वाले लोग हैरान होंगे। उनका कहना है कि बजट भाषण का ऐसा नैरेटिव प्रस्तुत करना चाहिए था जो आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लखित चुनौतियों का समाधान करे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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