Hindi Sahitya : भागी हुई लड़कियां, स्त्री संताप का बढ़िया प्रहसन

Bindash Bol

उमानाथ लाल दास
Hindi Sahitya : साहित्यिक पत्रिका “वाचन” के जुलाई-दिसंबर अंक की साफ्ट कापी सवा एक बजे दोपहर बरास्ते कवि-शायर अनवर शमीम हासिल हुई। तत्काल स्क्राल किया तो इसमें चंद्रबिंद का आकलन ‘निरंकुश पुरुष सत्ता के खिलाफ निंदा प्रस्ताव है ‘भागी हुई लड़कियां” देखा।‌ यह पड़ताल या समीक्षा कम और कृष्ण सम्मिद्ध की कहीं छपी समीक्षा का खंडन अधिक है। दरअसल सम्मिद्ध की स्थापना थी कि आलोक धन्वा को जेंडर की पहचान और संबंधों की गहरी समझ नहीं है। इसीलिए यह कविता राजनीतिक और यथार्थवादी दृष्टि से समस्याग्रस्त हो जाती है। परिणामस्वरूप यह कविता स्त्री विरोधी हो जाती है। और चंद्रबिंद को यह स्थापना नागवार गुजरी। इसीलिए इस समीक्षा या खंडन का पूरा असबाब और रकबा अतिक्रमण से अर्जित और चौहद्दी इसी की असहमति पर खड़ी हुई है। इस कविता पर मंगलेश डबराल की टिप्पणी से बढ़िया किसी ने नहीं लिखा। और वह टिप्पणी भी आलोक की रूपकों की श्रृंखला और आग उगलती कविता की रिटारिक से बिद्ध (मोहाविष्ट) थी। इस कविता के बाद की तीन घटनाएं या प्रसंग हैं, जिनपर जेंडर को लेकर इनकी समझ और संबंधों की पहचान को समझा जा सकता है। वर्ष 2007 में सिंगूर में लगा टाटा का कारखाना ममता के विद्रोही आंदोलन के कारण उखाड़ना पड़ा। प बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के रणचंडी रूप के सामने बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में सीपीएम सरकार लाचार हो गयी थी। अपने उपन्यास लज्जा के कारण 1994 में बांग्लादेश से देश निकाला के बाद यहां वहां भटकते हुए जब 2007 में कोलकाता में शरण लेनी चाही तो वहां के मुल्लों-मौलानाओं ने सरकार को खुलेआम अल्टीमेटम दे दिया कि सरकार यदि ममता को शरण देती है तो अल्पसंख्यक अपना समर्थन वापस ले लेंगे। तसलीमा को प्रवेश नहीं दिया गया बंगाल में, पर ममता को भी यह कट्टर ताकतें नहीं रोक सकीं। सिंगूर-नंदीग्राम के वाकये या दर-दर भटकतीं तसलीमा के लिए बंगाल का दरवाजा बंद होने पर देश के प्रगतिशील विचारक, बौद्धिक तबका की प्रज्ञा को लकवा मार गया था। आग उगलती कविता का सोता सूख गया था तब। फिर 2011 के आसपास पत्नी असीमा भट्ट का प्रसंग सबकुछ चीख-चीख कर कह रहा था, पर वह असहाय छोड़ दी गयी। अभी कल्पित प्रसंग पटना में हुआ। उस पर वह चुप हैं और नागार्जुन वाले मीटू प्रसंग का रोना रोकर वह एक साथ सारा दाग-धब्बा धो लेना चाहते हैं। चंद्रबिंद जी के सामने भी सबकुछ है। क्या यह जेंडर की उनकी समझ और संबंधों की पहचान पर सवाल नहीं है।

दरअसल आलोक धन्वा की कविता व्यापक देश-काल के बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल और राजनीतिक यथार्थ को समेटने (16वीं सदी के इतालवी गणितज्ञ वैज्ञानिक जियोर्दानो ब्रूनो व बिहार का नरसंहार को समेटती संश्लिष्ट कविता “ब्रूनो की बेटियां” तथा सातवें दशक की नक्सलबाड़ी से प्रेरित गोली दागो पोस्टर) के लिए जानी जाती है। समय-समाज के बड़े सवालों और संकटों से जूझती कविता पाठक को भी अपने संग मथती-हिलकोरती चलती है। ऐसे में जब कवि की कविता पर बात हो और विशेषकर उसके मानस और समझ पर तो कवि के व्यक्ति के पट भड़भड़ाने ही पड़ेंगे। इसीलिए कवि और उसकी रचनाशीलता की डिकोडिंग के लिए यहां कुछ प्रसंगों में जाना अवांतर नहीं होगा।

दरअसल हिंदी एक बहुत बड़े आपराधिक षड्यंत्र की शिकार रही है, जिसके कारण वह तुष्टीकरण के साथ सहज सहवास में रहना सीख गयी है। तुष्टीकरण की वैधता की जमीन पहली शर्त है रचना पर विचार की ,,, इन अर्थों में सारा का सारा हिंदी साहित्य जो प्रगतिवाद को वरेण्य मानते हुए प्रौढ़ हुआ, मेरी निगाह में घनघोर सांप्रदायिक है। इसीलिए भारतीय जनमानस के साथ अन्याय भी है यह।‌ साहित्य के इस ढेर की कविता/कहानी में आक्रांताओं को लेकर अजब सम्मोहन है। चर्च/मस्जिद, आमीन/बिस्मिल्लाह रहमानो रहीम इनके प्रतीकों का बड़ा ही आदर है। सेकुलर ढांचा के प्राणतत्व बना दिये गये हैं। इनकी टोपी, दाढ़ी, इनकी पोशाक ने अलग ही रंग जमा लिया है। इसके उलट टीका, तिलक, शिखा, जटा, रुद्राक्ष, जयराम जी की, जय श्रीराम को दोयम बनाते हुए, सांप्रदायिक छवि बनाते हुए इस समाज में सचेष्ट भाव (इरादतन) अकारण एक अपराध व ग्लानि भाव से भर दिया गया है। समीक्षा-आलोचना भी कुछ इसी ढंग से विकसित हुई है। इस साहित्य को 26 साल तक सुनवाई का इंतजार करती गैंगरेप की शिकार भंवरी देवी की बजाए बाबरी मस्जिद के साथ खड़े होकर आक्रांता समझ को तुष्ट करने में अपना हित (राजनीतिक) हित दिखता है। यह तबका मोपला के उपद्रव के बजाए खिलाफत में ऊंघना श्रेयस्कर समझता है। क्रोनोलाजिकली दोनों एक ही टाइमफ्रेम से संबद्ध है। ऐसे में भागकर आई हुई लड़की को दर-दर की ठोकरें खाने को बेघर करता कवि यदि पुरुष सत्ता के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लिखता हुआ दिखता है तो क्या कहा जाए ,,, इस तबके को देश भर में स्टीफन स्वाइग की कहानी “एक अनाम औरत का खत” का मंचन करतीं अभिनेत्री असीमा की असहायता नहीं दिखती और “जहां लक्ष्मी कैद है” के कथाकार राजेंद्र यादव के लिए मन्नू भंडारी की अपनी आत्मकथा में प्रयुक्त “छलात्कारी” शब्द का मर्म अनुद्घाटित ही रहता है। इन प्रकरणों के बाद तो “भागी हुई लड़कियां” और “जहां लक्ष्मी कैद है” सदी का सबसे बड़ा साहित्यिक प्रहसन लगता है। निजता की इतनी अनदेखी न हो कि रचना के सूत्र अपनी जड़ों की बजाए हवा में लहराते दिखें। किसी भी रचनाकार के व्यक्ति की इतनी घोर अनदेखी न करें कि रचनात्मक संघर्ष बेमानी हो उठें और कला/सृजन के क्षण का कोई सूत्र ही हाथ न आएं।

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