* “स्वदेशी क्लाउड: तेज भी, सस्ता भी, सुरक्षित भी।”
DigitalIndia : भारत की डिजिटल यात्रा अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। संसद से लेकर सोशल मीडिया तक यह आरोप लगाया गया कि भारत सरकार अमेरिकी व्यापार समझौते के दबाव में 1.5 अरब नागरिकों का डेटा विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। लेकिन जब तथ्यों की परतें खुलती हैं, तो तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आती है। यह स्पष्ट होता है कि भारत न केवल अपने नागरिकों के डेटा की सुरक्षा कर रहा है, बल्कि डिजिटल संप्रभुता के क्षेत्र में एक मजबूत, आत्मनिर्भर मॉडल भी खड़ा कर रहा है।
भारत सरकार की प्रमुख डिजिटल पहल IndiaAI Mission का उद्देश्य देश में एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर, कंप्यूटिंग क्षमता और डेटा सुरक्षा को सुदृढ़ करना है। इसी दिशा में एक बड़ा कदम था भारत के मल्टीलिंगुअल एआई प्लेटफॉर्म Bhashini का विदेशी सर्वरों से भारतीय क्लाउड पर पूर्ण स्थानांतरण। यह सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं था, बल्कि डिजिटल संप्रभुता की दिशा में रणनीतिक क्रांति थी।
विदेशी सर्वरों से स्वदेशी क्लाउड तक
“भाषिणी” को अमेरिकी सर्वर ढांचे से हटाकर Yotta Infrastructure के हाइपरस्केल डेटा सेंटर में स्थानांतरित किया गया। योट्टा, हीरानंदानी समूह द्वारा संचालित भारत की अग्रणी डेटा सेंटर कंपनी है, जो क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा और डेटा स्टोरेज जैसी सेवाएँ प्रदान करती है।
इस माइग्रेशन के दौरान 200 टेराबाइट डेटा और 3.5 अरब फाइलें सुरक्षित रूप से भारत लाई गईं—बिना किसी डेटा लॉस के। यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत का क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर न केवल सक्षम है, बल्कि वैश्विक मानकों पर खरा उतरने में भी सक्षम है।
प्रदर्शन में छलांग, लागत में कटौती
डेटा माइग्रेशन के बाद एआई मॉडल्स की गति, प्रतिक्रिया समय और प्रोसेसिंग क्षमता में लगभग 40% सुधार दर्ज किया गया। वहीं लागत में 20-30% तक की कमी आई। यह इस बात का प्रमाण है कि स्वदेशी क्लाउड न केवल सुरक्षित है, बल्कि अधिक कुशल और किफायती भी है।
अब भारतीय नागरिकों का डेटा किसी विदेशी कानून—जैसे अमेरिकी CLOUD Act—के दायरे में नहीं आता। डेटा पूरी तरह भारतीय कानूनों और नियामकीय ढांचे के अधीन है। इसका अर्थ है कि डेटा एक्सेस, स्टोरेज और सुरक्षा पर अंतिम नियंत्रण भारत सरकार और भारतीय संस्थानों के पास है।
संस्थागत मजबूती
इस डिजिटल परिवर्तन को National Informatics Centre और Software Technology Parks of India जैसे संस्थानों का समर्थन मिल रहा है। ये संस्थान सरकारी ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म्स, स्टार्टअप्स और MSMEs को स्वदेशी क्लाउड समाधान प्रदान कर रहे हैं।
यह बदलाव “क्लाउड-एग्नॉस्टिक” और “ओपन-सोर्स” आर्किटेक्चर पर आधारित है। यानी भारत अब किसी एक विदेशी कंपनी पर निर्भर नहीं है। पहले जहां Microsoft, Google या IBM जैसी कंपनियों पर निर्भरता थी, अब भारत बहु-विकल्पीय मॉडल की ओर बढ़ चुका है।
वैश्विक संदर्भ में भारत का मॉडल
दुनिया भर में डेटा संप्रभुता को लेकर चिंता बढ़ रही है। यूरोप ने भी सॉवरेन क्लाउड निवेश में तेजी लाई है। फ्रांस जैसे देश स्थानीय डिजिटल टूल्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह संकेत है कि डिजिटल संप्रभुता केवल भारत की प्राथमिकता नहीं, बल्कि वैश्विक ट्रेंड बन चुकी है।
भारत का मॉडल इस संदर्भ में अनूठा है—क्योंकि यह न केवल डेटा लोकलाइजेशन पर आधारित है, बल्कि घरेलू क्लाउड उद्योग को भी बढ़ावा देता है। इससे रोजगार, निवेश और तकनीकी नवाचार को गति मिलती है।
भ्रम बनाम तथ्य
कुछ राजनीतिक नेताओं, जिनमें Rahul Gandhi शामिल हैं, ने आरोप लगाया कि अमेरिकी व्यापार समझौते से विदेशी कंपनियों को “मोनोपॉली” मिल जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत का क्लाउड ढांचा अब अधिक विकेंद्रीकृत और प्रतिस्पर्धी है।
डेटा बिक्री का कोई प्रमाण नहीं है। उल्टा, डेटा नियंत्रण और सुरक्षा को मजबूत करने के कदम उठाए गए हैं। संसद में उठे सवालों का जवाब तकनीकी और नीतिगत तथ्यों से दिया जा चुका है।
डिजिटल सुपरपावर की ओर
महाकुंभ 2025 जैसे विशाल आयोजनों में एआई आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट, भाषा अनुवाद और डेटा एनालिटिक्स के सफल उपयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत का डिजिटल ढांचा बड़े पैमाने पर काम करने में सक्षम है।
भारत अब केवल डिजिटल उपभोक्ता नहीं, बल्कि डिजिटल निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। स्वदेशी क्लाउड, एआई मिशन और डेटा लोकलाइजेशन मिलकर भारत को डिजिटल युग का नेतृत्वकर्ता बना रहे हैं।
भारत को क्या मिलेगा फायदा
भारत ने अपनी AI भाषा प्लेटफॉर्म को विदेशी सर्वर से हटा कर भारतीय कम्पनी Yotta Infrastructure पर शिफ्ट कर दिया है…ये फैसला Ministry of Electronics ने लिया है….
* इसका सीधा मतलब ये है कि…पहले डेटा विदेश मे रहता था…अब भारत के अंदर रहेगा…पहले विदेशी कम्पनी के सर्वर पर विदेशी कानून लागू होते थे…जबकि अब भारतीय कानून लागू होंगे.
* इससे डेटा सुरक्षित रहेगा…सरकार का नियंत्रण मजबूत होगा और देशी tech कम्पनियों को मौका मिलेगा.
* ये Google…Microsoft और Amazon वेब Service के लिए बुरी खबर है…क्यूंकि अगर देश अपने अपने डेटा खुद रखने लगे तो उन्हें सरकारी contracts मिलने बंद हो जाएंगे…जिसका सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ेगा.
* आगे चलकर अगर सरकार डेटा लोकलाईजेशन या विदेशी apps को भारतीय सर्वर पर डेटा रखने का कानून बनाती है तो इसका सीधा असर Whatsapp और Meta जैसी सोशल मीडिया app पर पड़ेगा.
……..ये भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की तरफ एक बड़ा कदम है….अभी पूरी मंजिल नहीं है….लेकिन मंजिल की तरफ एक मजबूत शुरुआत जरूर है.
