Holi : फागुन बाहर और भीतर

Niranjan Srivastava

Holi : उछाह और उल्लास का महीना कहा जाने वाला फागुन आधुनिकता की दौड़ में न जाने कहाँ गुम हो गया। शहर में तो उसकी आहट तक सुनाई नहीं देती। एक समय था कि फागुन के आते ही वसन्त की हल्दी-अभिषिक्त पाती गाँव-गाँव घूम जाती थी। वह चोवाचन्दन लगाकर पुष्प-मुकुट पहन कर आता था। फागुन में वसन्त का उल्लास खेत-खलिहान, बाग-बागीचे, राह-डगर सब जगह दिखाई देता था। प्रकृति सहस्र-सहस्र भंगिमाओं के साथ क्रीड़ा करने लगती थो। क्षितिज तक फैले फूली हुई सरसों के खेत,उसके किनारे-किनारे तीसी के बैंगनी रंग के फूल, गदराई मंजरियों से बौराये हुए आम्र-वृक्ष, अमराई में
भौंरों के गीत और कोयल की तान, सिर पर नव पल्लवों का मुकुट बांधे द्रुम दल, दहकते पलाश, राह-डगर के किनारे अचानक जी उठी हरी घास, पीले और बैंगनी रंग के अनामामा कुसुम, दहकते पलाश, भिनसारे झड़ते महुए के मादक फूल! लगता था वसन्त सर्वत्र उत्तान श्रृंगार का अनुपम श्रव्य और दृश्यकाव्य रच रहा है।
फागुन बाहर का ही नहीं मनःस्थिति का भी नाम है। मैं अपनी बात कहूँ। जीवन के पूर्वार्द्ध में बाहर फागुन का लास्य तो दिखता ही था, मन के भीतर भी उसकी रसात्मक अनुभूति होती थी। मेरे कैशोर्य काल में बौरों से लदे हुए उल्लास-मत्त आम्र वृक्ष, उनपर भनभनाते हुए झुंड के झुंड मधुवा, आम्र-पल्लवों में छिपी कोयल की कूक और नीचे उसके स्वर का अनुकरण कर चिढ़ाते हुए हम बच्चे तथा निस्तब्ध रात में ढोल और मजीरे पर गूँजते फाग-गीतों के बोल फागुन का समग्र चित्र पूरा करते थे। तब फागुन का नाम लेते ही मन में घनीभूत जड़िमा विगलित होने लगती थी। लगता था देह और मन के भीतर मीठे गरम पानी का निर्झर फुट पड़ा है और धरती पर साक्षात् गन्धमादन पर्वत उतर आया है। जन-जन मन हाथ से बेहाथ होने लगता था। मनमृग कुलांचे भरने लगता था।
इक्कीसवीं सदी का प्रथम चतुर्थांश समाप्ति पर है। औद्योगिक विकास, अंधाधुंध शहरीकरण के कारण आदिगन्त फैले कंक्रीट के महाकांतार में रसबोध का स्रोत कहीं गुम हो गया और फागुन किताबों और पत्रिकाओं के विशेषांकों में सिमट कर रह गया है। फागुन का वह समग्र चित्र धूसरित हो चुका है। जीवन इतना डल हो गया है कि अब मुझे फागुन, फागुनी शाम और फागुनी वातास यानी फगुनहट की अनुभूति नहीं हो पाती। मन के मनुहार के लिए फागुन के गुम हुए उन चित्रों और प्रतीकों को कविता की किताबों ढूंढ़ता हूँ। फागुन के सौंदर्य कवियों और शायरों ने बखूबी कलमबंद किया है। आइये, उन्हीं की नजरों से फागुन को देखते हैं।
मलिक मुहम्मद जायसी के प्रसिद्ध खण्डकाव्य ‘पद्मावत’ फागुन मास में रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की विरह-व्यथा का वर्णन है:-
फागुन पवन झंकोरै बहा। चोगुन सीउ जाइ किमि सहा।।
तन जस पियर पात भा मोरा। तेहि पर विरह देइ
झकझोर।।
फाग करहिं सब चांचर जोरी। माहिं तन लाइ दीन्ह जस
होरी।।
ब्रजभूमि में फागुन का वर्णन रसखान कुछ इस प्रकार करते हैं:-
फागुन लाग्यौ सखि जब तें, तबतें ब्रजमण्डल धूम
मच्यौ है।
नारि नवेली बचै नहिं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अच्यौ
है।।
फागुन के निकट आते ही कबीर का मन अध्यात्म के रंग चढ़ जाता है। उनके लिए फागुन अपने पिया (आराध्य) सतगुरु से मिलने का समय है:-
ऋतु फागुन नियरानी हो
कोई पिया से मिलावे।
सोई सुंदर जाकों पिया को ध्यान है,
सोई पिया की मनमानी,
खेलत फाग अंग नहिं मोड़े,
सतगुरु से लिपटानी।

 फागुन पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का अनुवाद प्रयाग शुक्ल ने किया है। इसमें फागुन का बड़ा ही मनोहारी चित्र है:-
   वन वन में फागुन लगा, भाई रे
   पात पात फूल फूल डाल डाल देता दिखाई रे
   अंग रंग से रंग गया आकाश गान गान निखिल उदास
   चल चंचल पल्लव दल मन मर्मर संग
    हेरी रे अवनी के रंग।

 महाकवि निराला को लगता है फागुन की आभा आँखों में अट नहीं रही है:-
    अट नहीं रही है
    आभा फागुन की
    सट नहीं रही है
    कहीं सांस लेते हो
    घर -घर भर देते हो
    उड़ने को नभ में तुम
    पर-पर कर देते हो
    मंद-गंध-पुष्प माल
    पाट-पाट शोभा-श्री
    पट नहीं रही है।

 प्रकृति के सजग चितेरे सुमित्रानन्दन पन्त कहते हैं कि वसन्त के आते ही फागुन का सूनापन सुलग उठता है:-
     चंचल पग दीप-शिखा-से धर
      गृह, मग, वन में आया वसन्त!
      सुलगा फागुन का सूनापन
      सौंदर्य शिखाओं में अनन्त!

  फागुन पर बालकृष्ण शर्मा नवीन की ये पंक्तियाँ देखें:-
     अरे ओ निरगुन फागुन मास!
     मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर वास,
     अरे ओ फागुन मास!
     यहाँ रास रंग-रस कहाँ है?
     झांझ न मदिर मृदंग यहाँ है
     अरे चतुर्दिक फैल रही यह
     मौन भावना जहाँ तहाँ है।

 भवानी प्रसाद मिश्र फागुन की खुशियाँ मनाने का आग्रह करते हैं:-
     चलो फागुन की खुशियाँ मनाएँ!
     आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
     आज किरनें हैं कंचन, समेट लो;
     आज कोयल बहन हो गई बावली
     उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की-
     हम मिलाएँ
     चलो फागुन की खुशियाँ मनाएँ!

. धर्मवीर भारती फागुन की शाम का बड़े ही अनूठे बिम्ब के माध्यम से करते हैं:-
उस बँसवट से
एक पीली-सी चिड़िया
उसका अच्छा-सा कुछ नाम है
मुझे पुकारे ताना मारे
भर आएँ, आँखड़िया! उन्मन,
ये फागुनी शाम है-
फागुन के बारे में श्रीकांत वर्मा कहते हैं:-
फागुन भी नटुआ है,गायक है, मंदरी है।
अह!इसकी वंशी सुन
सुधियाँ बौराती हैं।
अपनी दुबली उंगली से जब यह जादूगर
कहीं तमतमायी
दुपहर को छू देता है,
महुए के फूल चुपके से चू जाते हैं
और किसी झँझकुर से चिड़िया उड़ जाती है।

    देखिए बुद्धिनाथ मिश्र ये पंक्तियाँ फागुन के बारे में क्या कहती हैं:-
      फागुन के दिन बौराने लगे
      फागुन के।
      दबे पाँव आकर सिरहाने
      हवा लगी बाँसुरी बजाने
      दुखता सिर सहलाने लगे
      फागुन के।
      रंग बिरंगा रूप सलोना
      कर जाता दरपन पर टोना
      सुलझा मन उलझाने लगे
      फागुन के।

   फागुन के दिन गीतों भरे होते हैं। इन्हें गाने का जी करता है लेकिन ये गीतों में बंध नहीं पाते। फागुन पर केदारनाथ सिंह की कविता की ये पंक्तियाँ देखें:-
     गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी 
     करता!
     ये बाँधे नहीं बंधते, बाँहें-
     रह जाती हैं खुली की खुली
     ये तोले नहीं तुलते, इस पर
     ये आँखें तुली की तुली
     ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता!
   पेश हैं फागुन पर दो खूबसूरत अशआर:-
     दहकी-दहकी दोपहर, बहकी-बहकी बात
      फागुन आया गाँव में लेकर ये सौगात
                                      शिव ओम अम्बर
     फजा में हैं फागुन की रानाइयाँ
     हवाओं में फागुन की सरमस्तियाँ
                                     अब्दुल मजीद 'शम्स'
  दिनेश कुमार शुक्ल के फागुन पर मन को छू लेने वाले कुछ दोहों की बानगी देखिए:-
      कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत?
      प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।

      रोम-रोम केसर धुली, चंदन मंहके अंग
      कब जाने कब धो गया, फागुन सारे रंग।

     पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप
     रह रह कर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।

     भूली बिसरी याद के, कच्चे पक्के रंग
     देर तलक गाते रहे, कुछ फागुन के संग।

  मैं भोजपुरी के वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले अपने दिवंगत मित्र और भोजपुरी के रससिद्ध कवि अनिरुद्ध के 'फागुन के गीत' की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
     लाल पगड़िया, लाल चुनरिया रँगे नगरिया लाल रे
     बगिया में फागुन रस मातल रँगे नजरिया लाल रे।।
     किरन डोर खींचत पनघट पर भरल गगरिया लाल रे
   लाल हाथ पतइन गुलाल से रँगे उमिरिया लाल रे।।

   अपने जीवन में तिरासी वसन्त देख चुका हूँ। पर जब कभी भोहजपुरिया फाग के बोल भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागे' कानों में पड़ते हैं तो लगता है मन मोरपंखी और तन सुआपंखी हो रहा है। मुझे लगता है कि फागुन एक लोक संस्कृति का नाम है जो कानों में चुपके से कहता है-"एकरंगा जीवन उबाऊ है। हम जहाँ भी रहें, जैसे भी रहें भीतर उत्सव का भाव मरना नहीं चाहिए। 
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