- डॉ. रामविलास दास वेदांती: रामभक्त संत योद्धा
Dr Ramvilas Vedanti: डॉ. रामविलास दास वेदांती का नाम सुनते ही मन में अयोध्या की उस ऐतिहासिक लड़ाई की तस्वीर उभर आती है, जिसमें राम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए लाखों राम भक्तों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। वे राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख सूत्रधारों में से एक थे, जिन्होंने संत होने के साथ-साथ राजनीति के मैदान में भी राम की आवाज को बुलंद किया। आज, 15 दिसंबर 2025 को, जब उनका निधन हुआ, तो लगा जैसे राम मंदिर आंदोलन का एक जीवंत अध्याय समाप्त हो गया।
पिछले दिनों हिंदुओं की नई पीढ़ी के विषय में पढ़ रहा था, कैसे उन्हें अपने श्लोकों के अर्थ नहीं पता, पूजा पद्धति की सार्थकता के बारे में नहीं पता, धार्मिक पुस्तकों के विषय में नहीं पता अगर पता भी है तो अध्ययन शून्य है। उन्हें अपने संतों और अपनी परंपराओं का भी ज्ञान नहीं है इसीलिए किसी कम्युनिस्ट या अथॆिस्ट के द्वारा धार्मिक उपहास या तंज पर उसकी सहमति और स्वीकार्यता इन युवाओं में तुरंत हो जाती है।सबसे बड़ी बात ऊपर की 8-10 लाइन में जो कुछ लिखा है उस हिंदी को समझना भी आजकल के युवाओं के बस की बात नहीं। ऐसे में डॉ. रामविलास दास वेदांती जैसे महान संतों के विषय में उनका ज्ञान और रुचि मुझे लगता है बेहद कम होगी।
आज जब वह महान विभूति अब हमारे बीच नहीं रहे तो उनके महकते जीवन की सुगंधि प्रसारित करने का यह छोटा सा प्रयास हैं। आप का जन्म 7 अक्टूबर 1958 को मध्य प्रदेश के रीवा जिले के एक साधारण गांव में हुआ था। बचपन से ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने घर त्याग दिया और संत जीवन की ओर प्रवृत्त हुए। संस्कृत, वेदांत और धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। वे कुशल वक्ता थे, जिनकी रामकथा सुनने के लिए लाखों लोग उमड़ पड़ते थे। रामायण, महाभारत और पुराणों की व्याख्या वे इतनी सरलता से करते थे कि आमजन तक राम भक्ति की लहर पहुंच जाती थी।
राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है। 1980-90 के दशक में जब आंदोलन चरम पर था, तब वे इसके अग्रणी चेहरों में शुमार थे। परमहंस रामचंद्र दास, महंत अवैद्यनाथ जो वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु है जैसे संतों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा विध्वंस के मामले में वे मुख्य आरोपियों में शामिल थे। आंदोलन के दौरान वे 25 बार जेल गए, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उन्होंने संसद से सड़क तक राम मंदिर निर्माण की मांग को मजबूती से उठाया।
हालांकि, 2020 में लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 32 आरोपियों (जिनमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल थे) को बरी कर दिया, क्योंकि अदालत ने इसे पूर्व नियोजित साजिश नहीं माना।
राजनीति में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर वे 1996 और 1998 में लोकसभा सांसद चुने गए। पहले मछलीशहर और फिर प्रतापगढ़ सीट से जीते। सांसद के रूप में संसद से लेकर सड़क तक राम मंदिर निर्माण की मांग को बुलंद किया।वे विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख नेता थे और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य भी रहे। उनकी ओजस्वी वाणी और हिंदुत्व के प्रति समर्पण ने उन्हें बीजेपी और हिंदुत्व राजनीति का प्रमुख चेहरा बनाया।
आखिरी दिनों में भी वे राम भक्ति में डूबे रहे। मध्य प्रदेश के रीवा में रामकथा सुना रहे थे कि अचानक तबीयत बिगड़ गई। सीने में दर्द और हार्ट अटैक के बाद अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उम्र मात्र 67 वर्ष थी। उनका पार्थिव शरीर अयोध्या लाया गया, जहां राम भक्तों ने अंतिम दर्शन किए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके निधन को सनातन संस्कृति की अपूरणीय क्षति बताया।
डॉ. वेदांती का जीवन त्याग, संघर्ष और राम भक्ति का प्रतीक था। उन्होंने दिखाया कि संत जीवन और राजनीति एक साथ चल सकती है, यदि उद्देश्य धर्म और राष्ट्र की सेवा हो। राम मंदिर आज भव्य रूप में खड़ा है, उसकी नींव में उनका योगदान अंकित है। उनकी स्मृति हमें प्रेरित करती रहेगी कि राम के लिए लड़ना ही जीवन का सार्थकता है। उनकी यह जीवन यात्रा राम से निकल आज राम में ही समा गई है, उनकी आत्मा को श्री राम चरणों में स्थान मिले, यही प्रार्थना है।
