DRDO : अब भारत की आंख से नहीं बच पाएगा दुश्मन, DRDO का मल्टीस्टेटिक रडार, स्टेल्थ की पोल खोलने आया!

Bindash Bol

DRDO : अब दुनिया का कोई भी एयरक्राफ्ट, मिसाइल, युद्धपोत या ड्रोन भारतीय सेनाओं की निगाहों से बच नहीं सकता। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने एक अत्याधुनिक मल्टीस्टेटिक रडार सिस्टम विकसित किया है, जो ऐसे लक्ष्यों को तुरंत पहचानकर इंटीग्रेटेड डिफेंस प्रणाली को सभी आवश्यक कोऑर्डिनेट्स उपलब्ध कराता है। यह तकनीक पारंपरिक मोनोस्टेटिक रडार की सीमाओं को पार करते हुए भारत की वायु रक्षा क्षमताओं को नई ऊँचाइयों तक ले जाती है।

पहले समझिए कि स्टेल्थ तकनीक से लैस प्लेटफॉर्मस् आखिर कैसे बच पाते हैं रडार की निगाहों से?

स्टेल्थ एयरक्राफ्ट, ड्रोन और मिसाइलें अपने रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) को कम करने के लिए रडार अवशोषक मैटेरियल (RAM), विशेष ज्योमेट्रिकल डिजाइन और इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स का उपयोग करते हैं।

ये प्लेटफॉर्म्स रडार ट्रांसमीटर द्वारा भेजी गई तरंगों को अलग-अलग दिशाओं में मोड़ देते हैं, जिससे वे उस दिशा में वापस ही नहीं जातीं जहाँ से मोनोस्टेटिक रडार उन्हें भेज रहा होता है। इस तरह वे दुश्मन के क्षेत्र में अदृश्य रहकर सटीक हमला कर सकते हैं।

अब समझते हैं कि मल्टीस्टेटिक रडार और मोनोस्टेटिक रडार का मतलब क्या है और यह कैसे काम करते हैं।

मोनोस्टेटिक रडार वो होते हैं जिनमें एक एक ट्रांसमीटर और रिसीवर ही होते हैं ( standby के अतिरिक्त) और रडार भी एक ही स्थान पर स्थापित होता है।

जबकि मल्टीस्टेटिक रडार सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अनेक ट्रांसमीटर और रिसीवर होते हैं जो एक ही स्थान पर न होकर अलग-अलग जगहों, ऊँचाइयों और दूरियों पर स्थापित होते हैं जिनसे विभिन्न कोणों से प्राप्त सिग्नल्स का विश्लेषण एकीकृत डाटा प्रोसेसिंग सिस्टम द्वारा किया जाता है, जिससे लक्ष्य की स्थिति, गति और दिशा का बेहद सटीक पता चलता है।

कोई स्टेल्थ जेट माना कि बहुचर्चित F-35, जैसे ही डिटेक्शन रेंज में आयेगा, तो अलग अलग स्थानों पर लगे ट्रांसमीटर से हो रही तरंगों की बौछार की जद में होगा, तो F35 भी अपने बचाव के लिये सारे सिग्नलों को अलग अलग दिशाओं में मोड़ेगा, बस तभी वो चक्रव्यूह में फंसा।

क्यूंकि उसके अलग अलग दिशा में भेजी गई तरंगों को पकड़ने के लिए कई सारे रिसीवर जो अलग अलग दूरी, दिशा और ऊंचाइयों पर घात लगाये इंतजार में बैठे होते हैं, कई कोणों से मोड़ी गयी तरंगों को पकड़ कर पलक झपकते ही एकीकृत डाटा प्रोसेसिंग सिस्टम के माध्यम से अपने निशानचियों को F35 को मार गिराने का हुक्म देता है।

DRDO का आधुनिक मल्टीस्टेटिक रडार सिस्टम न केवल स्टेल्थ तकनीक की चुनौतियों का समाधान करेगा, बल्कि भविष्य के युद्धक्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप जल, थल और नभ में सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है।

इसकी अनुमानित डिटेक्शन रेंज 1000 से 6000 किलोमीटर या उससे भी अधिक हो सकती है हालांकि डीआरडीओ ने अभी इसका खुलासा नहीं किया है।

यह प्रणाली भारत की वायु सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती देगी और किसी भी स्टेल्थ प्लेटफॉर्म के लिए भारतीय सीमा में घुसपैठ करना लगभग असंभव बना देगी।

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