निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव
Chhath Puja 2025 : सूर्य षष्ठी व्रत सूर्योपासना का व्रत तो है ही, साथ ही सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के छठे सर्वोत्कृष्ट मातृ रूप की उपासना का भी पर्व है। प्रकृति देवी का यह रूप हमारे सामूहिक अवचेतन में छठी मइया के रूप में कब प्रतिष्ठित हुआ, यह बताना मुश्किल है। यह चार दिवसीय महापर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ होता है। पहला दिन नहाय-खाय को व्रती सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन उपवास रखते हैं और संध्या समय रोटी-खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। तीसरे दिन यानी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को ‘डूबत सूरज देव, देब अर्घ हम तोहार’ गीत के साथ अस्ताचलगामी और सप्तमी तिथि उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता। छत्तीस घण्टे के निर्जला उपवास के बाद उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात् व्रती द्वारा पारण करने के साथ महापर्व छठ का समापन हो जाता है। दीपावली के बाद ही छठ के गीत बजने शुरू हो जाते हैं। सप्तमी को ये गीत बजने बन्द हो जाते हैं। पूरे वातावरण में नीरवता व्याप्त हो जाती है। लोकचित्त उदासी में डूब जाता है। छठ माता अगले वर्ष आने का आश्वसन देकर विदा ले चुकी होती हैं।
सूर्योपासना के इस पर्व का इतिहास बहुत पुराना है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान् राम जब चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो रावण वध के पाप से मुक्ति के लिए ऋषि-मुनियों ने राम को राजसूय यज्ञ करने का परामर्श दिया। इस अवसर पर महर्षि मुग्दल को आमंत्रित किया गया। कथाओं के अनुसार महर्षि मुग्दल ने
वन से लौटने के बाद ऋषि-मुनियों के कहने पर राम ने राजसूय यज्ञ किया था। राजसूय यज्ञ की समाप्ति के बाद महर्षि मुग्दल ने राम और माता सीता को अपने आश्रम आने का निमंत्रण दिया। ऋषि की आज्ञा का पालन करते हए राम माता सीता माता आज के मुंगेर स्थित मुग्दल ऋषि के आश्रम पहुँचे। महर्षि मुग्दल माता सीता को ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। माता सीता ने गंगा तट पर चार दिनों तक सूर्योपासना की और छठ व्रत संपन्न किया। वह तो सूर्यवंश की कुलवधू थीं।
द्वापर के महाभारत काल में छठ पर्व का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यपासना कर इस पर्व की शुरुआत की थी। एक दूसरे प्रसंग के अनुसार जुए में पांडवों द्वारा राजपाट हार जाने पर द्रौपदी ने सूर्यदेव की उपासना की थी। एक कथा के अनुसार भगवान कृष्ण अपने पुत्र सांब से किसी बात पर क्रोधित हो गए। उन्होंने क्रोध में सांब को कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया। इस शाप से मुक्ति के लिए नारद ऋषि ने सांब को सूर्य मंदिरों के निर्माण और सूर्यदेव की उपासना का उपाय सुझाया। सांब ने सूर्य की बारह राशियों के आधार पर देश भर में लोलार्क, उलार्क, औंगार्क, कोणार्क, देवार्क सहित बारह सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया, जिसमें नौ बिहार में हैं-औंगार्क और बड़ार्क (नालंदा जिला के एकंगरसराय के निकट अंगारी एवं बड़का गाँव में), देवार्क एवं उमगार्क (औरंगाबाद जिले के देव एवं उमगा में), पुण्यार्क (बाढ़ के पंडारक में), उलार्क (पटना जिला के भरतपुरा में), हंडार्क (नवादा जिला में) एवं तन्डवार्क एवं दक्षिणार्क (गया जिला में)। साम्ब की राजधानी राजगीर) में थी। राजगीर के निकट निर्मित बड़ार्क सूर्य मंदिर में सवा महीने स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देकर सांब कुष्ठ रोग से मुक्त हुए थे।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में छठ का उल्लेख है। मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी को कोई संतान नहीं थी। कश्यप ऋषि ने संतानLL प्राप्ति हेतु यज्ञ कराया। रानी गर्भवती हुईं और नौ महीने बाद रानी ने पुत्र को जन्म दिया लेकिन वह मरा हुआ पैदा हुआ। इससे राजा और रानी और दुखी हुए और श्मशान में ही प्राण त्यागने का संकल्प लिया। तभी कश्यप ऋषि के आह्वान पर ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने कहा कि मैं सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न षष्ठी देवी हूँ। यदि तुम मेरी पूजा-आराधना करोगे और औरों को भी इसके लिए प्रेरित करोगे तो तम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। षष्ठी देवी की आज्ञा मानकर प्रियव्रत और उनकी रानी ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि को षष्ठी देवी की पूजा पूरे विधि-विधान से की और उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। मान्यताओं के अनुसार, तभी से छठ पर्व की शुरुआत हुई। शिव पुराण में भी इस व्रत का उल्लेख है। शिव के तेज से उत्पन्न स्कंद की रक्षा छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान करा कर की। इसलिए उनका नाम कार्तिकेय पड़ा और इन्हीं छह कृतिकाओं को छठी मइया कहा गया।
बिहार में सूर्य उपासना की परम्परा हजारों वर्ष पुरानी है। प्राप्त साक्ष्य के अनुसार बिहारवासी लगभग ढाई हजार वर्ष पहले से सूर्य-मूर्ति की पूजा करते आ रहे हैं। विभिन्न पुरातात्विक स्थलों की खुदाई में मिली सूर्य-प्रतिमाओं से स्पष्ट है कि शुंग, कुषाण, पाल और गुप्त काल में सूर्य की पूजा होती थी।
हमारी जातीय स्मृति का केंद्रीय बीज या प्रतीक है सूर्य। तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में सूर्य ही एकमात्र दृश्यमान देवता हैं। सुदूर प्रागैतिहासिक युग के किसी अनाम कालखण्ड में हमारे पूर्वजों में से किसी द्रष्टा ने, किसी ऋषि ने, किसी आद्य अनुभवकर्त्ता ने उदीयमान सूर्य की सप्तवर्णी अरुणिमा को आस्था और धर्मभाव से या आश्चर्य भाव से या फिर कविजनोचित स्वतःस्फूर्त दिगंत व्यापिनी कल्पना के दबाव में देखा होगा और उसे दिव्यता से मंडित कर अपना पालनकर्त्ता मान लिया होगा। बाद में सूर्य को विष्णु का ही रूप माना गया। वेदों में जो विष्णु का नाम मिलता है, वही सूर्य है। 'विष्णु' शब्द 'विष् या 'विश्' धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है 'व्यापक रूप में ।' अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। सूर्य अपनी रश्मियों से सर्वत्र व्याप्त होने के कारण 'विष्णुर्भवति' विष्णु हो जाता है। ऋग्वेद में विष्णु को तेजोमय परमात्मा कहकर संबोधित किया गया है।
ऋग्वेद में प्रकाश के संरक्षक देवता के रूप में सूर्य देवता का दस सूक्तों में आह्वान किया गया है। ऋग्वेद में सूर्य को सौर देवताओं में सूर्यमण्डल को द्योतित करने वाले साकार देवता माना गया है। सूर्य को देवताओं का श्रेष्ठ दृष्टिगोचर रूप, स्थावर और जंगम की आत्मा, मित्र, वरुण और अग्नि की आँख, दूरदर्शी, सर्वदर्शी, सभी जीवों को देखने वाला, मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाला एवं भोर की देवी उषा का प्रेमी बतलाया गया है। उसके रथ को सात घोड़े खींचते हैं। प्रकाश के संरक्षक के रूप में सविता और उषा का भी स्तवन किया गया है।
त्रेता युग में अगस्त्य ऋषि ने 'आदित्यहॄदयम्' की रचना की जो सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं। इस स्तुति में यह कहा गया है-"भगवान सूर्य अपनी अनन्त रश्मियों से सुशोभित हैं। वे नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवताओं और असुरों के नमस्कृत, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। संपूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि हैं और संपूर्ण जगत् के पति हैं। ये अपनी रश्मियों का प्रसार कर देवताओं और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कंद, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनी कुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रगट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।
इन्हीं का नाम आदित्य (अदिति के पुत्र), सविता (जगत् को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरण करने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सर्वज्ञ, सदृश्य, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्मांड की उत्पत्ति का बीज), दिवाकर (रात्रि के अंधकार को दूर कर दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक या हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों वाला), सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले), मरीचमान् (किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अंधकार का नाश करने वाला), शम्भू (कल्याण का उद्गम स्थल), त्वष्टा ( भक्तों का दुख दूर करने वाले), मार्तण्ड (ब्रह्मांड को जीवन देने वाले), अंशुमान् (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से सुख देने वाले), तपन ( गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर (दिनकर), रवि (सबके स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ, अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन, व्योमनाथ, ऋग्, यजु: एवं सामवेद के पारगामी, अपो मित्र (जल उत्पन्न करने वाला), विंध्यवीथिप्लवगम (आकाश में तीव्र गति से चलने वाले), आतपी ( घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरण समूह करने वाले), मृत्यु (मौत का कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), सरभवोद्भव (सब की उत्पत्ति का कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत् की रक्षा करने वाले), द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। सूर्य को इन नामों से संबोधित कर उनकी स्तुति की गई है।
इस स्तुति में आगे सूर्य के पूर्वगिरि उदयाचल और पश्चिमगिरि अस्ताचल रूप की वंदना की गई है। फिर उन्हें जयस्वरूप, विजय और कल्याण के दाता, उनके उग्र, वीर और सारंग रूप तथा उन्हें अंधकार, जड़ता, शीत, शत्रु, कृतघ्न का नाशक, तपाये हुए स्वर्ण की भांति प्रभावान, हर और विश्वकर्मा तथा जगत् की समस्त क्रियाओं का कारण मानते हुए उनकी वंदना की गई है।
सूर्य समस्त सृष्टि सहित हमारे पालनकर्त्ता हैं और इसलिए हम सब सूर्य-संतान हैं। सूर्य सृष्टि का आदि कारण हैं। वे योग हैं निरंतर गतिमानता, कर्मशीलता और पुरुषार्थ का। वह श्री, शोभा,जीवन, प्राण, मधु, तेज, परिपक्वता, तप, ताप, दाह, विराग, संघर्ष और देहातीत चिन्मयता को एक साथ व्यक्त करते हैं। जब वे तपते हैं उनकी किरणें दाने-दाने को पका कर अनाज को मधुमय करती हैं, स्वादिष्ट बनाती हैं। इन्हीं किरणें के ही कारण कषाय केले और खट्टे आम पककर मीठे हो जाते हैं। उसके प्रकाश में पेड़-पौधे अपना भोजन तैयार करते हैं। वह मधु को पकाते हैं, उसका ‘सूदन’ करते है, अतः मधु-सूदन हैं। वह हमें पालते हैं। इसलिए दावा करते हैं कि मनुष्यों! तुम मेरी सन्तति हो। मनुष्य ही क्यों? समस्त प्राणी उनकी सन्तति हैं। पूरा रघुकुल उसकी संतान है। उसका सारा कर्मयोग निरासक्त है, निर्लोभ है, ऋत की रक्षा के लिये है। ऐसे सूर्य का संतान होना गर्व का विषय है। सूर्य षष्ठी व्रत पिता के प्रति संतान द्वारा आभार का प्रकटीकरण है। छठ महापर्व के रूप में हमने अपनी जातीय स्मृति के उस आद्य बिम्ब को सहेज कर रखा है। यह पर्व आत्मदान के लिए हमारी समुत्सुकता का परिचायक है। यह समुत्सुकता, अज्ञेय की ‘कितनी नावों में कितनी बार’ की ‘प्रातः संकल्प’ कविता की इन पंक्तियों में व्यक्त है-
ओ आस्था के अरुण
हाँक ला, उस ज्वलन्त के घोड़े
खुंद डालने दे
तीखी आलोक-कशा के तले तिलमिलाते पैरों को
नभ का कच्चा आँगन!
बढ़ आ जयी!
सँभाल चक्र -मंडल ये अपना!
छठ पर्व अहंकार के विसर्जन का पर्व है। सूर्य से बढ़कर अहंकार विसर्जन करने वाला कौन होगा, जो अस्ताचल पर उतना ही विरक्त है, जितना उदयाचल पर। अपने लिए कुछ नहीं। दूसरों के लिये, समस्त सृष्टि के लिए जलते रहना है। उसके उदित होने मात्र से प्रकृति उद्दीप्त हो उठती है, धरती पर जीवन स्पंदित होने लगता है, पौधे और फूल खिल उठते हैं, मनुष्य, पशु और पक्षी जाग पड़ते हैं,ओस की हर बूँद में उसकी रश्मियाँ नर्तन करती हैं।
हम हर वर्ष आस्था और उल्लास के साथ सूर्य षष्ठी व्रत मनाते हैं। सूर्य षष्ठी व्रत में अस्ताचलगामी यानी डूबते हुए सूर्य को पहले और उदीयमान सूर्य की बाद में अर्घ्य अर्पित कर आराधना की जाती है। लोक आस्था और लोकचेतना का यह महापर्व सावयीव एकात्मकता और सामूहिकता का पर्व है, धार्मिकता नहीं आध्यामिकता का पर्व है, प्रकृति के प्रति संयम और समर्पण का पर्व है, पर्यावरण के प्रति सजगता का पर्व है। सूर्य की आराधना और उपासना हमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदननशील बनाती है। पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे स्वच्छ और अक्षय स्रोत है सौर्य ऊर्जा। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के नकरात्मक परिणामों से आक्रांत दुनिया की भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद सौर्य ऊर्जा ही है। इस दृष्टि से सूर्योपासना का पर्व छठ न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक परम्परा है, बल्कि बिना विनाश के विकास के विजन का संकेत भी।
