नीरज कृष्णा
Holi : होली रंगों का त्योहार है—खुशियों, उमंग, और उल्लास का प्रतीक। लेकिन क्या हो अगर किसी के हिस्से में ये रंग ही न आए? क्या हो अगर होली बीत जाए, लेकिन मन का कोना सूना रह जाए? जब आपके हिस्से में रंग तो होते हैं, पर उसे लगाने वाले हाथ निष्क्रिय। जब सब ओर होली की मस्ती हो, पर किसी के लिए यह दिन एक सामान्य दिन जैसा बीत जाता हो।
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, यह दिलों को जोड़ने का एक जरिया भी है। लेकिन जब रिश्तों में दूरियां आ जाती हैं, तो रंग फीके पड़ने लगते हैं। कामकाज, व्यस्तता, अहंकार या गलतफहमियों के कारण कई बार करीबी रिश्ते भी होली के रंगों से महरूम रह जाते हैं।
हर व्यक्ति के जीवन में भी कोई न कोई रंग भरता है—कभी माता-पिता, कभी गुरु, कभी कोई प्रियजन। वे हमारे जीवन को एक नई दिशा देते हैं, लेकिन अक्सर हम उस रंगरेज की भूमिका को भूल जाते हैं। रंगरेज का अर्थ केवल कपड़ों को रंगने वाले व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस क्षण से भी लिया जा सकता है जो हमारे जीवन को विभिन्न अनुभवों के रंगों से रंगता है। संत कबीर की कविता में भी “रंगरेज” का उल्लेख मिलता है, जहां वे ईश्वर को रंगरेज की उपमा देते हैं।
जब रंग पानी से मिलता है, तो एक ऐसी जादुई दुनिया बनती है, जहाँ न जाति का भेद रहता है, न धर्म की दीवारें, न उम्र की कोई सीमा। हर चेहरा एक जैसा दिखता है—खुशियों से सराबोर, प्रेम से भरा हुआ। रंग और पानी के इश्क़ को ही लोग होली कहा करते हैं।
रंग जब पानी से मिलता है, तो दोनों का वजूद एक हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे प्रेम में दो आत्माएँ एक-दूसरे में घुल-मिल जाती हैं। सूखा रंग हो या गीला, जब पानी का स्पर्श होता है, तो वह खिल उठता है, चमकने लगता है, जैसे किसी प्रेमी को अपने प्रिय का साथ मिल गया हो। यही होली का असली जादू है—दो अलग-अलग तत्वों का प्रेम में मिल जाना। रंग तो हमारे जीवन में सुबह से लेकर रात ढलने तक साथ ही चलते हैं।
संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ परिवर्तनीय है। जैसे कुदरत अपनी ऋतुएँ बदलती रहती हैं और हर ऋतु में उसका अपना एक नया रंग एक नया स्वरूप छुपा होता है। उसी प्रकार हमारे भी जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं, कभी हम समस्याओं से घिर जाते हैं कभी हर तरफ से खुशियाँ उमड़ आती हैं, पर इनमें से कुछ भी स्थायी नहीं है, जो आज श्रेष्ठ है वह कल निम्न होगा। यही परिवर्तन संसार में एकमात्र स्थायी नियम है।
वक्त कैसा भी हो बीत ही जाता है, अगर हम उसमें स्वयं का संधारण कर सकें। हमें प्रत्येक परिस्थिति में संयमित रहना चाहिए, चाहे वह सुख अर्थात उजाला हो या फिर दुख अर्थात अंधेरा। सुख का गुमान न करें, और दुख का विलाप न करें। बस ये समझें जो भी समय है वह एक दिन बीत ही जाएगा।
दिन और रात का होना हमें जीवन के अँधियारों और उजालों की सीख देती है। जैसे हर रात के बाद सवेरा है, वैसे ही हर दुख के बाद सुख है। हमें याद रखना चाहिए, जो वक्त चल रहा है जो रंग आज चढ़ा हुआ है, वो वक्त गुजरेगा और वो रंग भी उतरेगा।