Chhaava : इतिहास को ज्यादा गहराई में नहीं लिखूंगा क्योंकि फ़िल्म देखने योग्य है और देखी ही जानी चाहिए। मुग़ल आधिपत्य के समय कई हिन्दू शक्तियां थीं जिनके मन में स्वतंत्रता की आग उठ रही थी। जब शिवाजी ने औरंगजेब को आगरा के तख़्त पर बैठा देखा तो उनके मन में यही स्वर गूंजा,
“तू जिस तख्त पर बैठा है वो प्रभु श्री राम, धर्मराज युधिष्ठिर, चन्द्रगुप्त और पृथ्वीराज का है। उस नाते इसका उत्तराधिकार मेरे पास है, इसलिए औरंगजेब नीचे उतर।”
इसी भावना के साथ 1674 में मराठा साम्राज्य की स्थापना की गयी, रघुवंश कालीन छत्रपति उपाधि पुनः जीवित की गयी। 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गयी, तमाम आंतरिक षड्यंत्रों से जूझकर उनके बेटे संभाजी अगले छत्रपति बने।
छत्रपति के रूप में संभाजी का डेब्यू इतना भयावह था कि औरंगजेब खुद आगरा से निकल पड़ा और यही औरंगजेब की जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई, क्योंकि इसके बाद वो दोबारा कभी उत्तर भारत नहीं लौट सका।
संभाजी 1681 से 1689 तक औरंगजेब से लड़ते रहे, हर युद्ध मे जीते और अंत में धोखे से पकड़े गए। कई दिनों की यातना के बाद उन्हें मार दिया गया, ये यातनायें फ़िल्म में पूरी तरह दिखाई गयी हैं।
संभाजी को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि हिन्दुओं के पास सिर्फ दो विकल्प बचे थे, या तो डरकर हथियार रख देते या फिर मुगलों की कब्र खुदने तक लड़ते, महाराष्ट्र में हिन्दुओं ने दूसरा विकल्प चुना और लड़ाई जारी रखी। संभाजी को मारकर भी औरंगजेब वापस नहीं लौट सका और 27 वर्ष दक्खन में बर्बाद करके मर गया।
ये इतना समय था कि उत्तर में मेवाड़ के जय सिंह, भरतपुर के चूड़ामन जाट और गुरु गोविन्द सिंह जी ने हिन्दुओं की एक नई फ़ौज खड़ी करके मुगलों का सिरदर्द बढ़ा दिया। 1707 में औरंगजेब महाराष्ट्र में ही मर गया, आगे चलकर मराठा साम्राज्य में भी छत्रपति की जगह उनके पेशवा प्रधान बन गए।
स्वराज की अवस्था अभी दूर थी, और 1757 में जब पेशवा ने दिल्ली से अब्दाली को खदेड़कर अपना गवर्नर बैठाया तब जाकर पूर्ण स्वराज का सपना साकार हुआ। हालांकि 1803 में अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य के सेनापति दौलतराव सिंधिया को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
किताबों में आज भी यही पढ़ाया जाता है कि मुगलों ने 1857 तक राज किया मगर ये नहीं पढ़ाया जाता कि 1757 से ही उनकी शक्ति शून्य थी और वे एक हिन्दू साम्राज्य के अधीन थे।
खैर, मराठा साम्राज्य 144 वर्ष शासन में रहा, संभाजी का कार्यकाल इसमें 5% ही है मगर ये साम्राज्य के फाउंडिंग फिगर में से एक हैं। यदि वे नहीं होते तो हमारे आज की कल्पना नहीं हो सकती थी। शायद इसीलिए ही इन्हें इतिहास में स्थान नहीं मिला।
लेकिन बॉलीवुड की ये अच्छी पहल रही, जब सेक्युलरिज्म के आधार पर पाठ्यक्रम बनाये जा रहे थे तो बनाने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि सच डिजिटल गलियारों में रास्ता बनाकर हिन्दुओं के सामने खड़ा हो जाएगा।
उसी सच को जानने के लिये यह फ़िल्म जरूर देखिये, जो देख चुके हैं वे पूर्ण रेटिंग दें। ये भी एक प्रकार का इनफार्मेशन वॉरफेयर ही है।
विशेषार्थ – ये फ़िल्म “बंटेंगे तो कटेंगे” की अगली कड़ी है, इस पर चर्चा करते समय जातियों के नाम का प्रयोग करने से बचें, पोस्ट में मराठा शब्द साम्राज्य के लिये प्रयोग हुआ है, किसी जाति के लिये नहीं। हमें जातिवाद में उलझे बिना सिर्फ हिन्दू एकता पर केंद्रित होना है।
अब आपके प्रश्न और मेरे जवाब
कैसी फिल्म है छावा ?
“जोशीली,गर्वीली,ईमानदार और प्रभावी”
क्या ये वाजीराव मस्तानी से भी बेहतर है ?
“दोनों में कोई तुलना नहीं है दोनों बेहतरीन हैं वाजीराव स्पीड की फिल्म थी ये स्लो मोशन की”
क्या इसमें कुछ नया नहीं है ?
“बाहुबली की तरह सैकड़ों नयी चीज़ें है खास तौर पर गुरिल्ला युद्ध पद्यति के कई अनदेखे अनसुने ट्रिक्स”
क्या इसमें इतिहास के साथ छेड़ छाड़ की गयी है ?
“1% भी नहीं, ये फिल्म 100 % हिस्टोरिक है”
क्या इसमें संभाजी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है ?
“बिल्कुल भी नहीं,उनका करैक्टर पूरी ईमानदारी से दिखाया गया है”
क्या विक्की कौशल ने इसमें ओवर-एक्टिंग की है
“कहीं भी 1 % भी ओवर एक्टिंग नहीं है वे तूफानी हमलावर से लेकर प्रताड़ना झेलते हर सीन में कमाल के लगे हैं”
तो इस फिल्म में दिक्कत क्या है ?
“जिन्हें मराठा इतिहास की समझ नहीं है वो इस फिल्म में इतने सारे करैक्टर नहीं समझ पाएंगे”
GenZ के लिए सोयराबाई,हम्बीरराव मोहिते,गणोजी शिर्के,जीनत और शहज़ादा अकबर को समझ पाना बड़ी टेढ़ी खीर होगी
क्या यह एक Sad फिल्म है ?
“बिल्कुल भी नहीं”
यही इस फिल्म की ताकत है
जब औरंगज़ेब अपने कैंप में संभाजी को अमानवीय यातनाएं देता है तब हमारी आँखों में आंसू तो होते है पर डर नहीं
ज़ंजीरों में बंधे संभाजी का बेख़ौफ़ चेहरा और गरजती आवाज़ आपके अंदर तूफानी ऊर्जा पैदा कर देती है
क्यों देखनी चाहिए ये फिल्म ?
“ताकि आपको स्वराज का असली अर्थ पता चल सके”
ताकि आप ये समझ सकें कि कैसे 25 हज़ार मराठे दुनिया की सबसे बड़ी 8 लाख की मुग़ल फौज से भिड़ जाते थे और पलक झपकते उन्हें धूल चटा देते थे
विक्की कौशल के अलावा और किसकी एक्टिंग बहुत अच्छी है ?
- आशुतोष राणा (हमवीरराव मोहिते)
- अक्षय खन्ना (औरंगज़ेब)
- विनीत कुमार (कवि कलश)
- दिव्या दत्ता (सोयराबाई)
- डायना पेंटी (जीनत)
- रश्मिका मंधाना (येशुबाई)
इस फिल्म ने सबसे अच्छा न्याय किसके साथ किया है ?
“मराठों के साथ”
मराठे क्या थे,क्यों थे,कैसे अलग थे ये इस फिल्म में बहुत अच्छे से दिखाया गया है
शम्भाजी आखिरी में औरंगजेब से कहते है
“हमारी तरफ आ जाओ,शान से जियोगे और अपना धर्म भी नहीं बदलना पड़ेगा”
यही असली मराठा करैक्टर था
“किसी को उसकी जाति-धर्म और लिंग के चश्मे से ना देखकर सबको माँ भारती का सपूत समझने वाले लोग”
हर भारतीय को क्यों देखनी चाहिए यह फिल्म ?
“ताकि आपको एक भारतीय होने पर गर्व हो”
“ताकि मराठों को जानकर आपका सीना चौड़ा हो जाये”
“ताकि आप आज़ादी की असली कीमत समझ पाएं”
“ताकि आप अपने अंदर छुपीं असीमित क्षमताओं को पहचान सकें”
“ताकि आप अपनी मिटटी,अपने लोगों और अपनी संस्कृति की रक्षा करने वाले वो फौलाद बन जाएँ जिससे पूरी दुनिया खौफ खाये