Dr. Harish Bhalla: हरीश भल्ला दिल्ली में मालवा की ख़ुशबू और धड़कन थे !

Bindash Bol

श्रवण गर्ग

Dr. Harish Bhalla: महानगर दिल्ली की निष्ठुर आत्मा में लगातार हलचल मचाए रखने वाली शानदार इंदौरी टीम से जुड़ी हुई एक और शख़्सियत साथ छोड़ गई ! दो साल होने आए डॉ वेदप्रताप वैदिक अचानक चले गए थे। हाल ही डॉ हरीश भल्ला भी चले गए। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के जाने के दुख पहले से ही साल रहे थे। दिल्ली की गुल्लक में बिना किसी ब्याज के जमा इंदौर के खरे सिक्के जैसे एक-एक करके नियति के जेब कतरेपन का शिकार हो रहे हैं।

डॉ भल्ला सिर्फ़ एक कुशल मनोचिकित्सक ही नहीं थे और भी बहुत कुछ थे। वे केंद्र की राजधानी में इंदौर-मालवा के स्वयं-नियुक्त सांस्कृतिक राजदूत थे। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से दिल्ली की यात्रा पर जाने वाली मालवी आत्माओं के लिए एक ठिकाना थे, आत्मीयता का ख़ज़ाना थे, मदद का सहारा थे।

साल 1971 में जब प्रभाष जोशीजी के साथ काम करने के लिए दिल्ली में राजघाट कॉलोनी स्थित गांधी स्मारक निधि को मैंने अपना ठिकाना बनाया तो सबसे नज़दीक उपलब्ध जिस दूसरे परिचित व्यक्ति का ख़याल आया वे डॉ हरीश भल्ला थे। डॉ भल्ला तब राजघाट कॉलोनी से सिर्फ़ पंद्रह मिनिट की पैदल दूरी पर स्थित पंत हॉस्पिटल में कार्यरत थे। डॉ वैदिक तब दूर सफ़दरजंग एंक्लेव में रहते थे।

डॉ भल्ला से जुड़ी यादों को 1971 से भी पीछे ले जाना हो तो इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में छवि मन में उभरती है जो कलरफुल शर्ट्स पहने हुए घूमता था और एक चर्चित छात्र नेता के तौर पर कॉलेज और ज़िला प्रशासन की नाक में दम किए रहता था। मेडिकल कॉलेज में हरीश भल्ला की तूती बोलती थी। कॉलेज का प्रिंस हॉस्टल जिसकी रियासत थी।

इंदौर के निकट रतलाम ज़िले के छोटे से शहर जावरा से निकलकर पहले इंदौर और फिर राजधानी में ‘दिल्ली के सांस्कृतिक ज़ार ’(Cultural Czar of Delhi) के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले डॉ भल्ला ने अपने घर का नाम ही ‘जावरा हाउस’ रखा हुआ था। ‘हुसैन टैकरी’ के लिए मशहूर जावरा ब्रिटिश भारत में जावरा रियासत की राजधानी था।

डॉ भल्ला से जुड़ा जावरा का एक अन्य परिचय यह है कि पंडित जवाहर नेहरू के निकटस्थ रहे कश्मीरी राजनेता और 1957 से 1962 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ कैलाशनाथ काटजू का जन्म भी जावरा में ही हुआ था। जावरा से लगा मंदसौर डॉ काटजू का चुनाव क्षेत्र था। डॉ काटजू के मुख्यमंत्रित्वकाल में पंडित नेहरू ने जावरा की यात्रा भी की थी। उस दौरान हुए एक कार्यक्रम में तब स्कूली छात्र हरीश भल्ला ने एक सराहनीय सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी थी। जावरा के कारण डॉ भल्ला काटजू परिवार के सभी सदस्यों के साथ अंत तक जुड़े रहे।सांसद विवेक तनखा के साथ तो वे कई संस्थाओं और गतिविधियों में संबद्ध थे।

दिल्ली में प्रसाद नगर स्थित डॉ भल्ला का छोटा सा फ्लैट मालवा के लोगों के लिए सराय था और लोदी रोड स्थित प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से मिलने पहुँचे लोगों से मिलने का ठिकाना। वे दिल्ली में मालवा की कला-संस्कृति और संगीत की धड़कन थे। मेडिकल, राजनीति और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़ा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं था जो डॉ भल्ला के संपर्क में नहीं आया हो।

संगीत के क्षेत्र में नाम कमाने वाली भारत और पाकिस्तान की ऐसी कोई हस्ती नहीं थी जिससे डॉ भल्ला के आत्मीय संबंध नहीं रहे हों। ग़ुलाम अली को मित्रों ने उनके घर की महफ़िलों में सुना है। चार दशक होने आए डॉ भल्ला के हवाले से लोक गायिका रेशमा के साथ मैंने ख़ुद इंदौर में एक लंबी बातचीत अपने अंग्रेज़ी अख़बार ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के लिए की थी।

शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका शुभ मुदगल तो डॉ भल्ला को बड़ा भाई मानती थीं और नवोदित कलाकारों को मंच और आवाज़ देने के लिए उनके साथ मिलकर ‘इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन’ की स्थापना की थी।

डॉ हरीश भल्ला और भी बहुत कुछ थे, बहुत कुछ करते थे, काफ़ी कुछ करना चाहते थे। सब कुछ दूसरों के लिए। अपने लिए न तो किसी सम्मान की माँग की और न किसी पुरस्कार के लिए संघर्ष किया। जीवन भर दूसरों के लिए ही सिफ़ारिशें करते रहे, लड़ते रहे। मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उनकी अदालती लड़ाई तो तब देश भर में चर्चा का विषय बन गई थी।

डॉ भल्ला मूलतः एक मनोचिकित्सक थे। इस नाते वे एक बड़ी संख्या में ऐसे मरीज़ों के संपर्क में आए जो दिल्ली की गलियों में चलने वाले नशे के अवैध व्यापार के शिकार हो रहे थे। ऐसे लोगों की व्यथा का अध्ययन कर उन्होंने नशामुक्ति के लिए काम किया। इस दिशामें उनका सबसे बड़ा योगदान दूरदर्शन के लिए ‘ अंधी गलियाँ ‘ नामक शृंखला की प्रस्तुति था जिसमें नशे के व्यापार और उससे पीड़ित लोगों की सच्ची कहानियों को उन्होंने देश के सामने उजागर किया।

डॉ भल्ला की कमी उन तमाम स्नेहियों को अब खलने वाली है जो राजधानी पहुँचते ही पहला फ़ोन उन्हें करके कहते थे : ‘भैया मैं दिल्ली पहुँच गया हूँ। मुलाक़ात कब और कहाँ हो सकती है ?’

शेर उर्दू का यह है कि शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक। डॉ भल्ला ऐसे परवाने थे जो ज़िंदगी की शाम होने तक अपने आपको हर रंग में जलाते रहे। डॉ भल्ला के बिना दिल्ली में इंदौर और मालवा की सांस्कृतिक ख़ुशबू की कल्पना नहीं की जा सकेगी।

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