Geopolitics : ​साइलेंट स्ट्राइक: जब दुनिया ‘हॉर्मुज़’ में उलझी थी, भारत अपना रास्ता बना चुका था!

Siddarth Saurabh

Geopolitics : ​रणनीति ऐसी कि शोर न हो, पर काम पूरा हो जाए…

Geopolitics : ईरान के साथ चल रहे भीषण युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कूटनीतिक बयान दिया है। ट्रंप ने दुनिया के अन्य देशों से ‘होर्मुज’ (Strait of Hormuz) की सुरक्षा के लिए सैन्य और रणनीतिक मदद मांगी है। उन्होंने विशेष रूप से उन देशों को आगे आने को कहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस समुद्री रास्ते पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं। ट्रंप ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि अमेरिका अकेले इस अहम समुद्री जलमार्ग की सुरक्षा का जिम्मा नहीं उठाएगा। उन्होंने कहा कि “हम उन अन्य देशों को दृढ़तापूर्वक प्रोत्साहित करते हैं जिनकी अर्थव्यवस्थाएं होर्मुज जलडमरूमध्य पर हमारी तुलना में कहीं अधिक निर्भर करती हैं…। हम चाहते हैं कि वे आगे आएं और होर्मुज जलडमरूमध्य के मामले में हमारी मदद करें।

​1. सोशल मीडिया का भ्रम बनाम ज़मीनी हकीकत

​अक्सर डिजिटल गलियारों में यह शोर मचता है कि भारत को इस पक्ष या उस पक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए। लेकिन कूटनीति भावनाओं से नहीं, राष्ट्रीय हितों (National Interests) से चलती है। ट्विटर पर चल रहे “ग्लोबल एक्सपर्ट्स” के दावों के विपरीत, भारत ने युद्ध की आग में कूदने के बजाय अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

​2. हॉर्मुज़ का संकट और ‘शिप-टू-शिप’ कूटनीति

​जब हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ा और बीमा कंपनियों (Insurance Companies) ने हाथ खींच लिए, तब 250 मिलियन के जहाजों का रुकना लाज़मी था। भारत ने यहाँ कोई सैन्य गठबंधन नहीं बनाया, बल्कि व्यावहारिक कूटनीति का सहारा लिया…

​ईरान से सीधा संवाद: कोई ‘ब्लैंकेट पैसेज’ नहीं, बल्कि विशिष्ट तालमेल।

​नेवी की निगरानी: भारतीय नौसेना का अदृश्य सुरक्षा कवच।

​व्यापारिक प्राथमिकता: युद्ध की राजनीति को व्यापार और ऊर्जा की ज़रूरतों से अलग रखा।

असली समस्या क्या थी?

Hormuz में जहाज इसलिए नहीं रुके थे क्योंकि हर जहाज पर हमला हो रहा था। असल डर insurance और जोखिम का था। 250 मिलियन डॉलर के जहाज को लेकर कोई कप्तान ड्रोन और मिसाइल के बीच से गुजरने की हिम्मत नहीं करता। और बीमा कंपनियाँ भी ऐसे खतरे को कवर नहीं करना चाहतीं।
यहीं भारत ने दो चीज़ों का इस्तेमाल किया —
कूटनीतिक बातचीत + भारतीय नौसेना की मॉनिटरिंग।
ईरान भी जानता है कि भारत इस युद्ध का हिस्सा नहीं है।
और यह भी सच है कि इस इलाके में Indian Navy की मौजूदगी को कोई हल्के में नहीं लेता।

3. परिणाम: जब गैस पाइपलाइन तक पहुँची

​दुनिया टीवी पर मिसाइलों के फुटेज देख रही थी और भारत के दो विशाल टैंकर, शिवालिक और नंदा देवी, 92,700 टन LPG लेकर मुंद्रा पोर्ट पर लंगर डाल चुके थे। यह भारत की उस सप्लाई चेन की जीत है जिसे दुनिया ‘फंसा हुआ’ मान रही थी।

​प्रमुख बिंदु: भारत ने क्या सही किया?

चुनौती        भारत का समाधान

1.बीमा(Insurance) का डर
           नौसेना की मॉनिटरिंग और सुरक्षा का भरोसा।

2.ईरानके साथ तनाव

कूनीतिक ‘Bridge-building’ – यह साबित करना कि हम युद्ध का हिस्सा नहीं हैं।

3. सप्लाई चेन का टूटना

शोर-शराबे के बिना चुपचाप जहाजों को क्लियरेंस दिलाना।

‘Quiet Strength’ की जीत

​भारत की विदेश नीति अब केवल बयानों तक सीमित नहीं है। यह ‘Realpolitik’ का दौर है। हमने साबित कर दिया कि हम किसी गुट का हिस्सा बने बिना अपनी शर्तें मनवाना जानते हैं। यह उन लोगों के लिए जवाब है जो कहते हैं कि भारत कुछ नहीं कर रहा— भारत वह कर रहा है जो एक उभरती हुई महाशक्ति को करना चाहिए: अपने लोगों के चूल्हे जलते रहना सुनिश्चित करना।

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