Election Commission : वोटर सूची सुधार का विरोध क्यों?

Bindash Bol

Election Commission : भारत में लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव है- स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव प्रणाली। इस नींव की रक्षा का दायित्व हमारे संविधान ने चुनाव आयोग को सौंपा है। संविधान का अनुच्छेद 324 आयोग को यह अधिकार देता है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोजित करे तथा प्रक्रिया को समय-समय पर सुधार सके।

इसी आधार पर 1951 में बना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA, 1951), जो यह सुनिश्चित करता है कि कौन भारतीय नागरिक मतदाता बनेगा और किसका वोट वैध माना जाएगा। यह अधिनियम उस दौर में बना था, जब न तो मोदी जी और न ही अमित शाह जी का जन्म हुआ था। यानी यह पूरा कानूनी ढांचा कांग्रेस सरकारों के समय तैयार हुआ और उसी के अनुसार आज भी चुनाव आयोग कार्य कर रहा है।

अब यदि आयोग समय-समय पर वोटर सूची का पुनरीक्षण करता है तो यह न केवल उसका अधिकार है बल्कि संवैधानिक कर्तव्य भी है। यदि किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटता है तो उसे नोटिस दिया जाता है, अपील का अवसर मिलता है और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226 के तहत) तक जाने का रास्ता खुला है। यानी कानूनी और न्यायिक उपाय पूरी तरह उपलब्ध हैं।

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब सारी संवैधानिक प्रक्रिया मौजूद है, तो फिर वोटर लिस्ट की जाँच और सुधार का विरोध क्यों हो रहा है?

सच यही है कि जब भी चुनाव आयोग वोटर सूची को सुधारने का प्रयास करता है, तब कुछ राजनीतिक दल झूठा भय खड़ा कर जनता को भ्रमित करने लगते हैं। दरअसल, सुधार का विरोध वहीं से आता है, जहाँ फर्जी या दोहरे वोटरों का लाभ उठाने की मानसिकता मौजूद होती है। आज राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व का विरोध इसी प्रवृत्ति का परिचायक है।
स्वयं सर्वोच्च न्यायालय इस मामले देख रहा है और आयोग को सूची को अद्यतन करते समय वृहत प्रक्रिया अपनाने हेतु आवश्यक दिशा निर्देश दे रहा है
लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब उसकी जड़ें स्वच्छ हों। और वोटर सूची का शुद्धिकरण लोकतंत्र की सबसे आवश्यक जड़ है। इसीलिए आज हर नागरिक का यह दायित्व है कि वह आयोग के इस कार्य में सहयोग करे और सुधार का स्वागत करे।

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