Greenland : भविष्य की संसाधन-राजनीति और भूगोल की कहानी….

Bindash Bol

Greenland : ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक बयान की परतें खोलें तो साफ़ होता है कि मामला आज का नहीं, बल्कि कल का है। जहाज़ों और पनडुब्बियों से ज़्यादा, यह भविष्य की संसाधन-राजनीति और भूगोल की कहानी है।

ग्रीनलैंड पर न तो चीनी युद्धपोत तैनात हैं, न रूसी बेड़े की भीड़। चीन की सैन्य मौजूदगी यहां लगभग शून्य है, और रूस की गतिविधियां भी मुख्यतः अपने ही उत्तरी तटों तक सीमित हैं।

तो फिर वॉशिंगटन बेचैन क्यों है?

जवाब जहाज़ों में नहीं, ज़मीन के नीचे है

ग्रीनलैंड के पास दुनिया के सबसे अहम खनिज भंडारों में से कुछ हैं। दुर्लभ खनिज, ग्रेफाइट, लिथियम, यूरेनियम—यानी इलेक्ट्रिक वाहनों, मिसाइल प्रणालियों और हाई-टेक उद्योगों की रीढ़। चीन इन खनिजों के वैश्विक उत्पादन में पहले से हावी है। अमेरिका नहीं चाहता कि भविष्य की सप्लाई-चेन पर भी बीजिंग की पकड़ और मज़बूत हो।

यही वजह है कि जब-जब चीनी कंपनियों ने हवाईअड्डों, बंद पड़े नौसैनिक अड्डों या खनन परियोजनाओं में कदम रखने की कोशिश की, डेनमार्क और अमेरिका ने मिलकर रास्ता रोका। कई सौदे रद्द हुए, कुछ परियोजनाएं पर्यावरणीय कारणों से ठप पड़ीं, और हालिया खनन अधिकार अमेरिकी कंपनियों तक पहुंचे।

ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच रणनीतिक ढाल है। यहीं स्थित पिटुफ़िक स्पेस बेस अमेरिकी मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी के लिए अहम है। जलवायु परिवर्तन के साथ जैसे-जैसे बर्फ़ पिघल रही है, वैसे-वैसे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। भविष्य में यही मार्ग एशिया-यूरोप व्यापार को छोटा कर सकते हैं।

यहीं से अमेरिका की सोच समझ आती है। वह ग्रीनलैंड को डेनमार्क का इलाक़ा भर नहीं, बल्कि उत्तरी अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा-ढाल मानता है। इसलिए वह यहां रडार, निगरानी और सैन्य ढांचे को बढ़ाना चाहता है—ख़ासकर रूसी पनडुब्बियों की आवाजाही पर नज़र रखने के लिए।

बीजिंग खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ कहता है और 2030 तक पोलर पावर बनने की बात करता है। उसका आर्कटिक दांव ज़्यादातर रूस के रास्ते है—उत्तरी समुद्री मार्ग, संयुक्त गश्त, और ऊर्जा परियोजनाएं। ग्रीनलैंड इस नेटवर्क का हिस्सा नहीं है, लेकिन वॉशिंगटन का डर यह है कि अगर समय रहते सीमाएं तय नहीं की गईं, तो कल को आर्थिक मौजूदगी रणनीतिक असर में बदल सकती है।

तो ट्रंप क्या कर रहे हैं?

ट्रंप की भाषा तेज़ है, दावे बड़े हैं। वह संभावनाओं को ख़तरे की तरह पेश करते हैं। इससे घरेलू राजनीति भी साधी जाती है और सहयोगियों पर दबाव भी बनता है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर लंबे समय से सजग रहा है।

ग्रीनलैंड न तो बिकाऊ है, न किसी की जागीर। वहां की स्थानीय सरकार और डेनमार्क साफ़ कर चुके हैं कि भविष्य का फ़ैसला ग्रीनलैंड के लोग करेंगे। ट्रंप ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, लेकिन चिंता पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं। असली जंग इस बात की है कि आर्कटिक खुलने से पहले नियम कौन लिखेगा—खनिजों के, मार्गों के और प्रभाव के। ग्रीनलैंड उस भविष्य का केंद्रीय पन्ना है, और इसी वजह से उस पर नज़रें टिकी हैं।

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