डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
वे स्वयं को साहित्याचार्य कहलवाते . अपने फ्लैट में नाम पट्टिका लगवा ली है . श्वेत पट्टिका पर लाल रंग से बड़े अक्षरों में साहित्याचार्य लिखवाया है और बहुत छोटे अक्षरों में लिखा है डॉ अ क चिंतित . वे amukeनिजी महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक बताए जाते हैं . किसी ने उस महाविद्यालय को नहीं देखा . किसी ने बताया कि इनके सारे शैक्षणिक प्रमाण पत्र जुगाड़ू हैं . वे कवि सम्मेलनों में अपनी उपस्थिति देते थे और उपस्थिति देने का जुगाड़ लगाना ही उनका मुख्य कार्य था . जिससे मिलते , कहते – बस हिंदी के लिए जी रहे हैं . मौत भी आए , डेड भी हों तो हिंदी के लिए . फिर कहते एक कवि सम्मेलन तो कराएं . वे मुशायरे तक में जाने में गर्व करते .
वे मुहल्ले से गुजरते तो मुहल्ले की स्त्रियाँ उनको दूर से देखकर अपनी सहेलियों से ठिठोली करते कहतीं – एक कवि सम्मेलन तो कराइए . ही – ही – ही – ही . कुछ दिनों बाद एक धनाढ्य गल्ला व्यापारी चल बसे . उनकी अंत्येष्टि में साहित्याचार्य बड़े भाव – विभोर होकर शोक व्यक्त करने लगे . सभी चौंक गए . लौटते समय व्यापारी के ज्येष्ठ पुत्र के साथ सटकर चलने लगे और चलते – चलते उनके दिवंगत पिता की प्रशंसा में उनके इतने गुण बताने लगे कि वह ज्येष्ठ पुत्र भी हक्काबक्का रह गए . फिर अंत में बोले – सेठ जी को हिंदी से बड़ा प्रेम था . श्राद्ध के दिन एक कविसम्मेलन भी करा लीजिए , उनकी आत्मा को शान्ति मिलेगी . वे ज्येष्ठ पुत्र भड़क गए . तब बड़ी कठिनाई से बचते – बचाते साहित्यकार जी ने उनका पीछा छोड़ा .
सितंबर माह के दूसरा पखवारा आने को हुआ नहीं कि वे अपने अपार्टमेंट के नीचे सड़क के एक किनारे पर मुख्य द्वार के बाहर एक झोपडी बनवाकर एक स्टूल लगाकर बैठ गए . सामने एक चूल्हे पर तेल से भरी कड़ाही चढ़ी थी . वे उसमें एक बड़ा छनौटा चला रहे थे . चूल्हे की आँच से तेल खौल रहा था . पास एक कठौती में बेसन , नमक , हल्दी , मिर्च से सना एक घोल तैयार था . लोग आकर पूछने लगे – साहित्याचार्य जी , यह क्या चल रहा है ? वे मुस्कुराए और बोले – हिंदी पखवारा आ रहा है . बस इस बेसन के घोल में हिंदी के पकौड़े तलने की तैयारी चल रही है . यू विल नॉट अंडरस्टैंड . हिंदी के तरोताज़ा पकौड़े को हम अंग्रेजी और उर्दू के तेल में हफ्ते भर तलेंगे . बस बेसन के घोल में चुटकुलों को मिलाना बाकी है . आई ऍम सर्चिंग द सेम ऑन नेट . हुज़ूर , जैसे ही चटकीला चुटकुला मिलता है , मैं फौरन उसे इसी बेसन के घोल में डालकर तल देता हूँ . ये पकौड़े कुरकुरे और चटपटे होते हैं . छानकर बाहर निकाला नहीं कि फौरन बिक जाते हैं . खरीदने वाला लिफाफे में पैसा दे जाता है . पूरा मुहल्ला आश्चर्यचकित रह गया . डॉ विद्रोही से रहा नहीं गया . उन्होंने पूछ लिया – ये पकौड़े लेने कौन आता है ? साहित्याचार्य जी ठठाकर हँसने लगे . बोले – सरकारी कार्यालयों , सरकारी उपक्रमों , बैंकों आदि के ग्राहक आते हैं . हमारे जैसे पाँच – छः हिंदी के पकौड़े तलने वालों को ले जाते हैं . हम लोग मंचों पर अपना – अपना चूल्हा लगाकर लोगों को लुभाने वाले बेसन में चुटकुले के पकौड़े अंग्रेजी और उर्दू के तेल में तलकर गर्मागर्म पकौड़े परस देते हैं . लिफ़ाफ़े लेकर लौट आते हैं . हू केयर्स अबाउट ब्लडी हिंदी . मनोरंजन होना चाहिए , बस यही देखना होता है .
सुना जाता है कि साहित्याचार्य जी के पकौड़ों की दुकान चल निकली है . डॉ विद्यार्थी कहते फिर रहे हैं – हाय ! हमारे छंद , गीत , नवगीत सब विलुप्त होने लगे . आज की पीढ़ी हिंदी पढ़ती , समझती और इसमें रूचि लेती ही कहाँ है . हिंदी दिवस पर कवि सम्मेलनों में अब हिंदी के चुटकुलों के पकौड़े तले जा रहे हैं !
