डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Corruption : भ्रष्टाचार एक छूत की बीमारी है . जिसे लग जाए तो उसका जीवन सुख और सम्पत्तियों से ठसाठस भर जाता है , लेकिन वह भय और चिंता से ग्रसित होने लगता है .भ्रष्टाचार के रोगी के कई दृश्य और अदृश्य लक्षण पाए जाते हैं . दृश्य लक्षणों में उसका चौकन्ना रहना , बेचैन रहना , फाइलें दबाना , सूचना देकर भष्टाचार की राशि माँगना , भष्टाचार की राशि लेने के स्थान खोजना , भ्रष्टाचार की राशि रखने की व्यवस्था करना , उसे संग्रहित करने के स्थान तय करना , अकूत सम्पत्ति खरीदना , उन्हें छिपाने के नए तरीकों पर शोध करना और किसी को संदेह नहीं हो , इसका ध्यान रखना . यह सब प्रत्यक्ष लक्षण बीमारी के बढ़ने के साथ पैने होते चले जाते हैं . अदृश्य लक्षण उसकी भ्रष्टाचार की बीमारी के बढ़ते ही नाना प्रकार के पाए जाते हैं , जो भिन्न – भिन्न व्यक्तियों के स्वभाव पर निर्भर करते हैं . आत्मा का मर जाना , नैतिकता से दूरी बना लेना , सदाचार से घृणा करना , सदाचारियों की छाया से भी दूर रहना आदि साधारण लक्षण हैं
सयानों का मत है कि भष्टाचार से मुक्ति ही क्यों ? उनका तर्क है कि ऑनेष्टि पेज इन द लॉन्ग रन , बट डिजॉनेस्टी पेज ऑन द स्पॉट . सो व्हाई टू वेस्ट टाइम ! सदाचार लम्बे समय बाद लाभ देता है तो वहीं भष्टाचार तुरंत लाभ दे जाता है . फिर समय की व्यर्थ बर्बादी क्यों ? भष्टाचार एक ऐसी अनोखी व्यवस्था है , जिसे भारतीय नौकरशाही ने दशकों के तप से विकसित किया है . क्या उसे नष्ट होने दें ? इसकी ऊपर से नीची आती जड़ें पाताल लोक तक गयीं हैं , क्या पाताल लोक तक पँहुचकर कोई प्रभु श्रीरान या प्रभु हनुमान तो है नहीं कि लौट आवे . फिर इससे मुक्ति का मार्ग क्यों कर ? भष्टाचार के बल पर नारियों की किट्टी पार्टी , पुरुषों के लिए क्लब , गहने – जेवर , जमीन -मकान , कन्याओं के लिए दहेज की व्यवस्था , समाज में बड़े बनने के नाना प्रकार के दिखावे , जर – जमीन , फ्लैट – फ़ार्म हाउस ऐशोआराम आदि सम्पोषित होती हैं . हमारी अर्थव्यवस्था का आधे से अधिक भाग भ्रष्टाचार से भरा है . आप क्या चाहते हैं कि भ्रष्टाचार की मुक्ति से ये औंधे मुँह गिर जाएँ . इतने वर्षों के अभ्यास से भ्रष्टाचार हमारी जीवन शैली में प्रविष्ट हो चुका है . लोग समझदार हैं . स्वयं घूस दे कर जाते हैं .
क्या हम भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के फेरे में लोगों को उनकी आदतें बदलने को विवश करें ? सयाने तो यहाँ तक कहते हैं कि कोई सरकारी बाबू बिना रिश्वत के कोई काम कर दे , सरकारी कार्यालयों में बिना घूस के कोई काम होने लगे , थानों में न्याय पूर्वक काम बिना पैसा खर्च किये होने लगे तो जनता आश्चर्यचकित नहीं होगी . उसे संदेह नहीं होगा कि लेने वाला जाली है ? इस टंटे में पड़ना ही क्यूँ ?
रामलाल भ्रष्टाचार का सिद्धांत बाँचते हैं . उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के मामले में अपनी नादानी से कभी फँस जाओ तो याद रखो – जहर का काट जहर . घूस लेने के काम में फँसो तो घूस देकर बरी हो जाओ . बस इतना सही पता हो कि किसे , किस समय और कितना देना है . रवि बाबू का मत है कि हम सब भ्रष्टाचार के द्वीप पर बैठे हैं . जब घूस मिलता है तो हम आनंद के अतिरेक में पँहुच जाते हैं और जब घूस देना पड़ता है तो हल्ला मचाते हैं कि बड़ा भ्रष्टाचार मचा है . कुछ ऐसे भी हैं , जिन्हें नियति ने भ्रष्टाचार करने का अवसर ही नहीं दिता . वे खुलेआम भ्रष्ट हो जाने को आतुर थे . पर हाय रे उनका भाग्य ! मौका तक नहीं मिला . इस श्रेणी के लोग बहुत भ्रष्टाचार मचा है कि ढोल पीटते हैं . और बचे हुए हम आप जैसे लोग अपनी अंतरात्मा और संस्कार के फेरे में पढ़कर सत्यनिष्ठ हो पीड़ा झेलते हैं . अधिकतर लोग ऐसे ही हैं . पर हम कुछ बोलते नहीं . इच्छा होती है , परन्तु भ्रष्टाचारियों के भय से चुप रहते हैं .
इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि भ्रष्टाचार से मुक्ति ही क्यों ?
